टूटते परिवार, बढ़ता बाजार: हम क्या बनते जा रहे हैं? इंसान या सिर्फ कस्टमर आईडी?
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होम संघ @100 पंच परिवर्तन कुटुम्ब प्रबोधन

टूटते परिवार, बढ़ता बाजार: हम क्या बनते जा रहे हैं? इंसान या सिर्फ कस्टमर आईडी?

संयुक्त परिवार का टूटना सिर्फ आर्थिक या शहरीकरण का परिणाम नहीं था ,इसके पीछे एक वैचारिक परिवर्तन भी काम कर रहा था।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Apr 27, 2026, 07:43 pm IST
in कुटुम्ब प्रबोधन, संघ @100
कुटुंब प्रबोधन (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

कुटुंब प्रबोधन (फोटो- एआई द्वारा निर्मित)

भारत का इतिहास समाज और संस्कृति की निरंतरता का इतिहास है। मुगल आक्रांता आए, अंग्रेज़ आए, अनेक आक्रमण हुए, लेकिन एक चीज थी जो टूट नहीं पाई वह है संयुक्त परिवार व्यवस्था। यह कोई संयोग नहीं था, बल्कि एक सुसंगठित सामाजिक तंत्र था, जिसमें आर्थिक सुरक्षा थी (साझा संसाधन) , भावनात्मक सुरक्षा थी (संबंधों का सहारा) और सांस्कृतिक निरंतरता थी (पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान का प्रवाह) .यह एक ऐसा सामाजिक सुरक्षा तंत्र था, जहां न कोई वृद्धाश्रम की ज़रूरत थी, न काउंसलिंग सेंटर की, न अकेलेपन की महामारी थी।

संस्कारों की प्रयोगशाला : परिवार कैसे गढ़ता था इंसान

संयुक्त परिवार केवल रहने का स्थान नहीं था, यह व्यक्तित्व निर्माण की प्रयोगशाला था। दादा-दादी एक जीवित इतिहास थे , वे केवल बुज़ुर्ग नहीं थे ,वे अनुभव, कथा और मूल्य के स्रोत थे , उनकी कहानियों में नीति, धर्म, साहस और करुणा का पाठ होता था। नाना-नानी संवेदना और स्नेह, जीवन के व्यावहारिक पक्ष सिखाते थे और रिश्तों की बारीकियां समझाते थे। चाचा-ताऊ, मामा-मौसी: सामाजिक विस्तार से बच्चे को यह एहसास होता था कि वह केवल न्यूक्लियर यूनिट का हिस्सा नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक ताने-बाने का अंग है। यही वह व्यवस्था थी, जहाँ बच्चा मैं से हम की यात्रा करता था।

संयुक्त परिवार का बिखराव : क्या यह केवल बदलाव था

संयुक्त परिवार का टूटना सिर्फ आर्थिक या शहरीकरण का परिणाम नहीं था ,इसके पीछे एक वैचारिक परिवर्तन भी काम कर रहा था। जिसे सांस्कृतिक मार्क्सवाद या वैचारिक उपनिवेशवाद, या उपभोक्तावादी सांस्कृतिक मॉडल कहते हैं। नाम चाहे जो हो, पर प्रभाव स्पष्ट है ,परिवार कमजोर हुआ, व्यक्ति अकेला हुआ, और बाजार मजबूत हुआ।

पश्चिम को भारतीय संयुक्त परिवार क्यों खटकता था?

पश्चिमी समाज का विकास औद्योगिक क्रांति, पूंजीवाद और उपनिवेशवाद के साथ हुआ। वहां व्यक्ति (Individual) केंद्र में है , जबकि भारत में परिवार और समूह केंद्र में था। समस्या कहां थी? भारत जैसे समाज में संसाधन साझा होते थे, खर्च कम होता था, आत्मनिर्भरता अधिक थी, भावनात्मक जरूरतें परिवार से पूरी होती थीं। ऐसे समाज में बाजार की भूमिका सीमित हो जाती है और यही बात खटकती थी क्योंकि बाजार तभी बढ़ता है जब व्यक्ति अकेला और निर्भर हो।

रणनीति -परिवार तोड़ो, ग्राहक बनाओ

यह कोई एक दिन में बनी योजना नहीं थी बल्कि धीरे-धीरे विचार, मीडिया और जीवनशैली के माध्यम से स्थापित हुआ। जिसमे संयुक्त परिवार को बाधा और न्यूक्लियर परिवार को स्वतंत्रता , सामूहिकता को पिछड़ापन तथा व्यक्तिवाद को आधुनिकता बताया गया।

कैसे हुआ यह वैचारिक हमला?

इसमें मीडिया सबसे बड़ा हथियार साबित हुआ ,टीवी सीरियल, फिल्में, वेब सीरीज इन सबने धीरे-धीरे एक नैरेटिव बनाया, जिसमें संयुक्त परिवार की छवि झगड़ों का अड्डा , सास-बहू की लड़ाई ,चाचा-ताऊ को लालची / षड्यंत्रकारी ,बुज़ुर्ग को बोझ बताया गया। जबकि न्यूक्लियर परिवार की छवि स्वतंत्र , आधुनिक ,खुशहाल और स्व -निर्मित (Self-made) दिखाई गई। दर्शक धीरे-धीरे यही मानने लगा अलग रहना ही समाधान है। जैसे ही परिवार टूटे बाजार ने तुरंत जगह भर दी ,गणित देखिए 1 परिवार से 4 घर बने तो 1 टीवी की जगह 4 टीवी ,1 रसोई के स्थान पर 4 किचन और 1 कार से कई वाहन हुए। बाजार बढ़ा और परिवार तथा समाज का बिखराव हुआ।

परिणाम: एक उपभोक्ता समाज का जन्म

परिवार अब इमोशनल यूनिट नहीं, लॉजिस्टिक यूनिट बन गया। पहले समस्या हो तो दादी / नानी चाचा /बुआ से बात कर समाधान मिलता था , आज समस्या हेतु काउंसलर / ऐप है , अकेलापन अब इलाज मांगता है और धन भी खर्चा करवाता है। पहले संस्कार परिवार में बनते थे और आज संस्कार इन्फ्लुएंसर, स्कूल देते हैं। बच्चा अब यह नहीं सीखता कि कैसे जीना है बल्कि यह सीखता है कैसे दिखना है। हर चीज का बाजारीकरण हो गया है त्योहार में ऑनलाइन सेल, भावनाओं के लिए एप, रील है ,रिश्ते आभासी हैं जो लाइक शेयर पर टिके हैं। सच यही है संस्कार की जगह सब्सक्रिप्शन ने ले ली है।

कटु सत्य- आधुनिकता या भ्रम?

हमने संयुक्तता को ऑउटडेटेड कहा ,माता-पिता को बाधा माना, रिश्तों को अनफॉलो कर दिया ,लेकिन क्या हमने अपनी जड़ों को भी डिलीट कर दिया? वास्तविक सच्चाई यह कि अमेज़न तभी कमाता है, जब आप दीपावली अकेले मनाते हैं। जोमेटो तभी चलता है जब मां का खाना छूट जाता है, नेटफ्लिक्स तभी देखा जाता है जब दादी की कहानी खत्म हो जाती है। बाजार का लाभ तभी होगा जब परिवार में दूरी होगी।

सबसे बड़ा प्रश्न कि हम क्या बनते जा रहे हैं? इंसान? या सिर्फ कस्टमर आईडी? अगर अभी नहीं जागे और यदि यही सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो आने वाली पीढ़ियाँ शायद दादी को एक विचार (Concept), मामा को एक भ्रम (Myth), और परिवार” को केवल एक विकल्प (Option) मानेंगी…और तब रिश्ते इतिहास बन जाएंगे, संस्कार शब्दकोश में सिमट जाएंगे, और जीवन… केवल उपभोग का साधन बनकर रह जाएगा।
यह केवल टूटन नहीं थी, यह रूपांतरण था , यह कहना कि परिवार टूट गया शायद अधूरा सत्य है। असल में हुआ यह कि घर, घर नहीं रहा. एक व्यवस्था (System) बन गया। और जब घर व्यवस्था बनता है तो उसके हर हिस्से को आउटसोर्स किया जा सकता है।

आउटसोर्स होता हुआ परिवार -एक मौन क्रांति

धीरे-धीरे, बिना शोर के हमने अपने जीवन के सबसे पवित्र हिस्सों को बाजार के हवाले कर दिया। पहले रसोई केवल खाना बनाने की जगह नहीं थी वह प्रेम, संस्कार , पवित्रता और अपनापन का केंद्र थी ,आज Order Now खाना आया , खाया और खत्म। स्वाद आया पर संस्कार नहीं आए। पहले दादी की गोद , नानी की कहानी ,चाचा का अनुशासन यही बाल और व्यक्तित्व था। आज क्रेच , डे-केयर , डिजिटल स्क्रीन बच्चा देखा जा रहा है पर समझा नहीं जा रहा। पहले जीवन ही शिक्षा था , हर रिश्ते से सीख मिलती थी। आज तीन वर्ष की उम्र से ही स्कूल , कोचिंग ,ऐप से ज्ञान बढ़ा पर बुद्धि और विवेक घटा। अब डिजिटल दुनिया से संपर्क बढ़ा पर संबंध घट गए।
सबसे बड़ा नुकसान- राष्ट्र का भविष्य

सोचिए जो बच्चा दादी का सम्मान नहीं जानता, रिश्तों का मूल्य नहीं समझता वह समाज कैसे बनाएगा? राष्ट्र कैसे संभालेगा? यही कारण है कि परिवार का विघटन राष्ट्र का कमजोर होना है। चुभता हुआ सत्य यह है कि हम स्वतंत्र हो रहे हैं, पर असल में हम निर्भर हो गए है बाजार पर , सेवाओं पर ,सिस्टम पर आदि। क्या यही आधुनिकता है? पैसा है। सुविधा है ,स्वतंत्रता है ,पर क्या संबंध हैं? क्या संस्कार हैं? क्या संतोष है?

कुटुंब प्रबोधन: परिवार, संस्कृति और राष्ट्र को जोड़ने का मार्ग

आज का समय हमें एक गंभीर प्रश्न के सामने खड़ा करता है कि हम प्रगति तो कर रहे हैं, लेकिन क्या हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं? संयुक्त परिवारों का विघटन, संस्कारों का क्षरण और बढ़ता उपभोक्तावाद यह संकेत देता है कि अब कुटुंब प्रबोधन की आवश्यकता पहले से अधिक है। कुटुंब प्रबोधन का अर्थ केवल परिवार को साथ रखना नहीं, बल्कि उसे संस्कार, संवाद और समरसता का जीवित केंद्र बनाना है। यह व्यक्ति, परिवार और राष्ट्र तीनों के निर्माण की आधारशिला है।

परिवार को जोड़ने के लिए क्या करें?

  • साप्ताहिक पारिवारिक बैठक- सप्ताह में एक दिन सभी सदस्य साथ बैठें, चर्चा करें, हँसें, निर्णय लें।
  • संस्कार समय तय करें -बच्चों को दादा-दादी के साथ समय बिताने का अवसर दें-कहानियां, अनुभव, परंपराएं सीखें।
  • डिजिटल संतुलन-घर में नो मोबाइल समय तय करें, जहां केवल परिवार के साथ संवाद हो।
  • सामूहिक भोजन- दिन में कम से कम एक बार पूरा परिवार साथ बैठकर भोजन करे-यही सबसे बड़ा संस्कार है।
  • त्योहारों को जीवंत बनाएं – ऑनलाइन ऑर्डर नहीं, मिलकर तैयारी और उत्सव मनाएं।
  • आध्यात्मिकता का समावेश – परिवार में प्रार्थना, योग, या ग्रंथों की चर्चा जैसी परंपराएँ शुरू करें।
  • भावनात्मक संयुक्तता – भले ही सभी एक घर में न रहें, लेकिन दिलों का जुड़ाव बना रहे-नियमित संपर्क, मिलन और सहयोग हो।

कुटुंब प्रबोधन केवल परिवार तक सीमित नहीं है ,यह राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी रिश्तों को समझे, संस्कारों को जिए और समाज को मजबूत बनाए तो हमें परिवार को पुनः केंद्र में लाना होगा। अगर भारत को फिर से विश्व गुरु बनाना है तो केवल GDP नहीं, GFP (Gross Family Product) बढ़ाना होगा क्योंकि संयुक्त परिवार ही वह विश्वविद्यालय है, जहाँ से संस्कृति, नैतिकता और राष्ट्र निर्माण की असली डिग्री मिलती है। बाजार हमें ग्राहक बनाता है, कुटुंब प्रबोधन हमें इंसान बनाता है और जब इंसान जागता है, तभी राष्ट्र महान बनता है।

 

Topics: भारतीय परिवारपरिवार का बिखरावconsumer cultureindian familyभारतीय संस्कृतिकुटुंब प्रबोधनपश्चिमी सभ्यतापाञ्चजन्य विशेषJoint family
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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