नॉर्वे की एक पत्रकार द्वारा प्रधानमंत्री मोदी से प्रेस कॉन्फ्रेंस के बारे में सवाल पूछने के बाद देश में विपक्षी नेताओं और उनके आईटी सेल की एक पूरी लॉबी सोशल मीडिया पर फिर से यह मुद्दा उठा रही है कि प्रधानमंत्री मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं करते? भारत में कोई भी पत्रकार उनसे मुश्किल सवाल नहीं पूछ सकता और वह किसी के सवालों का जवाब नहीं देते हैं। ऐसा विपक्षी दल के नेता और उनके समर्थक पत्रकारों द्वारा कहा जा रहा है। यह दुष्प्रचार न सिर्फ राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी एक खास जुगलबंदी और नीति के तहत किया जा रहा है। इस तरह की बातें करके प्रधानमंत्री मोदी की अलग प्रकार की छवि बनाने की नाकाम कोशिश कांग्रेस पार्टी और उसके इकोसिस्टम के द्वारा की जा रही है।
PM मोदी और देश की छवि को नुकसान पहुंचाने की साजिश
कांग्रेस पार्टी और उसके इकोसिस्टम द्वारा फैलाया जा रहा भ्रम केवल पीएम मोदी और देश की छवि को ख़राब करने की एक नाकाम कोशिश है। कांग्रेस और उसके समर्थक पत्रकारों का समूह जब चुनावी मैदान में इन्हें पटखनी देने में नाकाम साबित हुआ तो हताशा में अब ये इस तरह की ओछी हरकतें कर रहे हैं। अब चुनावी मैदान से बाहर मोदी और भाजपा को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है। कांग्रेस पार्टी और उसके इकोसिस्टम का अंतिम उम्मीद पश्चिम बंगाल पर टिकी थी, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि ममता बनर्जी चुनाव जीत जाएंगी और इसके बाद यह इकोसिस्टम भाजपा और मोदी के खिलाफ एक नया नैरेटिव शुरू करेगा। मगर बंगाल की प्रबुद्ध जनता द्वारा इन्हें करारा तमाचा दिए जाने के बाद ये बदहवास किंकर्तव्यविमूढ़ होकर गिरे हुए हैं। इसके बाद यह इकोसिस्टम भाजपा और मोदी को अन्य तरीकों से घेरने और बदनाम करने का प्रयास कर रहा है।
PM मोदी ने 12 साल में 150 साक्षात्कार दिए
अगर प्रधानमंत्री मोदी की छवि को कांग्रेसी इकोसिस्टम के द्वारा बदनाम करने वाले तथ्यों का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि वर्ष 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बनने के बाद 12 वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी ने 150 से ज्यादा एकल साक्षात्कार किए हैं। यद्यपि कुल साक्षात्कारों की संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा साक्षात्कारों में कोई भी सवाल पूछने का पूरा मौका था। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान ही प्रधानमंत्री मोदी ने सिर्फ 76 दिनों में लगभग 80 साक्षात्कार दिए थे। इनमें देश का लगभग प्रत्येक समाचार चैनल, प्रत्येक अखबार, वेबसाइट के साथ यूटूबर को भी साक्षात्कार दिए गए थे। मोदी ने उनके हर सवाल का जवाब दिया था.
यहीं नहीं प्रधानमंत्री मोदी ने केवल राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भी लगातार साक्षात्कार देते रहे है। जैसे वर्ष 2025 में निकेई एशिया, 2024 में द न्यूज़ वीक, 2023 में द वॉल स्ट्रीट जर्नल और 2015 में टाइम मैगजीन को मोदी ने साक्षात्कार दिया था। इतना ही नहीं, बल्कि ब्लूमबर्ग, सीएनएन, फॉक्स न्यूज़, अलजजीरा, फाइनेंसियल टाइम्स, द इकोनॉमिस्ट और रॉयटर्स जैसी अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी और संस्थाओं ने भी प्रधानमंत्री मोदी पर कवर स्टोरी की थी। इन संस्थानों ने मोदी पर लंबे-लंबे लेख छापे हैं और उनके काम का आकलन भी यह लोग करते रहे हैं।
वर्ष 2024 में प्रधानमंत्री मोदी ने अंतरराष्ट्रीय मैगजीन न्यूज़ वीक को 90 मिनट का एक साक्षात्कार दिया था, जिसमें न्यूज़ वीक के तीन पत्रकारों ने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल किए थे। अब सवाल है कि क्या न्यूज़ वीक के यह तीनों पत्रकार भी गोदी मीडिया हैं और क्या यह भी कॉम्प्रोमाइज हैं? न्यूज़ वीक ने अपने कवर पेज पर प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर छापी थी। क्या न्यूज़ वीक के यह तीनों पत्रकारों ने भी प्रधानमंत्री मोदी को बेहद आसान सवाल पूछकर ऐसे ही छोड़ दिया होगा? वर्ष 2015 में टाइम मैगजीन को प्रधानमंत्री मोदी ने लगभग 2 घंटे का इंटरव्यू दिया था और इसमें भी हर प्रकार के सवाल उनसे पूछे गए थे और टाइम मैगजीन ने अपने कवर पेज पर भी मोदी को स्थान दिया था। क्या टाइम मैगजीन भी गोदी मीडिया है? इनमें से एक भी समाचार चैनल या अखबार के पत्रकार या संपादक ने कभी यह शिकायत नहीं की कि प्रधानमंत्री मोदी ने उनके किसी सवाल का जवाब नहीं दिया या उससे बचने की कोशिश की हो।
कई पॉडकॉस्ट में भी शामिल रहे प्रधानमंत्री
इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी कई पॉडकास्ट में शामिल हुए थे। उन्होंने कई-कई घंटे के लंबे-लंबे साक्षात्कार दिए हैं। दुनिया के मशहूर पॉडकास्टर लेक्स फ्रिडमैन के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने लगभग 3 घंटे 10 मिनट तक बातचीत की थी। इस साक्षात्कार के बाद लेक्स फ्रिडमैन ने सोशल मीडिया पर लिखा था, “इट वाज़ वन ऑफ द मोस्ट मूविंग एंड पावरफुल कॉन्वर्सेशंस एंड एक्सपीरियंसेस ऑफ माय लाइफ” कांग्रेसी इकोसिस्टम को लेक्स फ्रिडमैन से यह पूछना चाहिए कि ऐसा उनका कौन सा सवाल था, जिसका जवाब प्रधानमंत्री मोदी ने इस 3 घंटे 10 मिनट के इंटरव्यू में नहीं दिया था। लेक्स फ्रिडमैन दुनिया के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित पडकास्टर्स में से एक हैं। लेक्स फ्रिडमैन के साथ दुनिया के बड़े-बड़े नेता, बड़े-बड़े बिजनेस लीडर्स और सेलिब्रिटी जैसे डोनाल्ड ट्रंप, इलॉन मस्क, सुंदर पिचाई, सैम ऑल्टमैन, यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की पॉडकास्ट में आ चुके हैं। अब सवाल ये है कि क्या लेक्स फ्रिडमैन भी गोदी मीडिया है? क्या इन्हें भी कोम्प्रोमाईज़ कर लिया गया था? प्रधानमंत्री मोदी एक भारतीय पॉडकास्टर निखिल कामत के साथ भी पॉडकास्ट में शामिल हो चुके हैं और उन्हें भी लगभग 2 घंटे का साक्षात्कार उन्होंने दिया था। क्या निखिल कामत गोदी मीडिया है?
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यूपीए के काल में थी असली समझौतावादी मीडिया
इसके उलट यूपीए के समय असली समझौतावादी मीडिया थी। उस समय के पत्रकार सोनिया गांधी और राहुल गांधी से जो सवाल पूछते थे, उससे यही लगता था कि उस समय की बातों को ढकने के लिए इस तरह के कुतर्क बढ़ाये जा रहे हैं। वर्ष 2016 में उस जमाने के गोदी मीडिया के एक पत्रकार जो कांग्रेस पार्टी के बहुत करीबी माने जाते थे, ने सोनिया गांधी का पहला साक्षात्कार किया था। उन्होंने सोनिया गांधी से पूछा जब था कि आप शाम को घर से बाहर जाती हैं तो क्या आपकी सास इंदिरा गांधी आपसे पूछती थीं कि आप कहां जा रही हैं? इस इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि आपका यानी सोनिया गांधी का अपनी सास इंदिरा गांधी के साथ कैसे पारिवारिक रिश्ते थे? उस साक्षात्कार में अधिकतर बातें सास और बहू के बीच कैसे रिश्ते हैं, परिवार में क्या पसंद किया जाता है, क्या खाया जाता है, रसोई में क्या बनता है जैसे निरर्थक सवाल किए गए थे।
प्रधानमंत्री के खिलाफ झूठा नरैटिव गढ़ने में लगे विपक्षी आईटी सेल
भारत के किसी भी प्रधानमंत्री या किसी भी बड़े नेता ने इतने सारे एकल साक्षात्कार नहीं दिए होंगे, जितने प्रधानमंत्री मोदी ने दिए हैं। जिसमें उनसे हर तरह का सवाल पूछा गया था, लेकिन विपक्षी पार्टियों का आईटी सेल और पुराने जमाने के असली गोदी मीडिया के पत्रकार एक झूठा नैरेटिव गढ़ने में लगे हुए हैं कि भारत में पत्रकारों को सवाल पूछने की आजादी नहीं है।
कांग्रेसी से प्रभावित विदेशी पत्रकार भारत को कर रहे बदनाम
कांग्रेस पार्टी और उसके इकोसिस्टम से प्रभावित होकर कई विदेशी पत्रकार और विदेशी कार्यकर्ता झूठे नैरेटिव फैला रहे हैं कि भारत में प्रेस की स्वतंत्रता नहीं है। विदेशों में एक बड़ी जुगलबंदी है, जो भारत को आगे बढ़ते हुए देखना नहीं चाहती है। वो कांग्रेसी इकोसिस्टम के प्रभाव में प्रधानमंत्री मोदी की कमियां निकालती है और भारत के लोकतंत्र को कमजोर बताती है। यह जुगलबंदी पूरे विश्व में यह फ़ैलाने का प्रयास करती रही है कि भारत में ना धर्म की आजादी है, ना प्रेस की आजादी है, मानव अधिकारों को बिल्कुल कुचल दिया गया है। नॉर्वे में 28 साल की एक अनुभवहीन पत्रकार ने इसी जुगलबंदी के तहत ऐसा करने की कोशिश की थी।














