पश्चिम बंगाल, असम और केरल के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद अब कांग्रेस पार्टी नए मुस्लिम लीग के तौर पर तब्दील होती जा रही है। असम में कांग्रेस के जो 19 विधायकों में 18 मुस्लिम हैं और एक अन्य गैर मुस्लिम विधायक सुरक्षित सीट से निर्वाचित हुआ है। कांग्रेस पार्टी जो खुद को धर्मनिरपेक्ष दल बताती है उसका असम में 95% प्रतिनिधित्व केवल एक ही मुस्लिम समुदाय से ही है। असम विधानसभा में विपक्षी दलों के 24 विधायकों में 22 मुस्लिम हैं, जो 90 प्रतिशत से भी अधिक हैं।
इतना ही नहीं बल्कि, केरल राज्य जो अपनी शिक्षा और राजनीतिक इतिहास के लिए जाना जाता है, वहां भी कुल 35 मुस्लिम विधायकों में 30 कांग्रेस पार्टी नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक गठबंधन से हैं। इनमें कांग्रेस पार्टी के आठ और इसके सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सभी 22 विधायक मुस्लिम वर्ग से ही हैं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी के दो विधायक हैं जो दोनों ही मुस्लिम समुदाय के हैं।
नए भारत की मुस्लिम लीग कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी का इन तीन राज्यों में चुनावी प्रदर्शन यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या कांग्रेस पार्टी अब भी धर्मनिरपेक्ष पार्टी है? क्या कांग्रेस नए भारत की मुस्लिम लीग बन गई है? कांग्रेस पार्टी के इस प्रदर्शन के बाद असम की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने भी कांग्रेस को मुस्लिम लीग के नाम से नामकरण किया है।
असम की राजनीति काफी जटिल है। असम प्रदेश खुद की अलग पहचान, अपनी संस्कृति और बांग्लादेशियों के घुसपैठ से पीड़ित रही है। एक जमाने में असम में कांग्रेस पार्टी के साथ समाज के हर वर्ग के लोग जैसे ऊपरी असम के चाय बागान के मजदूर, जनजातीय वर्ग के साथ ही बंगाली हिंदू भी थे। मगर आज वहीं कांग्रेस पार्टी और सम्पूर्ण विपक्ष के पास मात्र दो हिंदू चेहरे ही बचे है। इनमें एक रायजोर दल के अखिल गोगोई और दूसरे कांग्रेस के जय प्रकाश दास हैं, जो लखीमपुर जिले के नौबोइचा विधानसभा सीट से निर्वाचित हुए है। यह स्पष्ट बताता है कि अब कांग्रेस पार्टी वर्तमान में मुस्लिम लीग का दूसरा अवतार ले चुकी है। तृणमूल कांग्रेस पार्टी का भी असम में एकमात्र विधायक मुस्लिम ही है।
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विश्वास खो रही कांग्रेस
यह महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस पार्टी जैसी राष्ट्रीय दल हिंदुओं को अपने प्रतिनिधित्व से बाहर कर देती है तो वो हिंदू वर्ग में पूरे राष्ट्र के स्तर पर अपना विश्वास खोना शुरू कर देती है। कांग्रेस पार्टी के इस नए स्वरुप के लिए सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के धर्मनिरपेक्षता पर सबसे बड़ा प्रहार उसके पूर्व सहयोगी और असम में मुस्लिम मतों के आधार पर राजनीति करने वाले एआईयूडीएफ प्रमुख मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने किया है। वे पिछले दो दशकों से असम की राजनीति में एआईयूडीएफ बड़ी राजनितिक ताकत हैं वो भी खासकर बंगाली मुस्लिम मतदाताओं के बीच। मगर इस बार के असम के चुनाव परिणामों में इस दल को भी पूरी तरह से सफाया कर दिया गया है। एक समय असम की राजनीती में एआईयूडीएफ बड़ी ताकत होती थी, जो अब सिकुड़ कर महज दो विधायकों की पार्टी ही बची है।
बदरुद्दीन के कांग्रेस पर आरोप
बदरुद्दीन अजमल ने कांग्रेस पार्टी पर आरोप लगाते हुए कहा है कि पार्टी ने इस चुनाव में कोई सार्थक राजनीति नहीं किया, बल्कि मुस्लिम मतदाताओं को भाजपा और असम के मुख्यमंत्री हिमंता विस्व सरमा और हिंदुत्व का डर दिखाकर उन्हें अपनी ओर किया है। दूसरे शब्दों में अजमल के अनुसार, राजनीति में डर सबसे बड़ा हथियार है और कांग्रेस ने इस हथियार का बखूबी इस्तेमाल किया है। अजमल ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि पार्टी ने मुस्लिम मतदाताओं को भय दिखाया कि अगर उनके मतों में बंटवारा हुआ या एआईयूडीएफ को मत दिया तो उसका सीधा फायदा भाजपा को होगा। इस डर और भय के कारण मुस्लिमों ने कांग्रेस को ही मत दिया।
असम, केरल और पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम यह स्पष्ट दर्शाता है कि कांग्रेस पार्टी ने हिन्दू और समाज के अन्य वर्गों का समर्थन पूरी तरह से खो दिया है और सिर्फ मुस्लिम समुदाय के मतों पर ही आकर सिमट गई है।

















