भोजशाला  : फैसले में छिपे सबक
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होम विश्लेषण

भोजशाला  : फैसले में छिपे सबक

भोजशाला पर आए निर्णय का संदेश है कि सरकारें अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने के लिए आगे आएं। हमारे स्मारक देखरेख के अभाव में समाप्त हो रहे हैं। जब तक न्यायालय आदेश नहीं देता, तब तक उनकी देखाभाल के लिए कुछ नहीं किया जाता। ऐसी प्रवृत्ति और सोच को खत्म करने के साथ ही एएसआई को पर्याप्त सुविधाएं और छूट मिलनी चाहिए

Written byविजय मनोहर तिवारीविजय मनोहर तिवारी
May 28, 2026, 03:31 pm IST
in विश्लेषण, धर्म-संस्कृति, मध्य प्रदेश

एक रिपोर्टिंग के दौरान 23 साल पहले मुझे पहली बार मध्य प्रदेश में धार के भोजशाला परिसर में जाने का अवसर मिला था। बाहर तैनात सुरक्षा प्रहरी ने यह कहकर लौटा दिया था कि बिना प्रशासन की अनुमति अंदर नहीं आ सकते। तब हर शुक्रवार को मुसलमान बेखटके नमाज के लिए आ सकते थे और हिंदुओं के लिए साल में केवल एक बार बसंत पंचमी के दिन ही दरवाजे खुलते थे। उस दिन भोजशाला के बाहर कब्रों को देखते हुए मैं खाली हाथ लौटते हुए अपने लोकतंत्र की विचित्र लीला पर विचार कर रहा था— साल में ‘एक दिन इन्हें’ और ’54 दिन उन्हें’ अनुमति है। अगर मैं न हिंदू हूं और न मुसलमान हूं, मैं इतिहास और पुरातत्व का एक जिज्ञासु विद्यार्थी हूं तो हमारे महान लोकतंत्र में मुझे एक भी दिन अंदर नहीं आने दिया जाएगा!

जब बसंत पंचमी शुक्रवार के दिन पड़ती तो भोपाल से लेकर इंदौर तक पुलिस और प्रशासन की शामत ही आ जाती। धार में पूरी ताकत यह दिखाने में लगती कि जुमे की नमाज भी शांति से हो गई और सरस्वती पूजा भी संपन्न करा दी गई। जुमे की दहशत से भरी ऐसी ही एक बसंत पंचमी के पहले पहली बार भोजशाला के अंदर जाने का अवसर प्रबुद्धजनों के एक दल के साथ मिला, जिसमें मुखर कांग्रेसी नेता और पूर्व मंत्री सुरेश सेठ भी शामिल थे।

एक हजार साल पहले तराशे हुए मूल शिलाखंडों से खड़ी एक नए ढंग की संरचना हमारे सामने थी, जिसके दरवाजे पर ही काले पत्थरों पर संस्कृत शिलालेखों के फ्रेम भाग्य से बच गए थे। पूरे परिसर में मंदिर स्थापत्य के अनुसार पवित्र सनातन प्रतीकों वाले कलात्मक स्तंभों की आकर्षक श्रृंखला को देखकर सुरेश सेठ बोले, ”माय डियर, कोई नेत्रहीन भी पत्थर टटोलकर बता सकता है कि वह मंदिर में खड़ा है।”

मुस्लिम तुष्टीकरण की विनाशकारी नीतियों का शिकार राजा भोज का यह महान स्मारक भी हुआ। ‘प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट’ ने तो ऐसे हजारों स्मारकों का किस्सा ही खत्म कर दिया, मुस्लिम कब्जों के दौर में जिनकी पहचानें बदल दी गई थीं। मंदिरों को तोड़कर पहले मलबे में बदलना और उस मलबे से फिर इबादतगाहें खड़ी करना, यह सदियों की रुला देने वाली आपबीती है। बदली हुई पहचानों को असल मानने के ये प्रकरण तार्किक रूप से अपने मूल में ही आधारहीन और हास्यास्पद हैं, जिनमें लाखों लंबित प्रकरणों को ढो रही न्यायपालिका का अमूल्य समय नष्ट हो रहा है। नजारा कुछ ऐसा विचित्र है कि आंखों पर पट्टी बांधे एक पक्ष अड़ा है कि अंधकार ही सत्य है और वे सब कानून की कंडिकाओं से यह सिद्ध करने में लगे हैं कि दिन में सूरज चमकता है या नहीं!

सांस्कृतिक विस्मृति का शिकार

धार की भोजशाला का फैसला एक ऐसे मुकदमे का है, जो दिन की रोशनी जैसा स्वयंसिद्ध था। उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ के इस न्यायपूर्ण निर्णय के बाद मुस्लिम पक्ष को इस ऐतिहासिक सच का सामना करना ही चाहिए कि पहचान केवल स्मारकों की नहीं बदली गई थी। जब मंदिरों को तोड़कर उनके स्वरूप बदले गए तब स्थानीय आबादी की पहचान भी साथ ही बदली गई। इसलिए दूसरा कोई पक्ष है ही नहीं। पक्ष एक ही है। अंतर केवल यह कि कुछ अपनी मूल पहचान के साथ अपनी संस्कृति के संरक्षण में संघर्षरत हैं और कुछ विस्मृति के शिकार बदली हुई पहचान में अटके हुए बेवजह जूझ रहे हैं!

दिल्ली के कुतुबमीनार परिसर से लेकर गुजरात में भरुच की मस्जिद तक आप तस्वीरों को इंटरनेट पर देखिए, जूम करके देखिए। सबकी कहानी एक जैसी है। 700 साल का समय कम नहीं होता, जब दिल्ली-लाहौर पर कब्जा जमाने के बाद तुर्कों और मुगलों ने पूरे देश में मंदिरों और मूर्तियों, गुरुकुलों और विश्वविद्यालयों को मिटाने का विकट विध्वंस मचाया। मूर्ति पूजा के जन्मजात विरोध से उपजी इस्लामी कट्टरता के शिकार हजारों मंदिर भारत के लिए केवल पूजास्थल नहीं थे। वे पीढ़ियों तक विकसित हुईं भारत की बहुकलाओं और ज्ञान परंपरा के सक्रिय केंद्र थे, जिन्हें मिटाकर उनकी पहचान बदली गई।

कश्मीर के अनंतनाग जिले में मार्त्तण्ड मंदिर, बिहार में नालंदा-विक्रमशिला, बंगाल में पंडुआ के मंदिर, मध्य प्रदेश में विदिशा, धार, उज्जैन और मांडू, गुजरात में सोमनाथ, भरुच, चांपानेर, उत्तर प्रदेश में अयोध्या और मथुरा तो चंद बड़े नाम हैं। गांव-गांव में खंडित मंदिरों और मूर्तियों का अंबार लगा है। नदियां जब सूखती हैं तो कभी घाटों पर तोड़े गए मंदिरों की मूर्तियां बाहर आती हैं। कहीं टीलों में दफन मंदिरों के अवशेष बाहर झांकते हैं। लगता है कि भारत के अतीत का एक बड़ा हिस्सा सामने आने को आतुर है मगर तुष्टीकरण के ताने-बाने से बुनी एकतरफा सेक्युलरिज्म की चादर इतिहास की कब्र पर डाल दी गई है।

हिंदू मंंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को लेकर फिर से होगी सुनवाई

देश के दक्षिणी राज्यों में हिंदू मंदिरों और धार्मिक बंदोबस्तों से जुड़े सरकारी नियंत्रण कानूनों को चुनौती देने वाले 13 वर्ष पुराने मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण मोड़ लेते हुए अपना पूर्व आदेश वापस ले लिया है।

न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति एस. सी. शर्मा की पीठ ने गत 18 मई को यह फैसला सुनाया। अदालत का यह रुख उसके 1 अप्रैल 2025 के पहले दिए गए आदेश से अलग माना जा रहा है।

दरअसल, पिछले आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने इन याचिकाओं का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ताओं को संबंधित राज्यों के उच्च न्यायालयों का दरवाजा खटखटाने की सलाह दी थी। उस समय अदालत की राय थी कि मंदिर प्रशासन और धार्मिक बंदोबस्त से जुड़े मामलों में स्थानीय परिस्थितियां और राज्य-स्तरीय कानूनी पहलू शामिल हैं, इसलिए संबंधित उच्च न्यायालय इन मामलों की बेहतर समीक्षा कर सकते हैं।

याचिकाकर्ताओं ने पुनर्विचार की मांग करते हुए कहा था कि वे पिछले 13 वर्षों से सर्वोच्च न्यायालय में न्याय की उम्मीद लेकर इस मामले की सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें फिर से अलग-अलग उच्च न्यायालयों में जाने के लिए कहना उनके लंबे कानूनी संघर्ष को और बढ़ा देगा। बता दें कि वर्ष 2012 में दिवंगत आध्यात्मिक गुरु स्वामी दयानंद सरस्वती ने पहली याचिका दायर की थी। याचिका में दक्षिण भारत के राज्यों में हिंदू मंदिरों और धार्मिक संस्थानों पर सरकारी नियंत्रण से जुड़े कानूनों को चुनौती दी गई थी।

वित्तीय रूप से दिवालिया पुरातत्व विभाग

दुर्भाग्य से सोची-समझी साजिश के तहत आजादी के बाद पुरातत्व एक उपेक्षित विषय की तरह हाशिए पर रहा। स्वाधीन भारत को अपने अतीत से मुंह फेरने में ही अपनी भलाई लगी। इस आपराधिक उपेक्षा ने हमारे हजारों स्मारकों को नष्ट होने की कगार पर लाकर छोड़ दिया, जिन पर लगातार कब्जे होते रहे। हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि केंद्र और राज्य सरकारों के पुरातत्व विभाग बौद्धिक और वित्तीय रूप से दिवालिया लूपलाइन के विषय माने जाते हैं। नई पीढ़ी के विद्यार्थियों को यहां कॅरिअर के रास्ते बंद हैं। राज्यों में नई नियुक्तियां दशकों से नहीं हुई हैं। पद खाली पड़े हैं या विशेषज्ञों की जगह क्लर्क विभाग चला रहे हैं।

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में 11वीं सदी के ऐतिहासिक उदयपुर की सबसे ताजा कहानी है, जहां परमार राजा उदयादित्य के राजमहल के खंडहरों को एक मदरसे से तीन साल पहले ही मुक्ति मिली है। मेरे देखे, पुरातत्व को 1947 के बाद तीन पालियों में सक्रिय विभाग होना था, जहां हर प्रकार की आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञों के माध्यम से भारत अपने 800 साल के अवशेषों में अपनी खोई हुई पहचान को खोजता। मगर ऐसा नहीं हुआ। हर सरकार में यह उपेक्षा बनी ही रही। आज भी है। आज अदालतों के आदेशों पर सर्वेक्षण हो रहे हैं, इसमें शासन का क्या श्रेय है? अपनी आंखों के सामने नष्ट होती अपनी विरासत को बचाने और नीतियां बनाने से किसने रोका हुआ है?

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के हर राजवंश ने अपने समय में महान निर्माण कराए। आठवीं से बारहवीं सदी के बीच उड़ीसा में कोणार्क से कर्नाटक के होलेविडु और तमिलनाडु के तंजौर तक लाखों दक्ष शिल्पियों, विशेषज्ञ वास्तुविदों और विद्वान गणितज्ञों की पीढ़ियां सृजन में लगी रहीं। ये मंदिर हमारे प्रतिभासंपन्न और रचनात्मकता की ऊर्जा से भरे महान पूर्वजों के निशान थे, जिनके एक-एक पत्थर को सुरक्षित सहेजने के साथ नए तथ्यों के प्रकाश में अपने इतिहास के निरंतर लेखन का काम हमारा था।

ज्ञान परंपरा के सक्रिय केंद्र थे मंदिर

इतिहास बताता है कि वर्तमान मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान की सीमाओं में विस्तृत परमार राजवंश के राज्य में सरस्वती के महान उपासक राजा भोज ने 11वीं सदी में अपनी राजधानी धार में ही भोजशाला का निर्माण नहीं कराया था। ऐसी दो और भोजशालाएं थीं, जिन्हें इस्लामी आक्रांताओं ने मिटाया। पहली भोजशाला थी-उज्जैन में, दूसरी धार में और तीसरी मांडू में। राजा भोज के समय इनके नाम भोजशाला नहीं थे। ये संस्कृत में भारत की ज्ञान परंपरा के महत्वपूर्ण शिक्षा केंद्र थे, जिनका मूल नाम था-सरस्वती कंठाभरण। केवल राजा भोज ही नहीं, उनके बाद हर पीढ़ी में उदयादित्य और नरवर्मन ने अपनी पिछली पीढ़ी से भी बड़े और भव्य मंदिर और ज्ञान के केंद्र विकसित किए। इनमें से अधिकांश दिल्ली और आगरा से दक्षिण की ओर लूट और हमलों के लिए जाने वाले इस्लामी आक्रांताओं के शिकार हुए। कुछ आज भी अपने पूरे आकार में भूमि से शिखर तक खड़े हैं। भोपाल से 150 किलोमीटर दूर उदयपुर एक ऐसा ही स्थान है, जहां 1080 में बना नीलकंठेश्वर मंदिर अपने वैभव का साक्षी है।

ग्यारहवीं सदी में अपने निर्माण के बाद 300 वर्ष तक ये केंद्र सक्रिय रहे। परमारों के पराभव के बाद इनका वैभव भी इस्लामी आक्रांताओं के हाथों ध्वस्त कर दिया गया। उज्जैन परमार राजाओं की पहली राजधानी थी, जिसे राजा भोज धार लेकर आए। धार का मूल नाम धारा नगरी है और मांडू उनके समय ‘मंडपदुर्ग’ के रूप में प्रतिष्ठित पर्वतीय मनोरम केंद्र था।

साल 2000-2001 में मुझे परमार राजवंश और उनके महान रचनात्मक योगदान पर तीन दशक तक अध्ययन और शोध करने वाले भारतीय मुद्रा एवं मुद्रिका अकादमी के निदेशक डॉ. शशिकांत भट्ट के साथ इन तीनों भोजशालाओं को निकट से देखने का अवसर मिला था। वह वाकई रोमांचकारी अनुभव था, जिनके प्रमाण दस्तावेजों में भी बिखरे हुए हैं।

उज्जैन का अनंतपेठ मोहल्ला

महाकाल मंदिर से करीब एक किलोमीटर दूर अनंत पेठ मोहल्ले में 1990 के दशक तक एक उपेक्षित स्मारक था, जिसका डिजाइन बिल्कुल धार की प्रसिद्ध भोजशाला जैसा है। डॉ. भट्‌ट इतिहास के विद्यार्थियों को लेकर यहां कई बार आए थे। उनके अनुसार कोई नहीं जानता कि कब इस पर किसी इंतजामिया कमेटी का साइन बोर्ड टंग गया और पुरातत्व विभाग का यह लावारिस स्मारक नाजायज कब्जे में चला गया।

मैंने इसके भीतर देखा कि किसी प्राचीन मंदिर के स्तंभों को निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया गया था, जिन्हें ताजे हरे गाढ़े ऑइल पेंट से पोता गया था।इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान भगवतीलाल राजपुरोहित की पुस्तक ‘भोजराज’ में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ यह वर्णन है कि धार के समान ही उज्जैन और मांडू में भी राजा भोज ने संस्कृत की पाठशालाएं निर्मित कराई थीं। उज्जैन में वह शिप्रा के पूर्वी तट पर ‘बिना नींव की मस्जिद’ कहलाता है। इंतजामिया कमेटी के साइन बोर्ड पर इसे मस्जिद बगैर नींव ही लिखा गया। यानी एक ऐसा स्मारक जो पहले से रहा होगा, अलग से नींव की आवश्यकता ही नहीं थी।

मांडू के शाही परिसर की असलियत

शाही परिसर के लंबे किंतु विस्तृत क्षेत्र के एक आखिरी कोने पर दिलावर खां का मकबरा है। ‘विक्रम स्मृति ग्रंथ’ में एक अध्याय है-‘मांडव के प्राचीन अवशेष।’ इसमें लिखा है कि मकबरा 1405 में दिलावर खां ने बनवाया था। किंतु मकबरे की दक्षिणी दीवार के ढहने से नटराज शिव और देवियों की अनेक प्रतिमाओं सहित शिलालेख के काले पाषाण के टुकड़े मिले थे। सरस्वती की एक खंडित प्रतिमा भी यहीं मिली थी। साल 2000 के आसपास उज्जैन में हुई एक संगोष्ठी में डॉ. भट्‌ट ने ‘परमारों की तीन भोजशालाए’ विषय पर शोधपत्र भी पढ़ा था। किंतु मीडिया की उपेक्षा के कारण जनसामान्य में यह तथ्य कभी आ नहीं पाए।

इंदौर के पुरातत्व संग्रहालय के पुस्तकालय में एक पुस्तक मैंने देखी-’धार एंड मांडू।’ 1912 में मेजर सी.ई. लुआर्ड द्वारा लिखी गई इस किताब में दिलावर खां के मकबरे की निर्माण सामग्री के आधार पर उसने इसे एक मुस्लिम इमारत के रूप में स्वीकार ही नहीं किया है। वह कहता है कि यहां कभी मंदिर था। एक विदेशी को भी इन बेहूदा इमारतों में एक मंदिर नजर आया, किंतु हमें अब सर्वे कराने पड़ रहे हैं!

कौन था दिलावर खां

दिल्ली में काबिज तुगलकों के समय 1392 में दिलावर खां गौरी को मालवा पर कब्जे के लिए भेजा गया था। अलाउद्दीन खिलजी के समय परमार राजवंश के आखिरी राजा महलकदेव को मांडू में ही मारा गया था। इस पराजय के बाद पहली बार मुस्लिम मांडू के किले पर काबिज हो चुके थे। तुगलकों के खात्मे के बाद 1401 में मालवा में दिलावर खां ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया। संभवत: पहले ही ध्वस्त किए जा चुके परमारों के इन महान स्मारकों को उसी मलबे से एक साथ मस्जिद और मकबरों की शक्ल दिलावर खां के समय दी गई। मांडू के हिंडोला महल, अशर्फी महल और जहाज महल में प्राचीन हिंदू भवनों के ही पत्थरों का उपयोग आज भी साफ दिखाई देता है। मांडू म्यूजियम में इस्लामी दौर के विनाशकारी विध्वंस के सबूत भी देखे जा सकते हैं।

राजा भोज का रचना विश्व

शोध ग्रंथ ‘राजा भोज का रचना विश्व’ पद्मश्री से अलंकृत भगवतीलाल राजपुरोहित की रचना है। 417 पृष्ठ में राजा भोज के महान निर्माण कार्यों की चर्चा है। राजपुरोहित कहते हैं कि राजा भोज स्वयं एक कवि थे। उन्होंने उच्च कोटि के 60 ग्रंथों की रचना स्वयं की थी। उनकी विद्वानों की परिषद में पांच सौ से अधिक सृजनशील विद्वान थे। इनके लिए ही धार में ‘सरस्वती कंठाभरण’ या ‘शारदासदम्’ नाम की एक सभा का निर्माण किया गया था। इसके पृष्ठ 309 पर ‘शारदासदम्’ को भारती भवन भी कहा गया है। यहीं 1034 में राजा भोज ने वाग्देवी की प्रतिमा प्रतिष्ठित कराई थी, जो फिलहाल लंदन के ब्रिटिश म्युजियम में है। यह शोध ग्रंथ हमें बताता है कि धार की तरह ही उज्जैन में भी सरस्वती कंठाभरण के नाम से एक प्रासाद निर्मित किया गया था, जिसका गर्भगृह प्रशस्तियों के शिलाखंडों से भरा हुआ था।

राजा जय सिंह सिद्धराज का उज्जैन आगमन

राजपुरोहित के अनुसार गुजरात के राजा जयसिंह सिद्धराज 1132 में उज्जैन आए थे और उन्होंने राजा भोज द्वारा लिखित विविध विषयों के ग्रंथ स्वयं देखे थे। यही नहीं, सरस्वती कंठाभरण के नाम से भी राजा भोज ने दो ग्रंथ लिखे थे। एक व्याकरण का और दूसरा काव्यशास्त्र का। पृष्ठ 315 पर उल्लेख है कि ‘मंडपदुर’ के छात्रावास के अध्यक्ष गोविंद भट्‌ट के पुत्र धनपति भट्‌ट को भोज ने भूमिदान की थी। एक छात्रावास का संदर्भ यह संकेत करता है कि मांडू में भी कोई विद्यापीठ अवश्य रही होगी।

धार की भोजशाला के संबंध में आए ताजा फैसले का सबक केंद्र और राज्यों के पुरातत्व विभागों से पहले हमारे नीति-निर्माताओं के लिए यह है कि इस मृतप्राय: ढांचे को पुनर्जीवित करने के उपाय करना चाहिए। हर प्रदेश और हर जिले में विशेषज्ञों की नियुक्तियां होनी चाहिए, उत्खनन के आधुनिक तकनीकी साधनों से संपन्न विभागों को नए-नए स्थानों पर उत्खन्न का काम युद्ध स्तर पर करना चाहिए, कब्जे में जा चुके स्मारकों की पहचान और उन्हें मुक्त कराने की प्रक्रिया निरंतर होनी चाहिए और ये सारे काम सरकारें कर सकती हैं। इसके लिए किसी अदालत के निर्णय की जरूरत नहीं है। संस्कृति के नष्ट होते हुए चिन्हों को अगर हम समय रहते नहीं सहेज सके तो हम इस अनुकूल अवसर को गंवा देंगे।

Topics: मंडपदुर्गधारा नगरीपरमार राजवंशज्ञान परंपराप्राचीन हिंदू मंदिरपाञ्चजन्य विशेषऐतिहासिक स्मारकभोजशालासांस्कृतिक विस्मृतिराजा भोजविद्यापीठ और गुरुकुलवाग्देवी की प्रतिमादिलावर खां गौरीसांस्कृतिक धरोहरराजा उदयादित्यसरस्वती कंठाभरणनीलकंठेश्वर मंदिरमांडू
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