सावरकर जी की हिंदुत्व एवं मातृभूमि-पुण्यभूमि वाली अवधारणा पर प्रश्न उछालने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी क्या आंबेडकर को भी कटघरे में खड़े करेंगें? क्योंकि उन्होंने भी इस्लाम के आक्रामक, असहिष्णु, विघटनकारी, विस्तारवादी प्रवृत्तियों से तत्कालीन नेताओं व समाज को सावधान और सचेत किया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि इस्लाम का भाईचारा केवल उसके मतानुयायियों तक सीमित है। मुसलमान कभी भारत को अपनी मातृभूमि नहीं मानेगा, क्योंकि वह स्वयं को आक्रांताओं के साथ अधिक जोड़कर देखता है। उनका मानना था कि मुसलमान कभी देशज शासन को आत्मसात नहीं करता, क्योंकि वह कुरान, हदीस और सुन्नाह यानी शरीयत से निर्देशित होता है और उसकी सर्वोच्च आस्था इस्लामिक मान्यताओं, इस्लामिक प्रतीकों, और इस्लाम की दृष्टि से पवित्र माने जाने वाले स्थलों के प्रति रहती है, जो उसे शेष सबसे पृथक करती है।
विभाजन, पंथनिरपेक्षता और सावरकर की दृष्टि
सच यह है कि ये दोनों राजनेता यथार्थ के ठोस धरातल पर खड़े होकर वस्तुपरक दृष्टि से अतीत, वर्तमान और भविष्य का आकलन कर पा रहे थे। यह उनकी दूरदृष्टि थी, न कि संकीर्णता। ये दोनों विभाजन के पश्चात ऐसी किसी भी कृत्रिम-काल्पनिक-लिजलिजी-पिलपिली एकता के मुखर आलोचक थे, जो थोड़े से दबाव या चोट से बिखर जाय या रक्तरंजित हो उठे! सावरकर जी मानते थे कि जब तक भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं, तभी तक राज्य (स्टेट) का मूल चरित्र पंथनिरपेक्ष रहने वाला है। कोरी व भावुक पंथनिरपेक्षता की पैरवी करने वाले कृपया बताएँ कि भारत से पृथक हुआ पाकिस्तान या बांग्लादेश क्या गैर इस्लामी या लोकतांत्रिक तंत्र दे पाया? वहाँ की मिट्टी, आबो-हवा, लबो-लहज़ा, रिवाज़-तहज़ीब – कुछ भी तो हमसे बहुत जुदा नहीं? बांग्लादेश का तो निर्माण और भाग्योदय भी भारत के सहयोग से संभव हुआ, पर वहाँ हिंदुओं को आज किन नारकीय स्थितियों एवं हिंसा से गुज़रना पड़ रहा है, उसे कोई भी संवेदनशील एवं जागरूक व्यक्ति स्वयं अनुभव कर सकता है! छोड़िए इन दोनों मुल्कों को, क्या कोई ऐसा इस्लामिक मुल्क है, जो सेकुलर शासन दे पाने में सफल रहा हो? तुर्की का उदाहरण हमारे सामने है, जिसकी बुनियाद में पंथनिरपेक्षता थी, पर आज मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठन या वहाबी विचारधारा वहाँ की केंद्रीय धुरी हैं।
विभाजन और सावरकर की राष्ट्रकल्पना
क्या इसमें भी कोई संदेह होगा कि लाख प्रयासों के पश्चात भी गाँधी जी स्वयं विभाजन की त्रासदी को रोक नहीं पाए और स्वतंत्रता-पश्चात की धार्मिक-सामुदायिक स्थिति का यथार्थ अनुमान एवं आकलन कर पाने में पूर्णतः विफल रहे? जो लोग अपनी मूढ़ता या पूर्वाग्रह में वीर सावरकर को जिन्ना के साथ खड़ा करते हुए उन्हें द्विराष्ट्रवाद का पोषक बताते हैं, उन्हें 1939 में लाहौर के एक कार्यक्रम में दिया गया उनका भाषण सुनना चाहिए। उन्होंने हिंदू महासभा के उस कार्यक्रम में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट कहा था कि राष्ट्र की उनकी संकल्पना मुस्लिम लीग और जिन्ना से पूर्णतया भिन्न है। मज़हब के आधार पर राष्ट्र का विभाजन करने वालों के वे सख़्त ख़िलाफ़ थे। उनके अनुसार क़ानून की दृष्टि में सभी नागरिकों को समान होना चाहिए। न कोई अल्पसंख्यक, न बहुसंख्यक। न किसी की उपेक्षा, न किसी को विशेषाधिकार। जो भी भारतवर्ष को अपनी पुण्यभूमि-पितृभूमि मानता हो, वह भारतवासी है। राष्ट्रीयता की ऐसी व्यापक संकल्पना, ऐसी परिभाषा उन्होंने अपने समय और समाज को सौंपी।
सावरकर का राष्ट्रवाद, समाज-सुधार और दूरदर्शी व्यक्तित्व
सच तो यह है कि स्वातंत्र्यवीर सावरकर समय के पार देखने वाले यथार्थवादी चिंतक एवं दूरदर्शी राजनेता थे। उनका महत्त्व न तो उन पर लगाए गए मनगढ़ंत आरोपों से कम होता है, न उनके हिंदू-हितों की पैरोकारी से। उनका रोम-रोम राष्ट्र को समर्पित था। वे अखंड भारत के पैरोकार व पक्षधर थे। उन्होंने अपनी प्रखर मेधा शक्ति, तार्किक-तथ्यात्मक विवेचना के बल पर 1857 के विद्रोह को ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” की संज्ञा दिलवाई। उन्होंने पतित पावन मंदिर की स्थापना कर अस्पृश्यता-निवारण की दिशा में ठोस एवं निर्णायक पहल की। उन्होंने रोटीबंदी, बेटीबंदी, स्पर्शबंदी, व्यवसायबंदी, सागरबंदी, वेदोक्तबंदी तथा शुद्धिबंदी जैसी सात बेड़ियों से समाज को मुक्त कराने का अभिनव प्रयोग एवं प्रयास किया। उन्होंने धर्मांतरित जनों के लिए उनके मूल धर्म में लौटने का पुरज़ोर अभियान चलाया। समाज-सुधार के लिए वे आजीवन प्रयत्नशील रहे। तत्कालीन सभी बड़े राजनेताओं में उनका बड़ा सम्मान था। गाँधी जी, भीमराव आंबेडकर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे प्रखर एवं प्रभावशाली राजनेताओं ने समय-समय पर वीर सावरकर की प्रशंसा की है?
सावरकर के प्रति राष्ट्रीय सम्मान और प्रेरणादायी विरासत
गाँधी जी और आंबेडकर उनके अस्पृश्यता उन्मूलन एवं अछूतोद्धार कार्यक्रम से बहुत प्रभावित थे। सुभाषचंद्र बोस, शचींद्र नाथ सान्याल, रौशन सिंह, राजेन्द्र लाहिड़ी, सरदार भगत सिंह, दुर्गा भाभी, सुखदेव, राजगुरु जैसे देशभक्तों एवं क्रांतिकारियों ने उनके कार्यों एवं विचारों से किसी-न-किसी स्तर पर प्रेरणा ग्रहण की थी। कदाचित इन्हीं कारणों से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वीर सावरकर के निधन के पश्चात 26 फरवरी, 1966 को अपने शोक-संदेश में कहा था – “विनायक दामोदर सावरकर समकालीन भारत के महान नेता थे, जिनका नाम साहस व देशभक्ति की प्रेरणा देता है। वे महान क्रांतिकारी के साँचे में ढले ऐसे व्यक्तित्व थे, जिनसे अनगिनत लोगों ने प्रेरणा ली।” उन्होंने 20 मई, 1980 को “सावरकर राष्ट्रीय स्मारक” के सचिव पंडित बाखले को लिखे अपने पत्र में कहा था कि “वीर सावरकर का ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध मजबूत प्रतिरोध हमारे स्वतंत्रता-आंदोलन के लिए बहुत अहम है। मैं आपको देश के विलक्षण सपूत (रीमार्केबल सन ऑफ इंडिया) के शताब्दी-समारोह के आयोजन के लिए बधाई देती हूँ।” इतना ही नहीं उन्होंने वीर सावरकर की स्मृति व सम्मान में 1970 में डाक टिकट जारी किया, 1979 में अपने निजी खाते से सावरकर ट्रस्ट को 11 हजार रुपए दान दिए तथा वर्ष 1983 में बतौर प्रधानमंत्री सूचना प्रसारण मंत्रालय के फ़िल्म डिवीजन ऑफ इंडिया को महान क्रांतिकारी सावरकर के जीवन पर एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने का आदेश दिया।

















