पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के पॉश इलाकों में दशहत का प्रयाय बन चुके ‘सोना पप्पू’ उर्फ बिस्वजीत पोद्दार को कल प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गिरफ्तार कर लिया। ईडी ने साल्टलेक के सीजीओ कॉम्प्लेक्स में करीब 10 घंटे की लंबी पूछताछ के बाद उसे मनी लॉन्ड्रिंग और जबरन वसूली (एक्सटॉर्शन) के गंभीर मामलों में संलिप्ता के आरोप में हिरासत में लिया।
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद इस गिरफ्तारी को न सिर्फ एक अपराधी बल्कि उस समानांतर सत्ता के खात्मे की शुरुआत माना जा रहा है जिसने करीब डेढ दशक तक कोलकाता को अपने सिंडिकेट के दम पर चलाया। आइए जानते हैं कि आखिर कौन था यह ‘सोना पप्पू’ और कैसे काम करता था उसका काला साम्राज्य।
कौन है सोना पप्पू?
बिस्वजीत पोद्दार जिसे कोलकाता के अंडरवर्ल्ड में ‘सोना पप्पू’ के नाम से जाना जाता है, वह खुद को एक पश्चिम बंगाल के एक आम नागरिक की तरह पेश करता था। वह कभी भी किसी बड़े अपराधी की तरह छिपकर नहीं रहा बल्कि कोलकाता के आलीशान इलाकों में खुलेआम घूमता था। उसकी दहशत ऐसी थी कि कोलकाता के पॉश इलाके जैसे कसबा, गोलपार्क और जादवपुर में उसकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था।
सोना पप्पू की असली ताकत उसकी बंदूकें नहीं बल्कि उसे मिला हुआ वह राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण था जो पिछले 15 सालों के दौरान उसे मिलता रहा। वह खुद को एक ‘बिजनेसमैन’ कहता था, लेकिन उसका धंधा बंदूक की नोक पर जमीनें हथियाना और बिल्डरों से जबरन पैसा वसूलना था।
कैसे काम करता था सोना पप्पू का ‘सिंडिकेट’?
कोलकाता के डॉन उर्फ सोना पप्पू का साम्राज्य पूरे कोलकाता में फैला था। वह कोलकाता की अर्थव्यवस्था को भीतर से खोखला कर रहा था। उसके काम करने के दो तरीके थे।
1. जमीन पर कब्जा करना
उसका सबसे बड़ा धंधा दक्षिण कोलकाता की बेशकीमती जमीनों को निशाना बनाना था। उसके पास बकायदा एक टीम थी जो उन जमीनों की पहचान करती थी जिनके मालिक एनआरआई थे या जिनकी जमीनें कानूनी विवादों में फंसी थीं। ऐसी जमीन का पता लगते ही उसके हथियारों से लैस गुर्गे वहां पहुंच जाते थे। वह असली मालिकों को डरा-धमकाकर या कानूनी दस्तावेजों में हेरफेर कर, करोड़ों की जमीन कौड़ियों के भाव उसके नाम करवा लेते थे।
2. बिल्डरों से रंगदारी वसूलना
कोलकाता के रीयल-एस्टेट सेक्टर में काम करने वाला हर बिल्डर सोना पप्पू के नाम से डरता था। उसका खौफ ऐसा था कि किसी भी नई इमारत की नींव रखने से पहले उसके सिंडिकेट को करोड़ों की रंगदारी (कट मनी) पहुंचानी पड़ती थी। जो बिल्डर मना करता, उसकी साइट पर बमबाजी करना, मजदूरों को पीटना और काम बंद करवा देना उसके लिए आम बात थी। हाल ही में रवींद्र सरोबर इलाके में हुई बमबारी इसी सिंडिकेट ने करवाई थी।
राजनीतिक संरक्षण और खाकी के साथ गठजोड़
ईडी की जांच में खुलासा हुआ है कि, सोना पप्पू की असली ताकत कोई गैंगस्टर नहीं बल्कि कोलकाता पुलिस की स्पेशल ब्रांच का डिप्टी कमिश्नर शांतनु सिन्हा बिस्वास था। शांतनु सिन्हा जो कभी ममता बनर्जी के गढ़ कालीघाट थाने के प्रभारी था वो सीधे तौर पर सोना पप्पू के अवैध धंधों से होने वाली कमाई में हिस्सेदार था। पुलिस भी उसके साथ थी और जब भी कोई पीड़ित बिल्डर या आम आदमी थाने में जाकर सोना पप्पू के खिलाफ शिकायत करने की हिम्मत करता तो थानेदार उसे डांटकर भगा देते थे।
ऊपर से यानी शांतनु सिन्हा के निर्देश थे कि सोना पप्पू के खिलाफ कोई डायरी या एफआईआर दर्ज नहीं होगी। कानून पूरी तरह से उसके सिंडिकेट के आगे घुटने टेक चुका था।
सत्ता का था अहंकार
सोना पप्पू के दुस्साहस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब केंद्रीय एजेंसियां उसे ढूंढ रही थीं और वह 3 महीने से भगोड़ा था, तब भी वह कोलकाता में ही था। वह फेसबुक पर लाइव आकर पुलिस और एजेंसियों को चुनौती देता था। उसे यकीन था कि जब तक राज्य में पुरानी सरकार का हाथ उसके सर पर है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा।
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नई सरकार के आते ही टूट गया सिंडिकेट
पश्चिम बंगाल की सत्ता बदलते ही ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए इस नेटवर्क को तोड़ना शुरू किया। पहले फाइनेंसर जय कामदार को पकड़ा गया फिर उसके बयानों के आधार पर डीसी शांतनु सिन्हा के घर 15 घंटे छापेमारी हुई। पुलिस की सुरक्षा हटने के बाद सोना पप्पू पूरी तरह अलग-थलग पड़ गया। सोमवार को जब उसने ईडी दफ्तर में सरेंडर किया तो वह मीडिया के सामने जो-जोर से बोल रहा था कि उसने कुछ नहीं किया। लेकिन जब ईडी ने उसके सामने उसके बैंक खातों के दस्तावेज और उसके पार्टनर डीसी शांतनु सिन्हा के कबूलनामे रखे तो उसका झूठ पकड़ा गया।
इस गिरफ्तारी के साथ ही कोलकाता में ‘सिंडिकेट राज’ का एक काला अध्याय खत्म हो गया है। अब यह जांच उन रसूखदार नेताओं तक पहुंचने वाली है जो इस डॉन के साथ मिलकर सरकारी खजाने और आम जनता की मेहनत की कमाई पर हाथ साफ कर रहे थे। जल्द ही ऐसे लोग कानून की गिरफ्त में होंगे।

















