आज पश्चिम बंगाल के फलता विधानसभा की सीट पर पुर्नचुनाव हैं। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार को एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ है, लेकिन ममता बनर्जी के बुरे दिनों की शुरुआत हो चुकी है। ममता बनर्जी के सबसे ताकतवर नेताओं के तेवर भी अब नरम पड़ने लगे हैं। ममता बनर्जी के नजदीकी नेताओं ने अब कानून के आगे झुकना शुरू कर दिया है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल जहांगीर खान ही है। जहांगीर खान पश्चिम बंगाल की फलता सीट से चुनाव लड़ रहा था और इस सीट पर भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला था।
लेकिन जहांगीर खान ने तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने से इंकार करने के बाद ना सिर्फ तृणमूल कांग्रेस पार्टी के लिए गहरा झटका है, बल्कि यह दिखाता है कि अब तृणमूल कांग्रेस के विखंडन के दिन शुरू ही गया है। तृणमूल कांग्रेस पार्टी के लिए यह सिर्फ एक सीट का मसला ना होकर पूरे प्रदेश के लिए एक उद्धरण बन गया है कि अब उसके नेतागण कभी भी हुए किसी भी हालात में पार्टी को छोड़ सकते हैं। अब आने वाले स्थानीय निकाय और अन्य किसी भी प्रकार के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस पार्टी उम्मीदवार देने से पहले गहन मंथन करेगी।
फलता विधानसभा सीट तृणमूल कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे मजबूत सीटों में से एक हुआ करती थी और पार्टी इसे अपनी झोली की सीट मानती थी। मगर यह तृणमूल कांग्रेस पार्टी के भय और आतंक का परिणाम था, ना कि जनसमर्थन का। इसका परिणाम सामने आ गया है और भाजपा सरकार के गठन के साथ ही साड़ी हकीकत खुलकर सामने आ गई।
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फलता विधानसभा सीट पर पार्टीवार प्रदर्शन

2024 के लोकसभा के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस पार्टी को प्रतिशत में सबसे अधिक मत इसी सीट पर 89 प्रतिशत से अधिक मत मिला था। वहीं कुल मतों के हिसाब से कैनिंग पूरब सीट के बाद दूसरे नंबर पर इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस पार्टी को मत मिला था।
सबसे बड़ी बात है कि जहांगीर खान द्वारा उम्मीदवारी वापस लेने के बाद कोई भी दल उसके समर्थन में नहीं उतरा कि जहांगीर खान के साथ अन्याय हो रहा है। जहांगीर खान और उसके जैसे नेता जनता के दुश्मन के समान थे। ऐसे नेता जबरदस्ती भय दिखा कर मतदान करवाया करते थे, मगर अब जनता के भय से ऐसे नेता खुद ही कानून के आगे नतमस्तक होते जा रहे हैं। जहांगीर खान से न सिर्फ भाजपा, बल्कि वाम दल और कांग्रेस पार्टी के नेतागण भी आतंकित थे और अब वे सभी एक साथ भयमुक्त माहौल में उन्मुक्त सास ले रहे हैं।
सरकार बदलने के साथ ही बदलने लगा जहांगीर का तेवर
जहांगीर खान की भाषा और तेवर सरकार बदलने के साथ ही बदल गया है। जहांगीर खान के मुताबिक, नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी फलता के विकास के लिए एक स्पेशल पैकेज दे रहे हैं और इसीलिए जहांगीर खान अपना नाम चुनाव से वापस ले रहा है। 29 अप्रैल को वोटिंग के दौरान फलता सीट पर ईवीएम में गड़बड़ी पाई गई थी और इसी की वजह से 21 मई को यहां पर चुनाव आयोग ने दोबारा से मतदान कराने का आदेश दिया था।
पश्चिम बंगाल के हालात में आया परिवर्तन
नई सरकार के बनने के एक पखवाड़े के अंदर में ही अब पश्चिम बंगाल के हालात में आमूलचूल परिवर्तन हो गया है। पश्चिम बंगाल का उद्धरण न सिर्फ देश बल्कि विदेशों में भी भारतीय लोकतंत्र की असल ताकत को दिखाता है। लोकतंत्र में हर राजा को एक दिन प्यादा जरूर बनना पड़ता है। सत्ता का एकमात्र हुए सबसे बड़ा सत्य यह है कि वह हमेशा बदलती रहती है और चुनावी नतीजों के बाद से पश्चिम बंगाल में भी बिल्कुल यही हो रहा है।
जहांगीर खान की गिनती पार्टी के बड़े ताकतवर और चंद नेताओं में की जाती थी। मगर जहांगीर खान का इस तरह से चुनावी मैदान छोड़कर भागना पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए हिम्मत तोड़नेवाला है। अब पार्टी में भगदड़ मच चुकी है और पार्टी का जमीनी नेता अब पार्टी छोड़कर अब अन्य दलों का दामन थाम रहे हैं।
टीएमसी के ताकतवर नेता रहे हैं जहांगीर खान
तृणमूल कांग्रेस पार्टी के सरकार के समयकाल में पूरे पश्चिम बंगाल में जहांगीर खान को तृणमूल कांग्रेस के सबसे ताकतवर और दबंग नेताओं में गिना जाता था. जहांगीर खान को ममता बनर्जी का आशीर्वाद के साथ ही ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का सबसे खास आदमी माना जाता था. चुनाव के दौरान जहांगीर खान चुनाव आयोग के एक ऑब्जर्वर आईपीएस अफसर अजयपाल शर्मा से भी भिड़ गया था और जहांगीर खान अपनी चुनावी रैली में कहता था वो पुष्पा है और झुकेगा नहीं.
















