80 साल का वो 'बूढ़ा शेर' जिससे कांपती थी ब्रिटिश हुकूमत : हाथ काटकर गंगा को सौंपा, फिर भी अंग्रेजों को चटाई धूल
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80 साल का वो ‘बूढ़ा शेर’ जिससे कांपती थी ब्रिटिश हुकूमत : हाथ काटकर गंगा को सौंपा, फिर भी अंग्रेजों को चटाई धूल

देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के महानायक बाबू कुंवर सिंह की वह अनकही कहानी, जब उन्होंने घायल अवस्था में भी अंग्रेजों को खदेड़कर अपनी रियासत को आजाद कराया।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by Shivam Dixit
Apr 23, 2026, 05:03 pm IST
in भारत, बिहार, जनजातीय नायक, आजादी का अमृत महोत्सव
Babu Veer Kunwar Singh historical freedom fighter of Bihar 1857 revolt

बिहार के शेर बाबू कुंवर सिंह की ऐतिहासिक जीत का प्रतीक है 23 अप्रैल।

देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में 80 साल का एक बूढा शेर ऐसा भी था, जिसकी दहाड़ ने अंग्रेजी सेना के छक्के छुड़ा दिये थे। यह जांबाज शेर था बिहार का अमर शहीद बाबू कुंवर सिंह। दुनिया के इतिहास में संभवतः यह पहला उदाहरण हो, जब इतने वयोवृद्ध रणबाँकुरे योद्धा ने तलवार उठाकर दुश्मन सेना को युद्ध में पछाड़ा हो।

वीर शिवाजी के बाद वह पहले ऐसे भारतीय योद्धा थे, जो गुरिल्ला युद्ध में सिद्धहस्त थे और इसी युद्धनीति के बल पर उन्होंने ब्रिटिश सेना को अनेक बार धूल चटाई थी। 23 अप्रैल 1858 को 80 वर्ष की आयु में बाबू कुंवर सिंह ने घायल अवस्था में भी अंग्रेजों को कड़ी टक्कर देकर अपनी रियासत जगदीशपुर को अंग्रेजों के कब्जे से मुक्त कराया था।

उनकी इस ऐतिहासिक जीत के उपलक्ष्य में बिहार सरकार द्वारा प्रति वर्ष 23 अप्रैल को सरकारी स्तर पर विजयोत्सव आयोजित किया जाता है। भारत सरकार ने उनके सम्मान में 23 अप्रैल 1966 को एक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया था।

ब्रिटिश सरकार ने घोषित किया था इनाम

‘’उस व्यक्ति को 25 हजार रुपए पुरस्कार में दिए जाएंगे, जो बाबू कुंवर सिंह को जीवित अवस्था में किसी ब्रिटिश चौकी अथवा कैंप में सुपुर्द करेगा।’’ ब्रिटिश गवर्नर जनरल के सचिव के हस्ताक्षर से 12 अप्रैल 1858 की इस घोषणा से यह साबित होता है कि अंग्रेज सरकार आजादी के इस महानायक से कितना डरी हुई थी। अप्रतिम शौर्य के कारण अमर शहीद कुंवर सिंह को बिहार प्रान्त में ‘बाबू साहब’ और ‘तेगवा बहादुर’ के नाम से भी संबोधित किया जाता है।

‘बसुरिया बाबा’ ने जगायी थी राष्ट्रभक्ति की भावना

वीर कुंवर सिंह मालवा के सुप्रसिद्ध शासक महाराजा भोज के वंशज थे।   उनका जन्म बिहार में शाहाबाद जिले के जगदीशपुर में सन् 1782 ई० में हुआ था। पिता का नाम साहबजादा सिंह और माता का नाम पंचरतन कुँवर था। पिता साहबजादा सिंह जगदीशपुर रियासत के जमींदार थे। कहा जाता है कि इसी राजवंश के राजा भोज ने भोजपुरी भाषा का विस्तार किया था और इन्हीं के नाम पर भोजपुर जिले का नाम भी पड़ा था।

जगदीशपुर के जंगलों में ‘बसुरिया बाबा’ नाम के एक सिद्ध संत रहते थे। उन्होंने ही बचपन में कुँवर सिंह में देशभक्ति एवं स्वाधीनता की भावना उत्पन्न की थी। उन्हीं के परामर्श पर उन्होंने वर्ष 1845-1846 में बनारस, मथुरा, कानपुर, लखनऊ आदि स्थानों पर जाकर गुप्त ढंग से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की सक्रिय योजनाएं बनायी थीं।

उन्होंने बिहार के प्रसिद्ध सोनपुर मेले को अपनी गुप्त बैठकों की योजना के लिए चुना। ज्ञात हो कि कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाले सोनपुर के मेले को एशिया के सबसे बड़े पशु मेला माना जाता है।

बिहार में ब्रिटिश सेना के विरुद्ध बगावत

ज्ञात हो कि नाना साहेब, ताँत्या टोपे और रानी लक्ष्मीबाई सरीखे अनेक महान क्रांतिवीरों की अगुवाई में छेड़े गये 1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख  केंद्र थे- दिल्ली, मेरठ, कानपुर, लखनऊ, बरेली, बुंदेलखंड और आरा। बैरकपुर छावनी के चर्बी कांड विरोध में मंगल पाण्डेय ने अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था।

देश भर से कई राष्ट्रभक्त राजे व रियासतें  आजादी की इस जंग में कूद पड़े थे। बिहार में इस गदर का नेतृत्व किया था बाबू कुंवर सिंह ने। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिहार में जुलाई 1857 में वीर कुंवर सिंह के नेतृत्व में दानापुर में सैनिकों ने विद्रोह कर दो दिन के जोरदार संघर्ष के बाद आरा जिला मुख्यालय पर कब्जा कर लिया।

दानापुर और आरा की इस लड़ाई की ज्वाला बिहार में सर्वत्र व्याप्त हो गयी। इससे बुरी तरह बौखलायी ब्रिटिश सेना ने उनकी रियासत जगदीशपुर पर हमला कर उसे तहस नहस कर डाला।

बावजूद इसके वीरकुँवर सिंह का आत्मबल टूटा नहीं और वे भावी संग्राम की योजना बनाने में जुट गये। वे क्रांति के अन्य संचालक नेताओं से मिलकर आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ाना चाहते थे। कुँवर सिंह सासाराम से मिर्ज़ापुर होते हुए रीवा, कालपी, कानपुर एवं लखनऊ तक गए। लखनऊ में शांति नहीं थी, इसलिए बाबू कुँवर सिंह ने आजमगढ़ की ओर प्रस्थान किया।

आजमगढ़ की ओर जाने का उनका उद्देश्य था इलाहाबाद एवं बनारस पर आक्रमण कर शत्रुओं को पराजित करना और अंतत: जगदीशपुर पर अधिकार करना। अँग्रेज सेना से घमासान युद्ध के बाद  उन्होंने 22 मार्च 1858 को आजमगढ़ पर कब्जा कर लिया। अँग्रेजों ने दुबारा आज़मगढ़ पर आक्रमण किया और कुँवर सिंह ने फिर आजमगढ़ में अँग्रेजों को हराया।

इस प्रकार अँग्रेजी सेना को परास्त कर वीर कुँवर सिंह 23 अप्रैल 1858 जगदीशपुर पर पुनः अधिकार कर स्वाधीनता की विजय पताका फहरा दी। किंतु इस बूढ़े शेर को बहुत अधिक दिनों तक इस विजय का आनंद लेने का सौभाग्य न मिला। इस विजय उत्सव के तीन दिन बाद ही 26 अप्रैल 1858 को यह वीर इस संसार से विदा होकर अपनी अमर कहानी छोड़ गया।

कुँवर सिंह के रणकौशल को समझने में असमर्थ थी अँग्रेज सेना

स्वाधीनता सेनानी वीर कुँवर सिंह युद्ध कला में अत्यंत कुशल थे। छापामार युद्ध में उन्हें महारत हासिल थी। अँग्रेज़ी सेनानायक उनके रणकौशल को समझने में पूर्णत: असमर्थ थे। कहा जाता है एक बार वीर कुँवर सिंह को अपनी सेना के साथ गंगा पार करनी थी। अँग्रेज सेना निरंतर उनका पीछा कर रही थी, पर कुँवर सिंह भी कम चतुर नहीं थे।

उन्होंने अफवाह फैला दी कि वे अपनी सेना को बलिया के पास हाथियों पर चढ़ाकर पार कराएँगे। फिर क्या था, अँग्रेज सेनापति डगलस बहुत बड़ी सेना लेकर बलिया के निकट गंगा तट पर पहुँचा और कुँवर सिंह की प्रतीक्षा करने लगा। उधर कुँवर सिंह ने बलिया से सात मील दूर शिवराजपुर नामक स्थान पर अपनी सेना को नावों से गंगा पार करा दिया। जब डगलस को इस घटना की सूचना मिली तो वह भागते हुए शिवराजपुर पहुँचा पर कुँवर सिंह की तो पूरी सेना गंगा पार कर चुकी थी।

एक अंतिम नाव रह गई थी और कुँवर सिंह उसी पर सवार थे। अँग्रेज सेनापति डगलस को अच्छा मौका मिल गया। उसने गोलियाँ बरसानी आरंभ कर दीं, तब कुँवर सिंह के बाएँ हाथ की कलाई को भेदती हुई एक गोली निकल गई।

कुँवर सिंह को लगा कि अब हाथ तो बेकार हो ही गया और गोली का जहर भी फैलेगा, उसी क्षण उन्होंने गंगा मैया की ओर भावपूर्ण नेत्रों से देखा और अपने बाएँ हाथ को काटकर गंगा मैया को अर्पित कर दिया।

कुँवर सिंह ने अपने ओजस्वी स्वर में कहा, “हे गंगा मैया! अपने प्यारे की यह अकिंचन भेंट स्वीकार करो।”

अनेक सामाजिक कार्य भी किए थे वीर कुँवर सिंह ने

वीर कुँवर सिंह ने ब्रिटिश हुक़ूमत के साथ लोहा तो लिया ही उन्होंने अनेक सामाजिक कार्य भी किए। आरा जिला स्कूल के लिए जमीन दान में दी जिस पर स्कूल के भवन का निर्माण किया गया। वे निर्धन व्यक्तियों की खुलेमन से सहायता करते थे। उन्होंने अपने इलाके में आरा-जगदीशपुर सड़क और आरा-बलिया सड़क का निर्माण कराने के साथ कई कुएँ व तालाब भी खुदवाये थे। बाबू कुँवर सिंह की लोकप्रियता इतनी थी कि बिहार की कई लोकभाषाओं में उनकी प्रशस्ति लोकगीतों के रूप में आज भी गायी जाती है।

Topics: Bihar History1857 Revolt HeroesIndependence Day SpecialJagdishpurVeer Kunwar Singh23 April Vijayotsav
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