शिमला में भारतीय ज्ञान परम्परा पर मंथन: कला, अध्यात्म और संस्कृति के संगम ने खींचा सबका ध्यान
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शिमला में भारतीय ज्ञान परम्परा पर मंथन: कला, अध्यात्म और संस्कृति के संगम ने खींचा सबका ध्यान

तीन दिनों तक चले इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में भारतीय कला परम्पराओं को केवल प्रदर्शन या सांस्कृतिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान प्रणाली, दार्शनिक चिंतन, सामाजिक स्मृति और आध्यात्मिक अनुभव के महत्वपूर्ण आधार के रूप में समझने का प्रयास किया गया।

Written byPanchjanyaPanchjanya — edited by Mahak Singh
May 24, 2026, 11:45 am IST
in भारत

शिमला: भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (आईआईएएस), राष्ट्रपति निवास, शिमला में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं प्रदर्शन श्रृंखला “अभिजातकलाकलापेषु भारतीय-ज्ञान-परम्परा (सद्योवृत्तान्तः) : Tracing Roots of Bhāratīya Jñāna Paramparā in Contemporary Practice of Classical Arts” शनिवार को सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गई। 21 से 23 मई 2026 तक आयोजित इस संगोष्ठी में देश-विदेश से आए विद्वानों, कलाकारों, शोधार्थियों एवं कला साधकों ने भारतीय ज्ञान परम्परा, शास्त्रीय कलाओं, सौंदर्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र, अध्यात्म, सांस्कृतिक इतिहास तथा समकालीन विमर्शों के विविध आयामों पर गहन चर्चा की।

भारतीय कला परम्पराएँ

तीन दिनों तक चले इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में भारतीय कला परम्पराओं को केवल प्रदर्शन या सांस्कृतिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान प्रणाली, दार्शनिक चिंतन, सामाजिक स्मृति और आध्यात्मिक अनुभव के महत्वपूर्ण आधार के रूप में समझने का प्रयास किया गया। संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में यह विचार प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया कि भारतीय शास्त्रीय कलाएँ भारतीय सभ्यता की निरंतरता, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय संवेदनशीलता की वाहक रही हैं तथा उनमें निहित सौंदर्यबोध आज भी समकालीन समाज को दिशा देने की क्षमता रखता है। संगोष्ठी में भारतीय नाट्यशास्त्र, रस सिद्धांत, संस्कृत नाटक, भक्ति परम्परा, भारतीय नृत्य शैलियों, योग, संगीत, स्थापत्य, मूर्तिकला, कला-दर्शन, देवदासी परम्परा, नई शिक्षा नीति तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परम्परा जैसे विषयों पर विस्तृत विमर्श आयोजित किए गए। विद्वानों ने इस बात पर बल दिया कि भारतीय कला परम्पराओं की मूल अवधारणा में कला, दर्शन, अध्यात्म और जीवन व्यवहार परस्पर अंतर्संबद्ध रहे हैं तथा इन्हें अलग-अलग खंडों में समझना भारतीय परम्परा की मूल आत्मा के साथ न्याय नहीं करता।

वैश्वीकरण के दौर में भारतीय कला परम्पराओं की चुनौतियाँ और संरक्षण

संगोष्ठी के दौरान यह भी रेखांकित किया गया कि वैश्वीकरण, डिजिटल माध्यमों और बदलती सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के दौर में भारतीय शास्त्रीय कलाओं के समक्ष नई चुनौतियाँ उपस्थित हुई हैं। ऐसे समय में गुरु-शिष्य परम्परा, शास्त्रीय अनुशासन, सांस्कृतिक मूल्यों तथा भारतीय सौंदर्य चेतना को नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुँचाने की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। अनेक वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को समकालीन शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक विमर्श के साथ जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। संगोष्ठी में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों तथा अंतरराष्ट्रीय मंचों से जुड़े विद्वानों एवं कलाकारों ने भाग लिया। प्रो. महेश चंपकलाल ने संस्कृत नाटकों की नाट्यशास्त्रीय परम्परा पर विचार व्यक्त किए, जबकि पद्मभूषण सम्मानित विद्वान डॉ. आर. गणेश ने रस से रसिक तक की सौंदर्य यात्रा को भारतीय काव्य एवं प्रदर्शन परम्परा के संदर्भ में व्याख्यायित किया। गुरु शमा भाटे ने कथक की विकास-यात्रा पर प्रकाश डाला, जबकि प्रो. चूडामणि नंदगोपाल ने भारतीय नृत्य, स्थापत्य, चित्रकला और मूर्तिकला के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया। डॉ. स्वर्णमाल्या गणेश, डॉ. अनुपमा कैलाश, श्री वैभव अरेकर, प्रो. आशीष खोखर, प्रो. मीनाक्षी अय्यर गंगोपाध्याय तथा अन्य विद्वानों एवं कलाकारों ने भारतीय कला परम्पराओं के विविध आयामों पर व्याख्यान एवं प्रदर्शन प्रस्तुत किए।

भारतीय शास्त्रीय प्रस्तुतियों में सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना

संगोष्ठी के अंतर्गत आयोजित प्रदर्शन श्रृंखलाओं में भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की विविध प्रस्तुतियों ने दर्शकों को भारतीय सौंदर्यशास्त्र, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक चेतना के गहरे अनुभव से परिचित कराया। अनुष्ठान चक्र अलारिपु, नृत्योल्लास, गीता गोविंदम्, गांधीगीता, नाद-रस-विमर्श तथा सत-चित-आनंद जैसी प्रस्तुतियों को विशेष सराहना प्राप्त हुई। समापन सत्र में संस्थान की फेलो डॉ. मानसी द्वारा प्रो. उमा वैद्य रचित प्रशस्ति का पाठ किया गया। संगोष्ठी की रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए संयोजक डॉ. उमा अनंतानी ने कहा कि यह आयोजन भारतीय ज्ञान परम्परा और शास्त्रीय कलाओं के अंतर्संबंधों पर गंभीर अकादमिक विमर्श को नई दिशा देने वाला सिद्ध हुआ है। उन्होंने कहा कि संगोष्ठी के माध्यम से कला और ज्ञान परम्परा के बीच अंतर्निहित संबंधों को समकालीन परिप्रेक्ष्य में पुनः स्थापित करने का प्रयास किया गया।

भारतीय संस्कृति : जीवंत परम्परा और चेतना का आधार

मुख्य अतिथि इतिहासकार एवं अतिरिक्त आयकर आयुक्त डॉ. रश्मिता झा ने अपने संबोधन में कहा कि संस्कृति किसी स्थिर उत्पाद अथवा संग्रहालयीय वस्तु का नाम नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना, स्मृति, अनुभव और मूल्यों से निर्मित एक सतत विकसित होने वाली जीवंत प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सांस्कृतिक निरंतरता और आत्मसात करने की क्षमता रही है, जिसके कारण भारतीय कला परम्पराएँ समय, समाज और परिस्थितियों के परिवर्तन के बावजूद अपनी मूल चेतना को अक्षुण्ण बनाए रखने में सफल रही हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय ज्ञान परम्परा का संरक्षण केवल अभिलेखों और ग्रंथों के माध्यम से नहीं, बल्कि जीवंत सांस्कृतिक अभ्यासों, प्रदर्शन परम्पराओं और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से ही संभव है। समापन व्याख्यान में गुजरात साहित्य अकादमी के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ विद्वान डॉ. भाग्येश वासुदेव झा ने भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं, ज्ञान-साधना और सभ्यतागत दृष्टि के व्यापक आयामों पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा का मूल आधार बाह्य उपलब्धियों से अधिक आंतरिक परिष्कार, आत्मानुशासन और चेतना के विकास में निहित है। उन्होंने कहा कि भारतीय कला, साहित्य और दर्शन ने सदियों से मनुष्य और समाज के बीच संतुलन, करुणा और सहअस्तित्व की भावना को सुदृढ़ किया है। उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रीय कलाएँ केवल मंचीय प्रस्तुतियाँ नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि की अभिव्यक्तियाँ हैं, जिनमें अध्यात्म, संवेदना और लोकानुभव का अद्वितीय समन्वय दिखाई देता है।

भारतीय ज्ञान परम्परा के समन्वित दृष्टिकोण पर बल

अध्यक्षीय उद्बोधन में संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली की समग्रता को समझने के लिए कला, साहित्य, दर्शन, इतिहास और अध्यात्म के बीच अंतर्संबंधों को पुनः केंद्र में लाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारतीय परम्परा में ज्ञान को कभी खंडित रूप में नहीं देखा गया, बल्कि जीवन और समाज के विविध आयामों को एक समन्वित दृष्टि से समझने का प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान इस प्रकार के आयोजनों के माध्यम से भारतीय बौद्धिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक परम्पराओं के गंभीर अध्ययन, संवाद और पुनर्पाठ को निरंतर प्रोत्साहित करता रहेगा। कार्यक्रम का समापन युवा प्रतिभागियों द्वारा प्रस्तुत “सत-चित-आनंद” प्रस्तुति, वंदे मातरम् तथा राष्ट्रगान के साथ हुआ। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. राजीव कुमार मिश्रा, लाइब्रेरियन एवं प्रभारी (एआरओ), आईआईएएस द्वारा प्रस्तुत किया गया।

Topics: Indian Classical ArtsIndian AestheticsGuru-Shishya ParamparaIndian Art TraditionIndian CultureIndian PhilosophyIndian knowledge traditionInternational SeminarIndian Knowledge SystemIIAS Shimla
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