भाजपा की बंगाल विजय में दलित समाज की निर्णायक भूमिका
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भाजपा की बंगाल विजय में दलित समाज की निर्णायक भूमिका

बंगाल की धरती के सपूत डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की नींव इसी विश्वास के साथ रखी थी कि एक दिन राज्य और देश में एक राष्ट्रवादी विचार सत्ता के केंद्र में आएगा।

Written byअणिमा सोनकरअणिमा सोनकर
May 23, 2026, 09:37 pm IST
in मत अभिमत, पश्चिम बंगाल
बंगाल में भाजपा की जीत का जश्न मनातीं महिलाएं।

बंगाल में भाजपा की जीत का जश्न मनातीं महिलाएं।

कभी-कभी इतिहास अचानक नहीं बदलता। वह वर्षों की तपस्या, संघर्ष और प्रतीक्षा के बाद एक निर्णायक क्षण में करवट लेता है। बंगाल में भाजपा की प्रचंड जीत के बाद जब सुवेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे, तो वह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था; वह जनसंघ से लेकर भाजपा तक पिछले सात दशकों की वैचारिक यात्रा का राजनीतिक पूर्णविराम भी था।

बंगाल की धरती के सपूत डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की नींव इसी विश्वास के साथ रखी थी कि एक दिन राज्य और देश में एक राष्ट्रवादी विचार सत्ता के केंद्र में आएगा। 2026 में वह दिन आया, जब भाजपा ने पहली बार बंगाल में सरकार बनाई। 294 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 207 सीटें जीतकर पहली बार राज्य में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई। ममता बनर्जी के पंद्रह वर्षों के शासन के बाद आया यह जनादेश केवल सत्ता-विरोधी लहर नहीं था। यह बंगाल के समाज, उसकी आकांक्षाओं और उसके राजनीतिक भरोसे में आए गहरे बदलाव का संकेत था।

बंगाल में भाजपा की जीत का बड़ा कारण

इस परिवर्तन के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की लंबी, धैर्यपूर्ण और बहुस्तरीय रणनीति थी। बंगाल में भाजपा की विजय किसी अचानक बने माहौल का परिणाम नहीं थी। वर्षों तक संगठन खड़ा किया गया। बूथों पर कार्यकर्ताओं को जोड़ा गया। हिंसा और राजनीतिक दबाव के बावजूद कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखा गया। भाजपा ने बंगाल को केवल चुनावी राज्य के रूप में नहीं देखा, बल्कि सामाजिक पुनर्संरचना के एक बड़े अभियान के रूप में समझा। इसीलिए यह जीत केवल सीटों की जीत नहीं है, बल्कि वर्षों के परिश्रम और वैचारिक धैर्य की भी जीत है। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को इससे बड़ी श्रद्धांजलि क्या हो सकती थी कि उनकी जन्मभूमि पर पहली बार भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी।

अनुसूचित जाति के लिए 68 सीटें आरक्षित

लेकिन इस विजय की असली गहराई अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों के परिणामों में दिखाई देती है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए कुल 68 सीटें आरक्षित हैं। 2026 के चुनाव में भाजपा ने इनमें से 51 सीटों पर विजय प्राप्त की, जबकि तृणमूल कांग्रेस केवल 17 सीटों तक सीमित रह गई। यह संख्या अपने आप में बहुत कुछ कहती है। बंगाल में भाजपा की जीत में दलित समाज केवल एक सहयोगी मतदाता समूह नहीं था; वह इस बदलाव की निर्णायक शक्ति बनकर सामने आया।

दलित-बहुल क्षेत्रों में वोट का अंतर

राज्य स्तर पर भाजपा का कुल वोट शेयर 45.84 प्रतिशत और तृणमूल कांग्रेस का 40.80 प्रतिशत रहा, लेकिन दलित-बहुल क्षेत्रों में यह अंतर और स्पष्ट दिखा। भाजपा ने राज्य भर में लगभग 70 प्रतिशत सीटें जीतीं, जबकि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर उसका स्ट्राइक रेट करीब 75 प्रतिशत रहा। इसका अर्थ साफ है कि दलित आरक्षित सीटों ने भाजपा की जीत को सिर्फ सहारा नहीं दिया, बल्कि उसे और मजबूती दी। 2011 की जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में अनुसूचित जाति समुदायों की हिस्सेदारी 23.51 प्रतिशत है। राज्य में मुख्य रूप से 60 से अधिक मान्यता प्राप्त अनुसूचित जाति समुदाय हैं। इसलिए 68 आरक्षित सीटों पर भाजपा की सफलता केवल चुनावी आंकड़ा नहीं, बल्कि बंगाल की सामाजिक शक्ति-संरचना में आए बदलाव का संकेत है।

भाजपा की ताकत, तृणमूल की कमजोरी

भाजपा की सफलता का एक बड़ा कारण यह भी रहा कि उसने दलित समाज को “वोट बैंक” मानने की भूल नहीं की। उसने दलित समाज के भीतर मौजूद अलग-अलग ऐतिहासिक अनुभवों, सांस्कृतिक पहचानों, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और सामाजिक पीड़ाओं को समझने की कोशिश की। यही समझ भाजपा की ताकत बनी और तृणमूल की कमजोरी।

आत्मसम्मान और अस्तित्व से जुड़ा सवाल

दक्षिण बंगाल के मातुआ-नामशूद्र पट्टे में यह बदलाव सबसे अधिक स्पष्ट दिखाई दिया। बोंगांव उत्तर, बोंगांव दक्षिण, गायघाटा, बगदा, राणाघाट और कृष्णगंज जैसे क्षेत्रों में मातुआ समाज दशकों से नागरिकता की अनिश्चितता के साथ जी रहा था। सीमा पार से विस्थापन, पहचान का संकट और दस्तावेजों की असुरक्षा उनके लिए केवल प्रशासनिक परेशानियाँ नहीं थीं। यह उनके आत्मसम्मान और अस्तित्व से जुड़ा सवाल था। तृणमूल कांग्रेस ने लंबे समय तक इस मुद्दे को भावनात्मक और चुनावी रूप से इस्तेमाल किया, लेकिन समाधान की दिशा में कोई निर्णायक कदम नहीं उठाया। मार्च 2024 में नागरिकता संशोधन अधिनियम का क्रियान्वयन मातुआ समाज के लिए केवल एक कानून का लागू होना नहीं था; यह सम्मान की पुनर्स्थापना जैसा था। मोदी सरकार और अमित शाह की राजनीतिक इच्छाशक्ति ने उस पुराने घाव को संवैधानिक उत्तर दिया। ठाकुरबाड़ी की दिशा अचानक नहीं बदली। यह भरोसे की एक लंबी यात्रा का परिणाम था। मातुआ समाज ने अंततः उस दल को चुना जिसने केवल आश्वासन नहीं दिया, बल्कि अधिकार देने की दिशा में ठोस कदम उठाया।

संदेशखाली का संदेश

दूसरा बड़ा मोड़ संदेशखाली में दिखाई दिया। फरवरी 2024 में जब दलित और जनजाति महिलाएं तृणमूल से जुड़े बाहुबली शाहजहाँ शेख के खिलाफ आवाज उठाने लगीं, तो यह केवल एक स्थानीय विरोध नहीं था। इसने बंगाल की राजनीति के उस कठोर सच को सामने ला दिया, जहाँ सत्ता, भय और शोषण का गठजोड़ गरीब और कमजोर समुदायों पर भारी पड़ रहा था। तृणमूल स्वयं को कमजोर तबकों की रक्षक बताती रही, लेकिन संदेशखाली ने इस दावे को गहरी चोट पहुँचाई। दलित और वनवासी महिलाओं की पीड़ा ने बंगाल के ग्रामीण समाज में व्यापक नैतिक आक्रोश पैदा किया। यह मुद्दा केवल महिला सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा। यह सवाल बन गया कि सत्ता आखिर किसके साथ खड़ी है – पीड़ित के साथ या तृणमूल की अपराधी संरचना के साथ? भाजपा ने इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठाया, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह था कि दलित समाज ने इसे अपनी सुरक्षा, गरिमा और सम्मान से जुड़ा प्रश्न माना।

मोदी सरकार की केंद्रीय योजनाओं का प्रभाव

भाजपा की जीत का तीसरा आधार मोदी सरकार की वे केंद्रीय योजनाएँ रहीं, जो सीधे दलित घरों तक पहुँचीं। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, जल जीवन मिशन, पीएम किसान निधि, मुफ्त अन्न योजना, लखपति दीदी, विश्वकर्मा योजना और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण ने गरीब परिवारों के जीवन में वास्तविक बदलाव पैदा किया। तृणमूल शासन में सरकारी लाभ पाने के लिए आम जनता को अक्सर स्थानीय नेता, पंचायत तंत्र और पार्टी नेटवर्क पर निर्भर रहना पड़ता था। यह निर्भरता गरीब मतदाता को नागरिक के बजाय याचक बना देती थी। मोदी सरकार की योजनाओं ने इस मनोविज्ञान को बदला। जब पैसा सीधे खाते में पहुँचा, घर का सपना पूरा हुआ, गैस सिलेंडर मिला, नल से पानी आया और राशन की सुरक्षा बनी रही, तब दलित परिवारों ने महसूस किया कि वे किसी स्थानीय नेता की कृपा पर नहीं, बल्कि अपने अधिकार पर खड़े हैं। खासकर दलित महिलाओं ने इस परिवर्तन को अधिक गहराई से महसूस किया। वे केवल योजनाओं की लाभार्थी नहीं रहीं; वे राजनीतिक निर्णय की सक्रिय भागीदार बन गईं। भाजपा ने इसी लाभार्थी चेतना को सम्मान की राजनीति में बदला।

सामाजिक समझ

भाजपा की सामाजिक समझ ने भी इस जीत में बड़ी भूमिका निभाई। बंगाल का दलित समाज एकरूप नहीं है। उत्तर बंगाल में राजबंशी दलितों के लिए पहचान, सीमावर्ती असुरक्षा और विकास की आकांक्षा प्रमुख रही। मेखलीगंज, माथाभांगा और सीतलकुची जैसे क्षेत्रों में पहचान और प्रतिनिधित्व का प्रश्न महत्वपूर्ण था। दक्षिण बंगाल में मातुआ-नामशूद्र दलित समाज के लिए नागरिकता और सांस्कृतिक सम्मान केंद्रीय मुद्दा बना। जंगलमहल के पुरुलिया, बांकुड़ा और झाड़ग्राम में दलितों के लिए सुरक्षा, रोजगार और राज्य हिंसा से मुक्ति की भावना अधिक मजबूत थी। बागदी, पोड, मालो, डोम और अन्य उपजातीय समुदायों की अपनी-अपनी पीड़ाएँ और अपेक्षाएँ थीं।

भाजपा ने इन सबको एक ही नारे में समेटने की गलती नहीं की। उसने स्थानीय समाज की आकांक्षाओं के अनुसार संवाद बनाया। यही वह बिंदु था जहाँ तृणमूल पिछड़ गई। तृणमूल का मॉडल ऊपर से संचालित संरक्षणवाद पर आधारित था, जबकि भाजपा ने पहचान, सम्मान, अधिकार और भागीदारी को जोड़कर नया सामाजिक गठबंधन खड़ा किया।

भाजपा के संगठन की भूमिका

इस परिवर्तन के पीछे भाजपा के संगठन की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण रही। मोदी-शाह के नेतृत्व में बूथ सशक्तिकरण अभियान, भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा की जमीनी सक्रियता, पन्ना प्रमुख मॉडल और स्थानीय कार्यकर्ताओं की निरंतर उपस्थिति ने दलित बहुल क्षेत्रों में भाजपा के प्रति भरोसा पैदा किया। बंगाल जैसे कठिन राजनीतिक वातावरण में, जहाँ हिंसा, धमकी और बूथ कब्जे की शिकायतें लंबे समय से राजनीति का हिस्सा रही हैं, वहाँ भाजपा कार्यकर्ताओं का टिके रहना अपने आप में एक संदेश था। दलित मतदाता ने देखा कि भाजपा केवल चुनाव के समय नहीं आती, बल्कि जोखिम उठाकर भी साथ खड़ी रहती है। भय की राजनीति का उत्तर संगठन ने दिया। यही कारण है कि 2026 में अनेक स्थानों पर मतदान केवल सत्ता-विरोध का मतदान नहीं था, बल्कि भय से मुक्ति का मतदान भी था।

तृणमूल का दलित-अल्पसंख्यक गठबंधन

पंद्रह वर्षों तक तृणमूल का दलित-अल्पसंख्यक गठबंधन बंगाल की सत्ता का आधार माना जाता रहा, लेकिन समय के साथ यह गठबंधन कमजोर होने लगा। कट-मनी, पंचायत दबाव, स्थानीय बाहुबल और राजनीतिक संरक्षणवाद ने उसके भीतर असंतोष पैदा किया। दलित समाज ने महसूस किया कि तृणमूल के शासनकाल में उसे चुनावी गणित में तो जगह दी गई, लेकिन नीति, नेतृत्व और सम्मान में नहीं। स्थानीय स्तर पर अपमान की अनुभूति बनी रही और सुरक्षा का भरोसा कमजोर पड़ता गया। भाजपा ने इसी खाली जगह को भरा। उसने दलित मतदाता से कहा कि उसकी राजनीति भय, दया और बिचौलियों पर आधारित नहीं होनी चाहिए। वह नागरिकता, सुरक्षा, सम्मान और अवसर पर आधारित हो सकती है। यही संदेश निर्णायक सिद्ध हुआ।

पूर्वी भारत की राजनीति में बड़े परिवर्तन का संकेत

सुवेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री बनना और बंगाल में भाजपा की पहली सरकार का गठन केवल राज्य की राजनीति तक सीमित घटना नहीं है। यह पूर्वी भारत की राजनीति में एक बड़े परिवर्तन का संकेत है। बंगाल अब भाजपा के लिए पूर्वी भारत का मजबूत प्रवेश-द्वार बन चुका है। विधानसभा की 51 अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों पर भाजपा की विजय से जो सामाजिक आधार बना है, वह 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के विस्तार की निर्णायक धुरी बन सकता है।

बंगाल के दलितों ने इस चुनाव में केवल वोट नहीं दिया। उन्होंने एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया है कि अब उनकी राजनीति भय से नहीं, सम्मान से चलेगी; कृपा से नहीं, अधिकार से चलेगी; और बिचौलियों से नहीं, सीधी लोकतांत्रिक भागीदारी से तय होगी। यही 2026 के बंगाल जनादेश का सबसे बड़ा संदेश है।

 

 

 

Topics: तृणमूल कांग्रेसशुभेंदु अधिकारीअनुसूचित जनजातिबंगाल में भाजपाबंगाल चुनाव 2026बंगाल में दलित समाज
अणिमा सोनकर
अणिमा सोनकर
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की सहायक प्रोफेसर हैं तथा भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा की राष्ट्रीय सोशल मीडिया प्रमुख हैं। [Read more]
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