आतंक की काली फैक्ट्री चला रहे पाकिस्तान में न तो लोकतंत्र है और न ही मानवाधिकार तथा सामाजिक न्याय। इसको लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट भी अब सामने आने लगी हैं। ‘Human Rights Commission of Pakistan’ की ताज़ा रिपोर्ट “स्टेट ऑफ ह्यूमन राइट्स 2025” नागरिक स्वतंत्रताओं के लगातार सिमटने की तस्वीर पेश करती है, वहीं ‘United Nations’ और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की चेतावनियां अल्पसंख्यक लड़कियों के जबरन इस्लामिक कन्वर्जन और जबरन निकाह जैसे संवेदनशील मुद्दों को उजागर कर रही हैं।
दरअसल, इन दोनों रिपोर्टों को साथ पढ़ने पर पाकिस्तान का वह चेहरा सामने आता है, जहां असहमति पर पहरा है और कमजोर वर्गों के अधिकार सबसे ज्यादा खतरे में हैं। हाल ही में सामने आई एचआरसीपी की रिपोर्ट बता रही है कि 2025 में पाकिस्तान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बुरी तरह दबा दी गई। सत्ता से सवाल पूछना, जवाबदेही मांगना या वैकल्पिक विचार रखना अब जोखिम भरा हो गया है।
🔴 Freedom of expression, rule of law under stress: HRCP launches 2025 report
4 May 2026, Islamabad. The Human Rights Commission of Pakistan (HRCP)’s annual report, State of Human Rights in 2025, documents a year marked by a severe contraction of civic space, the erosion of… pic.twitter.com/CCF9fBke7l
— Human Rights Commission of Pakistan (@HRCP87) May 4, 2026
असहमति बनी अपराध
इलेक्ट्रॉनिक अपराध निवारण कानून (PECA) में संशोधन, देशद्रोह और आतंकवाद-रोधी कानूनों के आक्रामक इस्तेमाल ने असहमति को अपराध की श्रेणी में ला दिया है। पत्रकारों, वकीलों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को निशाना बनाना एक सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है। धमकियां, जबरन गायब किए जाने और आवाजाही पर प्रतिबंध जैसे उपायों ने ऐसा भय पैदा किया है कि लोग खुलकर बोलने से बचने लगे हैं। इस माहौल में पाकिस्तान के अंदर मानवाधिकार उल्लंघनों की खबरें भी दब रही हैं और लोकतांत्रिक विमर्श सिकुड़ता जा रहा है।
कानूनी ढांचा बना दमन का औजार
रिपोर्ट “स्टेट ऑफ ह्यूमन राइट्स 2025” में विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई गई है कि दमन अब सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रहा है, यहां इसे इसे कानूनी वैधता दी जा रही है। आतंकवाद-रोधी अधिनियम 1997 में किए गए संशोधनों ने सुरक्षा एजेंसियों को यह अधिकार दे दिया है कि वे किसी भी व्यक्ति को बिना आरोप और बिना न्यायिक निगरानी के तीन महीने तक हिरासत में रख सकती हैं।
इसका असर विशेष रूप से बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में दिखाई देता है, जहां मनमानी गिरफ्तारी और हिरासत के मामले बढ़े हैं। इससे नागरिकों के मौलिक अधिकार, विशेषकर स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय वर्तमान दौर में गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता में आई गिरावट
एचआरसीपी की रिपोर्ट में न्यायपालिका की स्वतंत्रता में आई गिरावट को भी प्रमुख मुद्दा बताया गया है। 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ा है। कई अहम न्यायिक फैसलों ने लोकतांत्रिक दायरे को सीमित किया है। आम नागरिकों पर सैन्य अदालतों में मुकदमा चलाने की अनुमति और Pakistan Tehreek-e-Insaf (पीटीआई) को आरक्षित सीटों से वंचित करना ऐसे फैसलों के उदाहरण हैं।
रिपोर्ट में जबरन गायब किए जाने, गैर-न्यायिक हत्याओं और सामूहिक सजा जैसे मामलों का उल्लेख किया गया है। विशेष रूप से बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सुरक्षा बलों पर गंभीर आरोप लगे हैं कि वे संदेह के आधार पर नागरिकों को निशाना बना रहे हैं। इस तरह की घटनाओं ने समाज में गहरा भय पैदा कर दिया है, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी और नागरिक अधिकार दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
अल्पसंख्यक लड़कियां निशाने पर
इसी परिदृश्य के बीच United Nations Human Rights Office की हालिया चेतावनी पाकिस्तान की एक और गंभीर समस्या को उजागर करती है, जिसके केंद्र में है- अल्पसंख्यक लड़कियों का जबरन कन्वर्जन और निकाह। इस रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में ऐसे मामलों में लगभग 75 प्रतिशत पीड़ित हिंदू लड़कियां थीं, जबकि 25 प्रतिशत ईसाई समुदाय से थीं। अधिकतर पीड़ित 14 से 18 वर्ष की किशोरियां थीं, जबकि कई मामलों में इससे भी कम उम्र की बच्चियां शिकार बनीं। स्पष्ट रूप से सामने आया है कि इन मामलों में “स्वतंत्र सहमति” का अभाव होता है, जोकि किसी भी वैध विवाह की मूल शर्त है।
रिपोर्टों के अनुसार, सिंध प्रांत जबरन कन्वर्जन का प्रमुख केंद्र बन गया है। यहां आर्थिक रूप से कमजोर अल्पसंख्यक परिवारों की लड़कियों को अपहरण, धमकी और दबाव के जरिए धर्म परिवर्तन और निकाह के लिए मजबूर किया जाता है। कई मामलों में पीड़ितों का नाम बदलकर उन्हें अदालत में पेश किया जाता है, जहां उन्हें ‘स्वेच्छा’ का बयान देने के लिए मजबूर किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया न्यायिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
2025 में 700 से अधिक लोग ब्लास्फेमी के तहत जेल में बंद
इसके साथ ही United States Commission on International Religious Freedom की रिपोर्ट ने भी पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति को गंभीर बताया है। इस रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में 700 से अधिक लोग ब्लास्फेमी कानूनों के तहत जेल में बंद थे। इनमें ईसाई और अहमदिया समुदाय के लोग विशेष रूप से प्रभावित हैं। कई मामलों में बिना पर्याप्त साक्ष्य के गिरफ्तारी और लंबी हिरासत देखने को मिली है, जो यह दर्शाता है कि धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव कानूनी ढांचे में भी मौजूद है।
अंतरराष्ट्रीय दबाव और हस्तक्षेप की मांग
सामने आ रहीं ऐसी तमाम घटनाओं को देखते हुए आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने की मांग की है। जिसमें कि Vishwa Hindu Parishad ने भी इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाते हुए स्वतंत्र जांच, पीड़ितों की सुरक्षा और जवाबदेही तय करने की मांग की है।
पाकिस्तान से जुड़ी ये दो रिपोर्ट, एक सच्चाई
अगर Human Rights Commission of Pakistan की रिपोर्ट और संयुक्त राष्ट्र व अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की चेतावनियों को एक साथ देखा जाए, तो एक स्पष्ट पैटर्न पाकिस्तान में हमें सामने से दिखाई देता है। पाकिस्तान में न सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो रही है, बल्कि न्यायपालिका, कानूनी ढांचा और सामाजिक व्यवस्था भी कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा करने में असफल होती दिख रही है। यहां लगातार कभी ईश निंदा के नाम पर, कभी गैर मुसलमानों पर हिंसा के नाम पर लगातार इस्लामिक जिहादी ताकते मजबूत होती दिखती हैं।
दरअलस, एक तरफ असहमति को दबाने के लिए कानूनों का इस्तेमाल हो रहा है, तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर लड़कियां, सामाजिक और कानूनी दोनों स्तरों पर असुरक्षित हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि यहां एक व्यापक संरचनात्मक संकट आज मौजूद है, जहां लोकतंत्र की चेतना स्वतंत्रता, समानता और न्याय इन तीनों पर इस्लामिक जिहाद के चलते गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
















