“बाबा साहब डॉ. आंबेडकर एवं उनकी दूरदृष्टि” सत्र में दिल्ली, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश के 9 विशेषज्ञ अध्यापकों द्वारा डॉ. आंबेडकर पर शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. राजकुमार फुलवरिया द्वारा की गई। प्रथम शोधपत्र डॉ. देवराज सिंह द्वारा “भारत के संविधान के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन” विषय पर प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने संविधान की विभिन्न धाराओं के माध्यम से सामाजिक जीवन में उन्नति कैसे हुई, इस पर विस्तार से चर्चा की
- डॉ. राहुल चिकमुरकर ने डॉ. आंबेडकर के आर्थिक दर्शन की अत्यंत सुंदर व्याख्या की। उन्होंने अपने व्याख्यान में यह स्पष्ट किया कि डॉ. आंबेडकर की आर्थिक सोच आज भी प्रासंगिक है और समावेशी एवं न्यायपूर्ण भारत के निर्माण के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होती है।
- डॉ. अजय कुमार ने “लोकतांत्रिक समावेशन: डॉ. आंबेडकर के राष्ट्र-निर्माण का सपना” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि डॉ. आंबेडकर का लोकतांत्रिक समावेशन का दृष्टिकोण आज भी समावेशी, सशक्त और विकसित भारत के निर्माण के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
- डॉ. राकेश पुनिया ने “हमारा संविधान एवं बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर की प्रेरणा” विषय पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने संविधान के निर्माण के बारे में अत्यंत सुंदर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत के स्वतंत्र होने के बाद एक ऐसे संविधान की आवश्यकता थी, जो देश की विविधताओं को एकता में बांध सके। डॉ. आंबेडकर ने प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में एक आधुनिक, लोकतांत्रिक और समावेशी संविधान का निर्माण किया, जिसमें समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्यों को प्रमुख स्थान दिया गया।
- डॉ. प्रिया गहलोत ने “सामाजिक न्याय एवं डॉ. आंबेडकर” विषय पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने कहा कि डॉ. आंबेडकर ने महिलाओं को समाज में समान अधिकार दिलाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, संपत्ति के अधिकार, विवाह और तलाक में समानता तथा कार्यस्थल पर सम्मान और सुरक्षा के पक्ष में आवाज उठाई। हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को कानूनी अधिकार दिलाने की दिशा में डॉ. आंबेडकर का प्रयास ऐतिहासिक रहा।
- डॉ. सुभाष कुमार ने अपने शोधपत्र के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि डॉ. आंबेडकर ने राज्य की सक्रिय भूमिका, भूमि सुधार, औद्योगीकरण तथा श्रमिकों के अधिकारों पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि जब तक आर्थिक संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण नहीं होगा, तब तक वास्तविक लोकतंत्र स्थापित नहीं हो सकता।
- डॉ. सन्नी ने डॉ. आंबेडकर को पत्रकार, लेखक, संपादक एवं कलम के सिपाही के रूप में प्रस्तुत किया तथा उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों एवं संपादन कार्यों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया।
- सत्र के संयोजक डॉ. रजनीकान्त ने “डॉ. आंबेडकर एवं समरसता” विषय पर सामाजिक समरसता के दृष्टिकोण को संक्षेप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, समरसता तभी संभव है जब समाज में प्रत्येक व्यक्ति को समान अवसर और अधिकार मिलें तथा किसी प्रकार का भेदभाव न हो।
- सत्र के अध्यक्ष डॉ. राजकुमार फुलवरिया ने अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. आंबेडकर के राष्ट्रवाद को समावेशी और लोकतांत्रिक स्वरूप में देखा, जिसमें सभी वर्गों को समान अधिकार और अवसर प्राप्त हों। उन्होंने कहा कि डॉ. आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से एक ऐसे राष्ट्र की नींव रखी, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित है।















