खालसा पंथ की स्थापना: गुरु गोबिंद सिंह जी का एकता और शक्ति का महान अवदान
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खालसा पंथ की स्थापना: गुरु गोबिंद सिंह जी का एकता और शक्ति का महान अवदान

1699 की बैसाखी पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना कर भारतीय समाज में एकता, शक्ति और समानता का संदेश दिया। जानिए पंच प्यारे, खंडे दी पाहुल और खालसा के पांच प्रतीकों की ऐतिहासिक कहानी।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Apr 14, 2026, 01:03 pm IST
inविश्लेषण, पंजाब

साहिब-ए-कमाल प्रात: वंदनीय श्री गुरू गोबिन्द सिंह जी देश के केवल आध्यात्मिक नेता ही नहीं बल्कि उच्च कोटि के समाज शास्त्री, विद्वान और हमारे राष्ट्र नायक भी थे। उन्होंने भारतीय समाज में पड़ी फूट की व मतभेदों की बीमारी को पहचाना और पाया कि देश की लगभग सभी समस्याओं का कारण हमारा आपसी बिखराव ही है। इसी को दूर करने के लिए उन्होंने 1699 में आज के दिन बैसाखी के अवसर पर खालसा पंथ की स्थापना की और देश समाज को एकजुट करने का महाप्रयास किया। वह खालसा जो भक्ति के साथ शक्ति का भी उपासक है, वह खालसा जो एकजुट है, चरित्रवान है, निर्बलों, गरीबों व महिलाओं का रक्षक है।

खालसा का प्रतीक पांच प्यारे

पंच प्यारे, यह नाम पांच सिखों भाई दया सिंह, भाई धर्म सिंह, भाई हिम्मत सिंह, भाई मोहकम सिंह और भाई साहिब सिंह को दिया गया है, जिन्हें गुरु गोविंद सिंह ने 30 मार्च 1699 को बैसाखी वाले दिन आनंदपुर साहिब में ऐतिहासिक दीवान में यह उपाधि दी थी। भारतीय शास्त्रीय परंपरा में भी, पंच (पांच) का विशेष महत्व है। गुरु नानक देव जी ने जपजी साहिब में पांच खंडों का उल्लेख किया है, अर्थात् आध्यात्मिक विकास के चरण, और आध्यात्मिक रूप से जागृत व्यक्ति को पंच कहा है। भारतीय सामाजिक-राजनीतिक संस्था पंचायत का अर्थ पांच वरिष्ठ लोगों की परिषद है। पूर्व गुरुओं के समय में भी पांच सदस्यों की एक आंतरिक परिषद जैसी व्यवस्था थी- पांच सिख गुरु अर्जुन देव जी के साथ लाहौर की उनकी अंतिम यात्रा पर गए थे; उनके उत्तराधिकारी गुरु हरगोबिंद ने इन पांचों को 100-100 सशस्त्र सिखों की कमान सौंपी थी; गुरु तेग बहादुर भी दिल्ली में बलिदान के लिए जाते समय पांच सिखों के साथ निकले थे।

चरण पाहुल से खण्डे दी पाहुल

सन् 1699 की बैसाखी तक सिख दीक्षा चरण पाहुल से होती थी। इसमें नवदीक्षित को चरणामृत पिलाना शामिल था। सिख विद्वान भाई गुरदास के अनुसार, यह वह प्रथा थी जिसे गुरु नानक देव जी ने सिखों के लिए शुरू किया। समारोह में नवदीक्षित गुरु के चरणों पर उंडेला गया जल पीते थे और धार्मिक एवं नैतिक आदेशों के साथ-साथ निर्धारित सामुदायिक आचरण संहिता का पालन करने की प्रतिज्ञा करते थे। बाद में, गुरुओं द्वारा विशेष रूप से अधिकृत मसंद भी चरण पाहुल का संचालन करते थे। गुरु गोबिंद सिंह ने चरण पाहुल के स्थान पर खंडा दी पाहुल की प्रथा शुरू की। उन्होंने 30 मार्च 1699 को बैसाखी के दिन आनंदपुर के केशगढ़ किले में एक विशेष सभा बुलाई। सुबह की अरदास और कीर्तन के बाद , वे अचानक हाथ में तलवार लिए खड़े हो गए और बोले- ‘पूरी संगत मुझे बहुत प्रिय है; लेकिन क्या कोई समर्पित सिख है जो अभी और यहीं मुझे अपना सिर दे?

इस समय एक ऐसी आवश्यकता उत्पन्न हो गई है जिसके लिए एक सिर की आवश्यकता है।’ सभा में सन्नाटा छा गया। लाहौर के निवासी दया राम उठे और स्वयं को प्रस्तुत किया। वे गुरु के पीछे-पीछे पास के एक तंबू में चले गए। गुरु गोबिंद सिंह खून से लथपथ तलवार लिए वापस आए और एक और सिर की मांग की। इस बार हस्तिनापुर के एक जाट धर्मदास सभा में से निकले और गुरु के पीछे-पीछे गए। गुरु गोबिंद सिंह ने तीन बार और पुकारा। द्वारका के मोहकम चंद, जगन्नाथ के झीवर हिम्मत और बीदर के नाई साहिब चंद एक के बाद एक खड़े हुए और अपने सिर अर्पित करने के लिए आगे बढ़े।

कुंवर सिंह, गुरबिलास पातशाही 10 में लिखते हैं कि गुरु गोबिंद सिंह तम्बू से ‘पांचों शिष्यों का हाथ थामे’ बाहर आए। शिष्यों ने केसरिया वस्त्र पहने थे और उसी रंग की करीने से बंधी पगड़ी पहनी हुई थी। गुरु गोबिंद सिंह ने भी उसी प्रकार वस्त्र धारण किया और अपने चुने हुए सिखों का परिचय सभा में पंच प्यारे के रूप में कराया, जो गुरु के पांच प्रिय शिष्य थे। इसके बाद उन्होंने विधि-विधान का पालन किया। एक लोहे के कटोरे में स्वच्छ जल भरकर, उन्होंने उसे खंडा (दोधारी तलवार) से मथा और साथ ही पवित्र बाणी का पाठ किया। गुरु गोबिंद सिंह की पत्नी माता जीतोजी पतासे लाईं, जिन्हें गुरु के आदेश पर बर्तन में डाला गया। इस प्रकार मिठास लोहे के रसायन के साथ मिल गई। अमृत, अमरता का अमृत, अब तैयार था और गुरु गोबिंद सिंह ने पांचों सिखों को पांच-पांच अंजुली भर अमृत पीने को दिया और बाद में उनसे खुद अमृतपान किया। इस तरह उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की।

देश व समाज को एकता के सूत्र में पिरोया

पांच सिखों ने—जिनमें से तीन तथाकथित निम्न जाति के थे, एक क्षत्रिय और एक जाट—स्वार्थ त्याग, वीरता और जातिविहीन खालसा समुदाय की नींव रखी, जिसकी स्थापना गुरु गोबिंद सिंह ने की थी। उन्हें सिंह उपनाम दिया गया, जिसका अर्थ है शेर और उन्हें हमेशा खालसा के पांच प्रतीक धारण करने थे— केश; कंघा; कड़ा, कच्छा और कृपाण। उन्हें असहायों की सहायता करने और अत्याचारियों से लडऩे, एक ईश्वर में आस्था रखने और जाति-धर्म के भेदभाव के बिना सभी मनुष्यों को समान मानने का आदेश दिया गया।

सशक्त व लोकतांत्रिक समाज की नींव

इतिहास साक्षी है कि देश समाज को सशक्त, एकजुट, बलशाली करने और देश-धर्म की रक्षा करने में खालसा पंथ व इसके पैरोकारों ने अग्रणी भूमिका निभाई। खालसा पंथ ने समाज के जाति बंधनों की जकड़ को ढीला किया और इसके माध्यम से गुरु गोबिन्द सिंह जी ने एक लोकतांत्रिक, समरस और भ्रातृभाव के सिद्धांतों पर आधारित देश-समाज की नींव रखी।

Topics: the Panj PyareVaisakhiKhande Di Pahulआनंदपुर साहिबAnandpur SahibGuru Gobind Singh Jiखालसा पंथ की स्थापनागुरु गोबिंद सिंह जीपंच प्यारेबैसाखीखंडे दी पाहुलEstablishment of the Khalsa Panth
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