पाकिस्तान, चीन और अमेरिका के रिश्तों को लेकर हाल ही में कई नई बातें सामने आई हैं। ड्रॉप साइट न्यूज़ की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने के लिए धीरे-धीरे चीन से दूरी बनानी शुरू कर दी। इसका असर चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी CPEC पर भी पड़ा है।
CPEC की रफ्तार धीमी, अमेरिका से बढ़ी नजदीकी
CPEC चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का बड़ा हिस्सा है। इस परियोजना के तहत पाकिस्तान में सड़कें, रेलवे लाइन, बिजली परियोजनाएं और ग्वादर पोर्ट का विकास होना था। इसकी कुल लागत करीब 65 अरब डॉलर बताई जाती है। उम्मीद थी कि इससे लाखों नौकरियां पैदा होंगी और पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। लेकिन अब यह प्रोजेक्ट पहले जैसी रफ्तार से आगे बढ़ता नहीं दिख रहा। रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में इमरान खान की सरकार गिरने के बाद पाकिस्तान की सेना ने अमेरिका के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश तेज की। उस समय के सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने अमेरिका का दौरा किया और वहां के बड़े नेताओं से मुलाकात की। दावा है कि उन्होंने पाकिस्तान को चीन से कुछ दूरी बनाने और अमेरिका के करीब लाने का भरोसा दिया था।
हालांकि, पाकिस्तान पूरी तरह चीन से अलग नहीं हुआ। चीन आज भी पाकिस्तान का बड़ा सैन्य सहयोगी बना हुआ है। दोनों देश मिलकर रक्षा तकनीक पर काम कर रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। पिछले साल भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान भी चीन ने पाकिस्तान को समर्थन दिया था। लेकिन CPEC की धीमी रफ्तार ने दोनों देशों के रिश्तों में खटास जरूर पैदा की है। चीन ने पाकिस्तान की बड़ी रेल परियोजना ML-1 के दूसरे चरण के लिए फंडिंग रोक दी है। दूसरी तरफ पाकिस्तान में चीनी इंजीनियरों और प्रोजेक्ट्स पर हमलों ने भी चीन की चिंता बढ़ाई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन और पाकिस्तान के बीच ग्वादर पोर्ट को लेकर मतभेद हैं। चीन वहां स्थायी नौसैनिक सुविधा चाहता है, लेकिन पाकिस्तान इस पर पूरी तरह तैयार नहीं है। वहीं पाकिस्तान चाहता था कि चीन उसे न्यूक्लियर पावर्ड सबमरीन दे, लेकिन चीन ने इससे इनकार कर दिया।
















