मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक स्थल भोजशाला से जुड़ा विवाद एक बार फिर इंदौर खंडपीठ के हाई कोर्ट में चर्चा में है। इस मामले की नियमित सुनवाई के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अपने तर्क अदालत के सामने रखे।
भोजशाला में 100 साल से अधिक पुराने सर्वे और संस्कृत अवशेष मिले- एएसआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन ने बताया कि भोजशाला का अध्ययन आज का नहीं है, बल्कि पिछले 100 से अधिक वर्षों से इसका लगातार सर्वे और शोध होता आ रहा है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1902-03 में भी यहां विस्तृत सर्वे किया गया था, जिसमें कई ऐतिहासिक अवशेषों का रिकॉर्ड तैयार किया गया था। एएसआई ने यह भी बताया कि समय-समय पर हुए विभिन्न सर्वे में भोजशाला से मूर्तियां और पत्थरों पर संस्कृत में लिखे श्लोक मिले हैं। इन अवशेषों से यह संकेत मिलता है कि यह स्थान प्राचीन भारतीय शिक्षा और संस्कृति से जुड़ा रहा है।
2024 सर्वे रिपोर्ट और ऐतिहासिक दर्जे पर एएसआई का पक्ष- कोर्ट को यह भी जानकारी दी गई कि वर्ष 2024 में हाई कोर्ट के आदेश के बाद एएसआई ने आधुनिक तकनीकों की मदद से एक नया और विस्तृत सर्वे किया। इसकी रिपोर्ट पहले ही अदालत में जमा की जा चुकी है। इस रिपोर्ट में भी पहले जैसे ही तथ्य सामने आए हैं, जैसे संस्कृत श्लोक और प्राचीन मूर्तियां। एएसआई ने बताया कि भोजशाला को वर्ष 1908 में ही पुरातत्व महत्व की सूची में शामिल किया गया था और बाद में 1958 में इसे संरक्षित भवन घोषित किया गया। इससे यह साफ होता है कि सरकार भी इसके ऐतिहासिक महत्व को मानती है। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि “भोजशाला” और “कमाल मौला मस्जिद” नाम सबसे पहले किस दस्तावेज में दर्ज हुए और क्या इस पर कोई आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी हुआ था। इस पर दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग दलीलें दी गईं। अब इस मामले में मंगलवार को एएसआई अपने 98 दिन चले हालिया सर्वे की पूरी रिपोर्ट पर विस्तार से तर्क रखेगा। इसके बाद मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद अपना पक्ष अदालत में प्रस्तुत करेंगे।















