इस्‍लामिक तालीम की आड़ में मासूमियत का शिकार: बांग्लादेश के मदरसों में बढ़ती यौन हिंसा
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इस्‍लामिक तालीम की आड़ में मासूमियत का शिकार: बांग्लादेश के मदरसों में बढ़ती यौन हिंसा

बांग्लादेश के मदरसों में 10-11 साल के बच्चों के साथ यौन शोषण की लगातार घटनाएं सामने आ रही हैं। मानुषेर जोन्नो फाउंडेशन की रिपोर्ट और आंकड़ों के साथ जानिए कैसे मजहबी संस्थान बच्चों के लिए खतरा बन गए हैं।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by कुलदीप सिंह
May 8, 2026, 08:56 am IST
in विश्व, विश्लेषण
मदरसा (प्रतीकात्मक चित्र)

मदरसा (प्रतीकात्मक चित्र)

बांग्लादेश में मदरसों से सामने आ रही यौन हिंसा की घटनाओं ने इस्‍लामिक तालीम पर गहरे प्रश्‍न खड़े कर दिए हैं। जिन संस्थानों को मजहबी शिक्षा, नैतिक मूल्यों और सामाजिक संस्कारों का केंद्र माना जाता रहा, वहीं अब मासूम बच्चों की सुरक्षा पर सबसे बड़े सवाल उठ रहे हैं।

दरअसल, मानवाधिकार संस्था ‘मानुषेर जोन्नो फाउंडेशन’ ने हालिया घटनाओं को भयावह बताते हुए जो रिपोर्ट प्रस्‍तुत की है, उसके बाद उसने सरकार से तत्काल कठोर कदम उठाने की मांग की है। संस्था का कहना है कि यदि मदरसों में जवाबदेही और निगरानी की व्यवस्था नहीं बनी, तो यह संकट आने वाले समय में और विकराल रूप ले सकता है।

मासूमों की चीखों से दहल उठा बांग्लादेश

नेतोकोना जिले के मदन उपजिला में 11 वर्षीय छात्रा के साथ हुई दरिंदगी ने पूरे बांग्लादेश को स्तब्ध कर दिया। आरोप है कि मदरसे के एक मौलवी ने पिछले वर्ष अक्टूबर से बच्ची का लगातार शोषण किया। मामला तब सामने आया, जब चिकित्सकीय जांच में छात्रा के गर्भवती होने की पुष्टि हुई। इसके बाद स्थानीय प्रशासन पर कार्रवाई का दबाव बढ़ा।

इसी तरह पटुआखली जिले में 10 वर्षीय छात्र के साथ यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया, जहां आरोपी मौलवी (शिक्षक) ने बच्चे को धमकाकर लंबे समय तक चुप रहने को मजबूर किया। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि मजहबी शिक्षा संस्थानों के भीतर बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था बेहद कमजोर है।

ढाका स्थित मानवाधिकार संस्था ‘मानुषेर जोन्नो फाउंडेशन’ की कार्यकारी निदेशक शाहीन अनम ने कहा कि मदरसे भी शैक्षणिक संस्थान हैं, इसलिए उन्हें कानून और न्यायिक निर्देशों से बाहर नहीं रखा जा सकता। उन्होंने मांग की कि हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुरूप देशभर के सभी मदरसों में यौन उत्पीड़न रोकथाम समितियों का तत्काल गठन किया जाए। संस्था का आरोप है कि सामाजिक प्रभाव और इस्‍लामिक मजहबी प्रतिष्ठा के कारण कई मामलों को दबा दिया जाता है। पीड़ित परिवार न्याय की लड़ाई लड़ने से डरते हैं और आरोपी प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में बच निकलते हैं।

इसे भी पढ़ें: TCS नासिक कार्पोरेट जिहाद मामले में मुख्य आरोपी निदा खान गिरफ्तार

आंकड़े बता रहे भयावह तस्वीर

‘बांग्लादेश महिला परिषद’ के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2026 के शुरुआती चार महीनों में ही 1028 महिलाओं और लड़कियों के साथ हिंसा की घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें 479 मामले लड़कियों से जुड़े रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश मामले सामाजिक दबाव के कारण सामने ही नहीं आ पाते।

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार मदरसों में रहने वाले बच्चे सबसे अधिक असुरक्षित हैं। हॉस्टल व्यवस्था और बंद वातावरण का फायदा उठाकर अपराधी लंबे समय तक शोषण करते रहते हैं। कई मामलों में पीड़ित बच्चे भय, शर्म और मजहबी दबाव के कारण शिकायत तक नहीं कर पाते।

मदरसा व्यवस्था पर उठते सवाल

उल्‍लेखनीय है कि बांग्लादेश में हजारों मदरसे संचालित हैं, जिनमें बड़ी संख्या ग्रामीण और गरीब परिवारों के बच्चों की है। अनेक मदरसे सरकारी निगरानी से बाहर हैं। मौलवीयों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और नियमित निरीक्षण का अभाव स्थिति को और गंभीर बना रहा है।

मानवाधिकार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि कई कौमी मदरसे पूरी तरह स्वायत्त ढंग से चलते हैं, जहां प्रशासनिक नियंत्रण बेहद सीमित है। यही कारण है कि बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े नियम प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पाते। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि कई संस्थानों में शिकायत तंत्र तक मौजूद नहीं है। ‘मानुषेर जोन्नो फाउंडेशन’ की कार्यकारी निदेशक शाहीन अनम कहती हैं, “बांग्लादेश में ‘महिला एवं बाल दमन निवारण अधिनियम 2000’ लागू है, जिसमें बच्चों के साथ यौन अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान है। इसके बावजूद दोषसिद्धि की दर बेहद कम बनी हुई है। लंबी न्यायिक प्रक्रिया, राजनीतिक दबाव और सामाजिक समझौते पीड़ितों को न्याय से दूर कर देते हैं।”

मानवाधिकार संगठनों ने संसद में लंबित ‘यौन उत्पीड़न निवारण कानून’ को जल्द पारित करने की मांग की है। उनका कहना है कि जब तक कानूनी व्यवस्था को तेज और प्रभावी नहीं बनाया जाएगा, तब तक अपराधियों में भय पैदा नहीं होगा।

शाहीन अनम अपनी बातचीत में यह भी कहती हैं कि बच्चों की सुरक्षा किसी भी कौमी, मजहबी या सामाजिक प्रतिष्ठा से बड़ी होनी चाहिए। यदि शिक्षा संस्थानों में ही बच्चे असुरक्षित महसूस करें, तो समाज का नैतिक ढांचा कमजोर पड़ जाता है। दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी बांग्लादेश में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। सभी मदरसों में यौन उत्पीड़न रोकथाम समितियों का गठन, शिक्षकों का पुलिस सत्यापन, हॉस्टलों की निगरानी, शिकायत हेल्पलाइन और नियमित निरीक्षण अनिवार्य किया जाना चाहिए। साथ ही बच्चों और अभिभावकों को जागरूक करना भी बेहद जरूरी है।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि पीड़ित बच्चों के पुनर्वास और मानसिक सहायता पर भी सरकार को गंभीरता से काम करना होगा। केवल गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी।

मासूमियत की रक्षा सबसे बड़ी जिम्मेदारी

बांग्लादेश के मदरसों में सामने आ रही घटनाएं यह संकेत दे रही हैं कि मजहबी शिक्षा संस्थानों में भी जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। इस्‍लामिक आस्‍था के नाम पर किसी भी अपराध को छिपाया नहीं जा सकता। यदि सरकार, समाज और धार्मिक नेतृत्व ने मिलकर ठोस कदम नहीं उठाए, तब यह तय है कि बांग्‍लादेश में आने वाले समय में यह संकट और भयावह रूप ले सकता है। मासूम बच्चों की सुरक्षा ही किसी भी सभ्य समाज की असली पहचान होती है, जिससे फिलहाल बांग्‍लादेश बहुत दूर होता नजर आ रहा है।

Topics: बांग्लादेश मदरसा यौन हिंसामदरसा बाल शोषणबांग्लादेश मदरसा स्कैंडलबांग्लादेश बाल यौन हिंसा
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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