गजनी में वर्ष 997 का समय था। सुबुक्तिगीन ने बेटे इस्माइल को उत्तराधिकारी बनाया। बड़े बेटे महमूद को यह नागवार गुजरा और वह इस्माइल को हराकर गजनी की सत्ता पर काबिज हो गया। उस समय महमूद की उम्र 27 साल थी। जब उसे खलीफा की मान्यता मिल गई तो उसने घोषणा कर दी कि वह हर साल भारत में काफिरों पर हमला करेगा। 1030 में उसकी मौत हो गई, लेकिन इस दौरान उसने उत्तर भारत, खासकर पंजाब पर 17 हमले किए।
इतिहासकार इलियट का कहना है कि उसने (महमूद) भारत के खिलाफ जिहाद छेड़ा था। उसने सोमनाथ पर कब्जा करने और उसे नष्ट करने की बहुत कोशिश की। उसे लगता था कि वह हिंदुओं को मुसलमान बना देगा।
पेशावर युद्ध में हार के बाद जयपाल ने किया आत्मदाह
महमूद का शुरुआती अभियान जयपाल के खिलाफ था। 1000-01 में पेशावर के पास उसने जयपाल को हराया। मुस्लिम इतिहासकार अल-उत्बी लिखता है, “अभी दोपहर भी नहीं हुई थी कि मुसलमानों ने अल्लाह के शत्रु (जयपाल) के विरुद्ध बदला लिया और 15,000 लोगों को काटकर जमीन पर कालीन की भांति बिछा दिया, ताकि जंगली जानवर और पक्षी उन्हें अपना भोजन बना सकें। अल्लाह की कृपा से हमें लूट का इतना माल मिला कि उसकी गिनती भी संभव नहीं है। इसमें अनगिनत पुरुष और महिलाएं भी गुलाम के रूप में शामिल हैं।” इस युद्ध में महमूद ने जयपाल को बंदी बनाया और 50 हाथियों की मांग की। आनंदपाल ने मांग पूरी कर पिता को मुक्त कराया। इस पूरे घटनाक्रम से जयपाल को गहरा सदमा लगा और एक म्लेच्छ का स्पर्श होने के चलते उन्होंने दोबारा शासन चलाना नैतिक रूप से स्वीकार नहीं किया और अपने केश कटवाकर स्वयं को अग्नि में समर्पित कर दिया। (एच.एम. इलियट एवं जॉन डॉनसन, द हिस्ट्री ऑफ इंडिया ऐज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस, भाग-2, पृ. 27)
महमूद के लगातार हमलों से कमजोर पड़ा हिंदूशाही साम्राज्य
आनंदपाल गद्दी पर बैठा। उधर, महमूद ने पंजाब के आसपास के क्षेत्र अधीन कर लिए, जिससे खतरा बढ़ा। आनंदपाल ने वर्षों तक महमूद का मुकाबला किया। हर बार महमूद लूटमार करके गजनी लौट जाता था। बाद में आनंदपाल के उत्तराधिकारियों ने वर्षों तक महमूद को पंजाब सीमाओं से आगे बढ़ने नहीं दिया, किंतु लगातार हमलों से हिंदूशाही साम्राज्य संकुचित हो गया। तब गजनवी को पंजाब के आखिरी छोर यानी गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों तक घुसने का रास्ता मिल गया। इतिहासकार एच.एम. इलियट के अनुसार, इस अवधि में महमूद ने नगरकोट, भठिंडा और थानेश्वर में भयंकर लूट मचाई। अपार धन लूटा, जिसे ले जाने के लिए जानवर कम पड़ गए। इस्लाम न स्वीकारने वाले हिंदुओं को मार डाला। थानेश्वर के प्रसिद्ध चक्रस्वामी (संभवतः भगवान श्रीकृष्ण) मंदिर को लूटा और मूर्ति को गजनी ले जाकर सड़क किनारे फेंक दिया।
थानेश्वर के बारे में अल-उत्बी लिखता है, “थानेश्वर के सरदार ने अल्लाह को स्वीकार नहीं किया। सुलतान की आज्ञा से हिंदू-बौद्धों का रक्त इस प्रकार बहा कि नदी का पानी पीने योग्य न रहा। यदि रात न हुई होती तो न जाने और कितने लोगों का नरसंहार होता।” इस नरसंहार पर एक अन्य मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता लिखता है, “महमूद की सेना 2 लाख लोगों को गजनी बंदी बनाकर ले गई, जिससे गजनी भारतीय नगर जैसा लगने लगा था।”
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सोमनाथ मंदिर पर महमूद का विनाशकारी आक्रमण
महमूद ने लूट, नरसंहार और जबरन कन्वर्जन अभियान के तहत मथुरा-कन्नौज को भी रौंद दिया। उसका सबसे विध्वंसकारी हमला सोमनाथ मंदिर पर हुआ। महमूद 17 अक्तूबर, 1024 को गजनी से निकला और 20 नंवबर को मुल्तान पहुंचा। राजपूताना का मरुस्थल पार कर 6 जनवरी, 1026 को सोमनाथ पहुंचा। महाराजा भीमदेव के साथ उसका कई दिनों तक युद्ध चला। इसमें 50,000 योद्धा मंदिर को बचाने के लिए बलिदान हुए। महमूद ने सोमनाथ की मूर्ति के टुकड़े कर मंदिर को जला दिया। मिन्हाज सिराज के अनुसार, उसने मूर्ति के चार टुकड़े किए थे। एक को गजनी की जामा मस्जिद में, दूसरे को शाही महल की सीढ़ियों पर, तीसरा मक्का और चौथा टुकड़ा मदीना भेज दिया। (एच.एम. इलियट एवं जॉन डॉनसन, द हिस्ट्री ऑफ इंडिया ऐज टोल्ड बाई इट्स ओन हिस्टोरियंस, भाग-2, पृ. 271)
मंदिर के गर्भगृह में स्थित इस मूर्ति की गिनती संसार की आश्चर्यजनक वस्तुओं में की जाती थी। यह नीचे या ऊपर बिना किसी सहारे के टिकी हुई थी। हालांकि महमूद को जल्दी ही भागना पड़ गया, क्योंकि वह काठियावाड़ में फंस गया था। एक ओर राजा परम देव थे और दूसरी तरफ समुद्र। जैसे-तैसे महमूद 2 अप्रैल, 1926 को गजनी पहुंचा। इसके बाद उसने भारत के विरुद्ध अभियान रोक दिया।

















