पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने न केवल सत्ता का समीकरण बदला है बल्कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक बड़े विद्रोह और अंतर्कलह को भी जन्म दे दिया है। 15 साल के शासन के अंत और भाजपा की प्रचंड जीत के बाद टीएमसी के वे दिग्गज नेता और करीबी अधिकारी अब बागी सुर अपना रहे हैं जो कभी ममता बनर्जी के खास हुआ करते थे।
राज चक्रवर्ती ने लिया राजनीति से संन्यास
बैरकपुर से पूर्व विधायक और जाने-माने फिल्ममेकर राज चक्रवर्ती ने राजनीति को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है। उनका यह फैसला टीएमसी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। राज चक्रवर्ती ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि उनकी राजनीतिक यात्रा 2021 में शुरू हुई थी और 2026 के जनादेश के साथ ही यह अध्याय समाप्त हो गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीति अब उनके लिए नहीं है। जानकारों का मानना है कि राज चक्रवर्ती जैसे युवाओं का पार्टी छोड़ना यह संकेत देता है कि टीएमसी का सेलिब्रिटी काडर अब डूबते जहाज का साथ नहीं देना चाहता।
सांसद देव ने दी बीजेपी को बधाई
टीएमसी के स्टार सांसद और सुपरस्टार देव (दीपक अधिकारी) ने अपनी ही पार्टी की लाइन से हटकर बयान दिया है। जहां ममता बनर्जी चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगा रही थीं और हार स्वीकार करने को तैयार नहीं थीं, वहीं देव ने भाजपा की जीत को ‘स्पष्ट जनादेश’ करार दिया। देव ने न केवल भाजपा को जीत की बधाई दी बल्कि उनसे अपील की कि वे बंगाल में ऐसा शासन चलाएं जिससे सामाजिक सौहार्द बढ़े। देव का यह संतुलित बयान संकेत दे रहा है कि वे भविष्य में अपनी राहें टीएमसी से अलग कर सकते हैं।
पूर्व मंत्रियों के निशाने पर अभिषेक बनर्जी
पार्टी के भीतर सबसे तीखा हमला पूर्व मंत्रियों और जमीनी नेताओं की ओर से हो रहा है। उन्होंने सीधे तौर पर ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। पूर्व मंत्री रबींद्रनाथ घोष ने खुलेआम कहा कि पार्टी दो गुटों में बंट चुकी थी, एक दीदी का खेमा और दूसरा अभिषेक बनर्जी का। उन्होंने आरोप लगाया कि अभिषेक अक्सर ममता बनर्जी पर दबाव डालकर अपने फैसले मनवाते थे, जिससे संगठन जमीनी हकीकत से कट गया।
पूर्व क्रिकेटर और पूर्व मंत्री मनोज तिवारी, जिन्हें 2026 में टिकट नहीं मिला था उन्होंने टीएमसी के भीतर फैले भ्रष्टाचार पर से पर्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि उनसे दोबारा टिकट देने के बदले करोड़ों रुपये की मांग की गई थी। उनके इस खुलासे ने पार्टी की छवि को भारी नुकसान पहुंचाया है। कई अन्य नेताओं ने सामूहिक रूप से माना कि टीएमसी नेतृत्व में ‘अहंकार’ आ गया था। नेताओं का कहना है कि पार्टी के रणनीतिकारों ने कार्यकर्ताओं की आवाज सुनना बंद कर दिया था, जिसका नतीजा 2026 की शर्मनाक हार के रूप में सामने आया है।
अधिकारियों ने बदला पाला
सत्ता परिवर्तन की आहट पाते ही बंगाल के प्रशासनिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। वे अधिकारी जो कभी टीएमसी के पॉलिटिकल एजेंट के तौर पर काम करने के लिए बदनाम थे, अब या तो लंबी छुट्टी पर चले गए हैं या नई सरकार (भाजपा) के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि कई अधिकारियों ने टीएमसी सरकार के दौरान हुए कथित घोटालों की फाइलें भी खोलना शुरू कर दिया है।

















