भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30(1) धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक समुदायों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का मौलिक अधिकार देता है। यह प्रावधान देश की विविधता और बहुलवाद की रक्षा के लिए बनाया गया था, ताकि कोई भी समुदाय शिक्षा के अधिकार से वंचित न रहे। परंतु आज, सात दशक बाद, यही प्रावधान एक ऐसे हथियार में बदल गया है जिसका उपयोग कानूनी छूट लेने, सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने, विदेशी चंदा इकट्ठा करने और यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन जैसी गतिविधियों को संचालित करने के लिए किया जा रहा है।
क्या कहती है एनसीपीसीआर की रिपोर्ट
राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के बाद 2021 में प्रकाशित 116 पृष्ठों की राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने अपनी रिर्पोट में अल्पसंख्यक संस्थानों के असंतुलन को उजागर करते हुए कहा था कि कुल अल्पसंख्यक विद्यालयों में 62.50 प्रतिशत छात्र गैर-अल्पसंख्यक समुदायों के हैं। 5 से 15 वर्ष के 4 करोड़ 81 लाख अल्पसंख्यक बच्चों में से केवल 8 प्रतिशत ही इन संस्थानों में पढ़ते हैं। मात्र 8.76 प्रतिशत छात्र सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि के हैं, और केवल 4.18 प्रतिशत बच्चों को मुफ्त ड्रेस, पुस्तकें और छात्रवृत्ति जैसे लाभ मिले।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 85.33 प्रतिशत अल्पसंख्यक स्कूलों ने अपना प्रमाणपत्र 2006 के बाद लिया, यानी ठीक उस समय के बाद जब 93वें संविधान संशोधन ने इन्हें आरटीई से छूट मिली थी। इस रिर्पोट में इस बात का भी उल्लेख किया गया था कि ईसाई समुदाय अल्पसंख्यक आबादी का केवल 11.54 प्रतिशत हैं, लेकिन कुल धार्मिक अल्पसंख्यक स्कूलों का 71.96 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं के पास है। इन ईसाई स्कूलों में 74 प्रतिशत छात्र गैर-ईसाई हैं। दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय 69.18 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी के बावजूद केवल 22.75 प्रतिशत स्कूल चलाता है। इन मुस्लिम समुदाय के स्कूलों में सबसे कम 20.29 प्रतिशत गैर-मुस्लिम हैं। सिख 9.78 प्रतिशत आबादी के साथ 1.54 प्रतिशत स्कूल, बौद्ध 3.83 प्रतिशत आबादी के साथ 0.48 प्रतिशत स्कूल और जैन 1.9 प्रतिशत आबादी के साथ 1.56 प्रतिशत स्कूल चलाते हैं।
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जैन स्कूलों में हैं सबसे अधिक गैर अल्पसंख्यक छात्र
जैन समुदाय के स्कूलों में सबसे अधिक 81.41 प्रतिशत गैर-अल्पसंख्यक छात्र हैं। सिख स्कूलों में 75.50 प्रतिशत गैर-सिख हैं। यह असंतुलन इस व्यवस्था की खोखली नींव को उजागर करता है। राज्यवार स्थिति और अधिक असंतोषजनक है। पश्चिम बंगाल में 92.47 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी मुस्लिम है और केवल 2.47 प्रतिशत ईसाई है। परंतु वहाँ 114 ईसाई अल्पसंख्यक स्कूल हैं और केवल 2 मुस्लिम अल्पसंख्यक दर्जे वाले स्कूल। उत्तर प्रदेश में ईसाई आबादी 1 प्रतिशत से भी कम है, फिर भी 197 ईसाई अल्पसंख्यक स्कूल हैं।
टीएमए पाई फांउडेशन बनाम भारत सरकार (2002) मामले में 11 जजों की संवैधानिक पीठ ने अल्पसंख्यक संस्थानों को व्यापकता प्रदान करते हुए कहा था कि अल्पसंख्यक दर्जे का निर्धारण राज्य स्तर की जनसंख्या के आधार पर होना चाहिए। इस फैसले में यह भी कहा गया था कि अल्पसंख्यक संस्थान द्वारा गैर-अल्पसंख्यक छात्रों को ‘उचित सीमा तक‘ प्रवेश देना अनुच्छेद 29(2) का उल्लंघन नहीं है। किंतु कोर्ट ने इस ‘उचित सीमा‘ को कभी परिभाषित नहीं किया, यही वह कानूनी खामी है जिसका सबसे अधिक दुरुपयोग हुआ है।
प्रमाती एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत सरकार (2014) के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आरटीई अधिनियम की धारा 12(1)(ब) के अंतर्गत यह प्रावधान कर दिया कि अल्पसंख्यक स्कूलों को गरीब बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित नहीं करनी होंगी। इसके बाद अल्पसंख्यक दर्जा लेने वाले संस्थानों की संख्या में अचानक उछाल आया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मामले (2024) की 7 जजों की संवैधानिक पीठ ने अपने फैसले में यह स्पष्ट रूप से कहा कि गैर-अल्पसंख्यक छात्रों को प्रवेश देने से अल्पसंख्यक चरित्र नहीं जाता, यानी छात्र संख्या को आज भी अल्पसंख्यक दर्जे की कसौटी नहीं माना गया है।
इन्हीं कानूनों का लाभ लेकर अल्पसंख्यक संस्थान एक साथ तीन स्रोतों से लाभ लेते हैं, सरकारी अनुदान, विदेशी चंदा और छात्रों से ऊंची फीस। इसके बावजूद न आरटीई मानते हैं और न आरटीआई का जवाब देते हैं। इन स्थितियों में पारदर्शिता लाते हुए सरकार को इसे और अधिक व्यवहारिक और समाजानुकूल बनाने पर विचार करना चाहिए। इस समस्या के समाधान के लिए एक बहुस्तरीय नीतिगत ढाँचे की आवश्यकता है। जिसमें निम्न बातों पर विचार किये जाने की आवश्यकता है। पहला, अल्पसंख्यक दर्जे की नई परिभाषा बननी चाहिए। अल्पसंख्यक दर्जा तीन शर्तें एक साथ पूरी होने पर मिले, ट्रस्ट प्रबंधन में अल्पसंख्यक बहुमत, कम से कम 15 प्रतिशत छात्र उसी समुदाय के और संस्था का उद्देश्य उस समुदाय की शिक्षा हो न कि व्यावसायिक लाभ के लिए।
वर्तमान में दिया जाने वाला अल्पसंख्यक दर्जा है स्थायी
दूसरा, वर्तमान में एनसीएमईआई द्वारा प्रदान किया जाने वाला अल्पसंख्यक दर्जा स्थायी है और इसके नवीनीकरण की आवश्यकता नहीं होती। यह सबसे बड़ी खामी है। हर 5 वर्ष में अनिवार्य रूप से इसकी समीक्षा अति आवश्यक है। तीसरा, जो संस्थान सरकारी अनुदान लेते हैं उन्हें आरटीई की धारा 12(1)(ब) का पालन करना ही होगा, अर्थात 25 प्रतिशत सीटें वंचित बच्चों को देनी होंगी। सार्वजनिक धन लेने वाला संस्थान सार्वजनिक जवाबदेही से नहीं बच सकते। चैथा, सरकारी अनुदान प्राप्त सभी अल्पसंख्यक संस्थान आरटीई के दायरे में आने चाहिए। पाँचवाँ, प्रत्येक अल्पसंख्यक संस्थान जो विदेशी चंदा लेता है, उसकी विदेशी फंडिंग का सार्वजनिक ऑडिट प्रतिवर्ष अनिवार्य रूप से होना चाहिए।
जब कोई संस्थान शिक्षा के नाम पर समाज और सरकार से सुविधाएं लेता है, तो उसे यह साबित करने की जवाबदेही भी लेनी होगी कि वह वाकई उस समुदाय की सेवा कर रहा है। एनसीपीसीआर ने भी अपनी रिपोर्ट में राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों के न्यूनतम प्रतिशत के संबंध में विशिष्ट दिशा-निर्देश निर्धारित किए जाएं। इस दिशा में गंभीरता से प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। इसका सबसे व्यावहारिक समाधान यह है कि अल्पसंख्यक दर्जा उसी संस्थान को मिले जहाँ कम से कम 15 प्रतिशत छात्र उसी अल्पसंख्यक समुदाय के हों। इसे लागू करने का सबसे कानूनी रूप से मजबूत तरीका यह होगा कि इसे दर्जा देने की शर्त के रूप में नहीं, बल्कि दर्जा बनाए रखने की शर्त के रूप में लागू किया जाए, जो अनुच्छेद 30 के अधिकार से भी टकराव नहीं होगा। अनुच्छेद 30 एक समुदाय की शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए बनाया गया था, किसी व्यावसायिक संस्था को कानूनी कवच देने के लिए नहीं।
अधिकार के साथ आते हैं दायित्व
न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े ने एक बार कहा था कि संविधान के अधिकार असीमित नहीं होते, उनके साथ दायित्व भी आते हैं। 15 प्रतिशत अल्पसंख्यक छात्रों का न्यूनतम मानक, अल्पसंख्यक दर्जे की 5 वर्षीय समीक्षा, आरटीई का विस्तार और विदेशी फंडिंग का पारदर्शी ऑडिट, ये चार कदम अल्पसंख्यक अधिकारों को समाप्त नहीं करते, बल्कि उन्हें उनके मूल उद्देश्य के और अधिक पास लाते है। जिस दिन यह नीति लागू होगी, उसी दिन भारत की शिक्षा व्यवस्था में वास्तविक समानता और न्याय की नींव पड़ेगी।

















