नई दिल्ली । केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी जंग तेज हो गई है। बुधवार को सुनवाई के चौथे दिन, मंदिर का प्रबंधन संभालने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने अपनी दलीलें पेश करते हुए स्पष्ट किया कि यह मामला किसी रेस्टोरेंट या साधारण दुकान का नहीं है, बल्कि एक ‘आजन्म ब्रह्मचारी’ देवता की मर्यादा और करोड़ों भक्तों की आस्था से जुड़ा है।
जानिए सबरीमाला केस सुनवाई के 5 बड़े अपडेट्स
बता दें कि वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के सामने मंदिर का पक्ष रखा। वहीं सुनवाई के दौरान कई ऐसे बिंदु सामने आए जो धर्म और संविधान के बीच के बारीक संतुलन को दर्शाते हैं-
1. जनहित याचिका (PIL) के दुरुपयोग पर चिंता
अधिवक्ता सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दलील दी कि धार्मिक परंपराओं में ‘बाहरी हस्तक्षेप’ रोकने के लिए PIL से बचना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति, जिसका उस धर्म से जुड़ाव नहीं है, सदियों पुरानी परंपराओं को कोर्ट में चुनौती दे सकता है..?
2. धर्म की ‘मजबूती’ और समाज सुधार
वहीं सर्वोच्च अदालत ने भी सुनवाई के दौरान एक बेहद गंभीर टिप्पणी करते हुए स्पष्ट कहा कि सामाजिक सुधार आवश्यक है, लेकिन इसके नाम पर किसी धर्म के मूल स्वरूप को खत्म या खोखला नहीं किया जा सकता। साथ ही जजों ने माना कि सुधार और मान्यताओं के बीच एक ‘बैलेंस’ होना चाहिए।
3. अनुच्छेद 25 vs अनुच्छेद 26 (संवैधानिक टकराव)
वहीं कोर्ट में इस बात पर बहस हुई कि क्या किसी धार्मिक संस्था का सामूहिक अधिकार (अनुच्छेद 26), किसी व्यक्ति के निजी अधिकार (अनुच्छेद 25) से बड़ा हो सकता है। जबकि TDB का मानना है कि मंदिर को अपने नियम तय करने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए।
4. प्रथाओं को कौन तय करेगा.?
अधिवक्ता सिंघवी ने सर्वोच्च अदालत में तर्क दिया कि कौन सी प्रथा धर्म का हिस्सा है, यह तय करने का हक धार्मिक समुदाय को होना चाहिए, न कि कोर्ट को। जिसके बाद इस तर्क पर जजों ने भी न्यायिक सक्रियता की सीमाओं पर चर्चा की।
5. सबरीमाला में महिला प्रवेश और देव स्वरूप
वहीं TDB ने अदालत को जानकारी देते हुए कहा कि भारत में भगवान अय्यप्पा के लगभग 1,000 मंदिर हैं जहाँ पर महिलाएँ जा सकती हैं। लेकिन सबरीमाला की विशिष्टता वहां के देवता का ‘ब्रह्मचारी स्वरूप’ है, और 10 से 50 वर्ष की महिलाओं का प्रवेश इसी स्वरूप के विपरीत माना जाता है।
जानिए सबरीमाला विवाद का अब तक का सफर
1991 : केरल हाईकोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को जायज ठहराया था।
2018 : सुप्रीम कोर्ट ने इस बैन को भेदभावपूर्ण बताते हुए हटा दिया था।
वर्तमान स्थिति : 2018 के फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिसके बाद 7 महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर अब बड़ी पीठ सुनवाई कर रही है।
अदालत की अहम टिप्पणी :
सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस सुनवाई के दौरान अदालत ने एक अहम टिपण्णी करते हुए कहा- “करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना दुनिया के सबसे कठिन कामों में से एक है।”
अब आगे क्या..?
7 अप्रैल से शुरू हुई इस सुनवाई में केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि कई देवी मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश वर्जित है, इसलिए परंपराओं का सम्मान होना चाहिए। फिलहाल, इस मामले पर बहस जारी है और सबकी नजरें आने वाले फैसले पर टिकी हैं।
















