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बुद्ध पूर्णिमा विशेष : “करुणावतार हैं भगवान् बुद्ध”

बुद्ध द्वारा स्थापित संघ में जाति, पद, धन आदि सभी भेदभावों को त्यागकर समरसता का भाव रखा जाता था। बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने में इस समानता के सिद्धांत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई

Written byडॉ. इंदुशेखर तत्पुरुषडॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष
Apr 30, 2026, 10:36 pm IST
inभारत, धर्म-संस्कृति

ईसा की 14वीं सदी से लेकर 17वीं सदी तक यूरोप में होने वाले सांस्कृतिक एवं धार्मिक आंदोलनों को पुनर्जागरण कहा जाता है। यूरोप में आधुनिक युग का आगमन इसी पुनर्जागरण की देन माना जाता है। किन्तु भारत जैसे प्राचीनतम एवं चैतन्य देश में पुनर्जागरण सुदूर प्राचीन काल से होता रहा है, जिसकी झलक कृत, त्रेता, द्वापर युगों के प्रत्येक चरण पर दिखाई देती है। अढ़ाई हजार वर्षों पूर्व यह पुनर्जागरण गौतम बुद्ध के रूप में दिखाई देता है, जब उन्होंने धर्म में आयी कुरीतियों और पाखंड का निर्मूलन करने हेतु राज–पाट, सुख–वैभव को त्यागकर ‘धर्म चक्र प्रवर्तन’ किया एवं नवीन धर्म संघ की स्थापना की।

वैशाख पूर्णिमा भगवान गौतम बुद्ध के जीवन चक्र की एक ऐसी दिव्य तिथि है कि उनका जीवन वृत्त इसी पवित्र दिवस पर केंद्रित हो जाता है। इसी दिन बुद्ध का जन्म हुआ, इसी दिन उनको बुद्धत्व की प्राप्ति हुई और इसी दिन उनका देह त्याग अर्थात् महापरिनिर्वाण हुआ।
भगवान बुद्ध का जन्म लगभग 563 ई.पू. शाक्यवंशी शासक शुद्धोधन और रानी महामाया के पुत्र रूप में हुआ। राजा शुद्धोधन हिमालय की तलहटी में बसे हुए शाक्य गणराज्य के अधिपति थे। शाक्यों की राजधानी कपिलवस्तु थी, जो वर्तमान में भारत नेपाल सीमा पर अवस्थित है। यह गणराज्य कोसल राज्य के अधीन था।इनका जन्म नाम सिद्धार्थ रखा गया था। जन्म के सातवें दिन ही इनकी माता महामाया का देहांत हो गया और इनका पालन-पोषण इनकी मौसी गौतमी ने किया। इसी कारण सिद्धार्थ ‘गौतम’ कहलाए।

बालक सिद्धार्थ को वीरोचित अस्त्र–शस्त्र विद्या के साथ विविध ज्ञान–विज्ञान एवं कलाओं का अध्ययन कराया गया। राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को अत्यंत भोग-विलास मय वातावरण में रखा ताकि वे दुःख और कष्टों का अनुभव न कर सकें। संसार के आकर्षण में ही उलझे रहें।

सत्य की खोज बना लक्ष्य

सोलह वर्ष की अवस्था में ही सिद्धार्थ का विवाह राम जनपद के कोलिय गण की राजकुमारी यशोधरा से कर दिया। कुछ ही वर्षों में इनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई। किन्तु सांसारिकता में सिद्धार्थ का मन नहीं रमता था।

जीवन के सत्य की खोज उनका लक्ष्य बन गया। 29 वर्ष की आयु में उन्होंने घर-बार छोड़ दिया। यह घटना ‘महाभिनिष्क्रमण’ कहलाती है। बुद्ध ने ज्ञान की प्राप्ति के लिए वर्षों तक भांति भांति की साधनाएं की। अनेक आश्रमों, तपोवनों में घूमते हुए वे अन्त में बोधगया के निकट उरुबेल नामक वन में साधना करने लगे। वहीं निरंजना नदी के तट पर एक पीपल के वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए वैशाख पूर्णिमा के दिन उन्हें सम्यकज्ञान की प्राप्ति हुई। बोध प्राप्ति के उपरान्त ही सिद्धार्थ गौतम, ‘बुद्ध’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। बौद्ध परंपरा में यह घटना ‘संबोधि’ कहलाती है। यह स्थान महाबोधि मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है, जो बौद्ध धर्म का एक प्रमुख तीर्थ स्थल है।

थेरी गाथा के अनुसार कठोर साधनारत सिद्धार्थ ने सुजाता के द्वारा अर्पित की गई खीर खाकर निराहार का त्याग किया था। सुजाता सेनानी ग्राम के ग्रामप्रधान अनाथपिंडिका की पुत्रवधू थी, जिसने वृक्ष देवता के लिए खीर अर्पित की थी। बुद्ध ने इस खीर को ग्रहण कर साधना के मध्यम मार्ग को प्रतिष्ठित किया तथा अतिवाद का निषेध किया।

धर्म-चक्र-प्रवर्त्तन

संसार के हित और लोक कल्याण के लिए बुद्ध ने धर्म प्रचार करने का निश्चय किया। वे बोधगया से वाराणसी के निकट ऋषिपत्तन मृगदाव पहुंचे, जो सारनाथ के नाम से जाना जाता है। यहां उन्होंने पहला धर्मोपदेश कर ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ किया। उन्होंने सर्वप्रथम कौडिन्य, वप्प, भद्रिक, महानाम और अश्वजित् इन पांच तपस्वी ब्राह्मणों को सत्य-धर्म का उपदेश दिया। ये पाँचों पूर्व में बुद्ध के साथ लगे थे किन्तु बीच में ही उनको छोड़कर चले गए। सारनाथ में ही बुद्ध ने संघ की स्थापना कर बौद्ध भिक्षुओं को सभी दिशाओं में धर्म-प्रचार के लिए भेजा। वाराणसी से बुद्ध मगध आए और वहां भी धर्म प्रचार किया।

ऋषिपत्तन–सारनाथ में बुद्ध ने चार आर्यसत्यों का धर्मचक्र प्रवर्तित किया था। यही आर्य सत्य इस धर्म के समस्त सिद्धांतों के मूल आधार हैं। पहला आर्यसत्य है, कि जीवन दुःखों से परिपूर्ण है। संसार की सभी वस्तुएं दुःखमय है। बुद्ध कहते हैं- सब्बं दुखं। दूसरा आर्य सत्य है कि दुःखों का कारण अवश्य है और सभी कारणों का मूल कारण अविद्या है। तृतीय आर्यसत्य है कि दुःखों का निरोध संभव है। दुःखों के मूल कारण अविद्या का निरोध कर देने पर दुःख-निरोध हो जाता है। इसे ही ‘निर्वाण’ कहा गया है। यही जीवन का चरम लक्ष्य है। चतुर्थ आर्यसत्य है- दुःख-निरोधगामिनी प्रतिपदा अर्थात् दुःख से छुटकारा पाने का मार्ग। बुद्ध ने दुःख-निरोध के आठ साधन बताये। इसी को अष्टांगिक मार्ग कहते हैं, जो इस प्रकार हैं–

  1. सम्यक् दृष्टि : वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को जानना।
  2.  सम्यक् संकल्प : राग, द्वेष तथा हिंसा से मुक्त विचार रखना।
  3. सम्यक् वाक्: सदैव सत्य एवं मधुर वाणी का प्रयोग।
  4. सम्यक् कर्मांत : शुभ कर्मों में संलग्नता एवं अशुभ कर्मों का परित्याग।
  5.  सम्यक् आजीव : शुद्ध आचरण से जीवन-यापन करना।
  6. सम्यक् व्यायाम : कुशल धर्मों का अनुसरण एवं अकुशल धर्मों का त्याग।
  7. सम्यक् स्मृति : वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप का स्मरण करना।
  8. सम्यक् समाधि : चित्त की एकाग्रता।

अस्सी वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा के दिन ही बुद्ध ने कुशीनगर में अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया, जिसे महापरिनिर्वाण कहा
जाता है।
भगवान बुद्ध के शरीर त्याग के बाद उनकी पवित्र अस्थियों को उनके अनुयायियों ने आठ समूहों में बांटकर उनके जीवन से संबंधित प्रमुख स्थलों पर स्तूप निर्मित किए। ये आठ स्थान थे, राजगृह, वैशाली, कपिलवस्तु, अल्लाकप्पा, रामग्राम, वेथापिडा (बेटद्वीप), पावा और कुशीनगर।

बुद्ध ने कोई ग्रंथ नहीं लिखा। उन्होंने प्रचलित मगही भाषा में उपदेश किया और भिक्षुओं को अनुमति दी कि वे अपनी-अपनी बोलियों में उनके उपदेशों का स्मरण करें। बुद्ध की शिक्षाओं का ज्ञान हमें त्रिपिटक ग्रंथों से ही प्राप्त होता है। त्रिपिटक पाली भाषा में रचित तीन ग्रंथों का समूह हैं, जिन के नाम क्रमशः विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक है। पिटक का मूल अर्थ पोटली या टोकरी होता है।
बुद्ध के परिनिर्वाण के पश्चात् उनके उपदेशों को संग्रहीत करने और उनके सिद्धांतों पर विचार मंथन करने हेतु समय–समय पर बौद्ध संगीतियां आयोजित की जाती रही। इन्हें ‘धम्मसंगीति’ कहा जाता है। संगीति से तात्पर्य बौद्ध भिक्षुओं के संगोष्ठी–सम्मेलन अथवा महासभा से है जहां देशभर के विद्वान् एकत्र होकर विमर्श करते थे।

प्रथम धम्म संगीति का आयोजन बुद्ध के परिनिर्वाण के तीन माह बाद ई.पू. 483 में मगध नरेश अजातशत्रु के नेतृत्व में राजगृह (राजगिरि) में हुआ। इसकी अध्यक्षता स्थविर महाकस्सप ने की। इस धम्म संगीति में बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन कर उन्हें सुत्त और विनय नामक दो पिटकों में विभाजित किया गया। दूसरी धम्म संगीति इसके एक शताब्दी बाद हुई। यह संगीति चौथी शताब्दी ई.पू. में शिशुनाग वंश के राजा कालाशोक के संरक्षण में वैशाली के बालुकाराम में हुई।

तीसरी बौद्ध संगीति भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के 236 वर्ष बाद अर्थात् 249 ई.पू. में मौर्य सम्राट अशोक के संरक्षण में पाटलिपुत्र में हुई। यह संगीति स्थविर मोग्गलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता में अशोकाराम विहार में हुई। इस संगीति में बुद्ध की शिक्षाओं का पुनः विभाजन कर उसमें एक नया पिटक ‘अभिधम्म’ जोड़ा गया। इस प्रकार इसी संगीति में त्रिपिटक (सुत्त, विनय एवं अभिधम्म) को अंतिम स्वरूप प्रदान किया गया।

चतुर्थ बौद्ध संगीति प्रथम शताब्दी ई. में कनिष्क के शासनकाल (लगभग 78 ई.) में कश्मीर के कुंडलवन में आयोजित की गई जिसकी अध्यक्षता आचार्य वसुमित्र और उपाध्यक्षता अश्वघोष ने की। इस संगीति में त्रिपिटक के प्रमाणिक पाठ और उसके भाष्यों पर विचार विमर्श हुआ। इस संगीति में बौद्ध धर्म स्पष्टतः दो शाखाओं- हीनयान एवं महायान में विभाजित हो गया। इस सभा का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय विदेशों में बुद्ध धर्म के प्रचारार्थ भिक्षुओं को भेजना था जिसके परिणामस्वरूप अनेक धर्म-प्रचारक बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करने सुदूर देशों में गए। बौद्ध धर्म मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, श्रीलंका, म्यांमार, थाइलैंड, कंबोडिया आदि देशों में फैल गया।

संघ में न तो कोई बड़ा था और न तो कोई छोटा। बुद्ध ने अपना कोई उत्तराधिकारी भी नियुक्त नहीं किया, वरन् धर्म तथा विनय को ही रास्ता बताया था। बुद्ध द्वारा स्थापित संघ में जाति, पद, धन आदि सभी भेदभावों को त्यागकर समरसता का भाव रखा जाता था। बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने में इस समानता के सिद्धांत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस धर्म का द्वार ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों, स्त्रियों और चांडालों सभी के लिए समान रूप से खुला हुआ था। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण भारतीय सभ्यता और संस्कति का विदेशों में प्रसार हुआ।वस्तुत: बौद्ध धर्म सनातन धर्म के संस्कार हेतु खड़ा हुआ एक आध्यात्मिक–सामाजिक आंदोलन था। भारत की यही जीवंत चेतना है कि प्रत्येक काल संधि पर ऐसे परिवर्तनकामी महापुरुष जन्म लेते रहे हैं। कभी विश्वामित्र, कभी वामदेव, कभी नचिकेता, कभी बुद्ध, कभी गोरख, कभी कबीर, कभी दयानंद, कभी विवेकानंद। ये सनातन हिन्दू धर्म के विरोध में नहीं वरन् उसे संस्कारित और परिमार्जित करने आते रहे।

आज के विकृत विमर्शकारी समय में यह बात विशेष उल्लेखनीय है कि गौतम बुद्ध को न तो आर्य शब्द से कभी कोई समस्या रही, न धर्म शब्द से। इतना ही नहीं, ये दोनों जिस तरह सनातन धर्म के बीज शब्द हैं, बौद्ध धर्म का भी मर्म ‘धर्म’ और ‘आर्य’ इन दो शब्दों में निहित हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि ‘धर्म चक्र प्रवर्तन’ और “आर्य सत्य“ के बिना बौद्ध धर्म की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
सनातन धर्म की मान्यता में गौतम बुद्ध को विष्णु का नौवां अवतार माना गया। श्रीमद्भागवत, अग्नि, विष्णु, गरुड़ आदि पुराणों में उल्लेख हुआ है कि कलियुग के आरंभ में असुरों को मोहित करने के लिए भगवान् ने कीकट (गया, बिहार) प्रदेश में बुद्ध नाम से अवतार ग्रहण किया । यथा, भागवतकार कहते हैं–
“ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम्।
बुद्धो नाम्नाञ्जनसुतः कीकटेषु भविष्यति।।”
(प्रथम स्कंध, अध्याय ३, श्लोक २४)
जयदेव गोस्वामी द्वारा रचित प्रसिद्ध दशावतार स्तोत्र में भगवान् बुद्ध का वर्णन इस प्रकार मिलता है –
“निन्दसि यज्ञविधेरहःश्रुतिजातं
सदयहृदयदर्शितपशुघातम्
केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे॥”
हे केशव! आपने बुद्ध का शरीर धारण किया है। आप यज्ञ-विधि के वेद-जनित (श्रुति से उत्पन्न) नियमों की निन्दा करते हैं, जिनमें पशुओं की बलि दी जाती थी। आपने दयालु हृदय से पशु-वध की क्रूरता उजागर कर सभी जीवों पर करुणा की है।
हे जगदीश हरे! आपकी जय हो! आपकी जय हो!

महाभारत काल में भगवान् कृष्ण ने धर्म रक्षा हेतु जो मार्गदर्शन किया उसके फलस्वरूप लगभग दो हजार वर्षों तक लोक में धर्म की प्रवृत्ति रही। कालांतर में कलिकाल के प्रभाववश जनता धर्म चेतना से विमुख होकर दोषपूर्ण आचरण करने लगी। लोग वैदिक ज्ञान से पथभ्रष्ट होकर त्याग, तपस्या और साधना से विमुख होने लगे। जीवन में सांसारिक सुखभोग और हिंसा का ऐसा अतिरेक पनपा कि इसने वैदिक विधि–विधानों और यज्ञों को भी दूषित कर दिया। जीव–हत्या एवं ऊंच–नीच की भावना अत्यधिक बढ़ गई। ऐसे में सनातन आर्यधर्म के शुद्धीकरण के हेतु धार्मिक पाखंड एवं दुराचार को नष्ट करने के लिए विष्णु के नौवें अवतार के रूप में करुणावतार भगवान बुद्ध का आविर्भाव हुआ। इनके अवतार का उद्देश्य अहिंसा और मोहनाश की शिक्षा देना तथा धर्मरक्षा था।

Topics: दशावतारबुद्ध पूर्णिमाबोधगयासमरसतापाञ्चजन्य विशेषत्रिपिटककरुणावतारवैशाख पूर्णिमाधर्मचक्र प्रवर्तन
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