तृणमूल कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर क्यों मंडराने लगा संकट?
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तृणमूल कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व पर क्यों मंडराने लगा संकट?

पश्चिम बंगाल में चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में उथल-पुथल तेज, 80 विधायकों के साथ विपक्ष की भूमिका मुश्किल। उत्तर 24 परगना में 30 पार्षदों के इस्तीफे और ममता बनर्जी पर सवाल। व्यक्ति-केंद्रित पार्टियों का भविष्य क्या?

Written byअभय कुमारअभय कुमार — edited by कुलदीप सिंह
May 25, 2026, 08:58 am IST
inविश्लेषण, पश्चिम बंगाल
ममता बनर्जी (फोटो साभार: गोर्क)

ममता बनर्जी (फोटो साभार: गोर्क)

पश्चिम बंगाल की नई विधानसभा में 80 विधायकों के साथ ही तृणमूल कांग्रेस पार्टी को एक भरोसेमंद मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए रणनीति बनानी होगी। तृणमूल कांग्रेस पार्टी के पास वर्तमान में कुल 42 सांसद हैं, जिसमें 29 लोकसभा और 13 राज्यसभा के सांसद हैं। मगर जमीनी स्तर पर पार्टी में काफी उथल-पुथल है और पार्टी के जमीनी स्तर के पदाधिकारी और निर्वाचित पार्षदों द्वारा इस्तीफे का दौर जारी है।

पार्टी से किनारा करते टीएमसी के विधायक

तृणमूल कांग्रेस  पार्टी के विधायकगण पार्टी की गतिविधियों से दूरी बनाते जा रहे हैं। ममता बनर्जी और पार्टी के कट्टर समर्थक नेताओं जो पार्टी के लिए काफी उग्र रहते थे, अब या तो चुप हैं या पार्टी में विरोध करने के लिए उचित अवसर का इंतज़ार कर रहे हैं। जहांगीर खान का फलता विधानसभा चुनाव से पूर्व अपने को चुनाव से अलग करना इसकी एक बानगी है। ममता बनर्जी को अपनी और पार्टी के इस तरह की वस्तुस्थिति का आभास है। इस कारण वो किसी भी प्रकार का पार्टी कार्यक्रम करने का साहस नहीं बटोर पा रही हैं।

ममता को भी था टीेएमसी के टूटने का डर

ऐसा नहीं है कि ममता बनर्जी को इसका आभास नहीं था, बल्कि चुनाव प्रचार के क्रम में ही उन्होंने जन संबोधन में कहा था कि तृणमूल रही तो फिर मिलेंगे। तृणमूल कांग्रेस पार्टी के कीर्ति आज़ाद जैसे कई सांसद जो पहले ममता बनर्जी के पक्ष में मुखर रहते थे अब केवल मोदी विरोध का झंडा उठाये हुए हैं। पार्टी के न सिर्फ विधायकगण बल्कि सांसदों का भी समूह पार्टी छोड़कर दूसरे पार्टी में शामिल होने की संभावना तलाश रहा है।

पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता अब तक या तो पार्टी से दूरी बना चुके हैं या पार्टी में स्थानीय स्तर पर शामिल हो चुके हैं। तृणमूल के बुरी तरह से चुनावी हार का पहला असर उत्तर 24-परगना के नगर निकाय में देखने को मिला, जहाँ तृणमूल के गढ़ बैरकपुर इंडस्ट्रियल कॉरिडोर में पार्टी लगभग समाप्त हो गई है। हालीशहर नगरपालिका के 23 में से 16 पार्षदों ने इस्तीफा दिया दे दिया है। इतना ही नहीं, बल्कि उत्तर  24-परगना के ही भाटपारा नगर पालिका के 35 तृणमूल कांग्रेस पार्षदों में से 30 ने इस्तीफा दे दिया है। इसमें ममता बनर्जी की विश्वस्त और भाटपारा नगर पालिका की अध्यक्ष रेबा साहा भी शामिल हैं।

इसे भी पढ़ें: खाड़ी संकट का दुष्प्रभाव: पेट्रोल-डीजल फिर महंगे, 2 हफ्ते में चौथी बढ़ोतरी

व्यक्ति केंद्रित पार्टियों में आम बात है ये

दरअसल, व्यक्ति केंद्रित पार्टियों में यह आम घटना है और ऐसी पार्टियां केवल नेता की क्षमता या जीवनकाल तक ही अपना करिश्मा दिखाती हैं। तमिलनाडु में द्रमुक और अन्नाद्रमुक पार्टियों ने करुणानिधि और जयललिता के जीवन काल तक ही अपना स्वर्णिम अवसर देखा और अब ये पार्टियां अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं। बिहार में लालू यादव के राजनीतिक तौर पर निष्क्रियता के बाद अब यह पार्टी भी रसातल की और बढ़ती जा रही है। 2027 के उत्तर प्रदेश के चुनाव में अखिलेश यादव को द्रमुक, अन्नाद्रमुक और राजद जैसे हालात से बचने के लिए पार्टी को जीत दिलवाना बड़ी चुनौती है, जिसमे में अभी तक किसी भी प्रकार से सफल होने के आसार नहीं दिख रहे हैं।

Topics: तृणमूल कांग्रेस संकटममता बनर्जी TMC टूटने का डरममता बनर्जीtmcपश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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