नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े प्रदीप जोशी जी ने “विज्ञान और प्रौद्योगिकी उपायों के माध्यम से जनजातीय जीवन में परिवर्तन-भाषा, आस्था और संस्कृति का संरक्षण” विषय पर अपने विचार अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किए। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता कोई साधारण यात्रा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों में विकसित हुई एक समृद्ध, जीवंत और मूल्यनिष्ठ परंपरा है। इस दीर्घकालिक विकास यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि हमारा समाज सदैव मानवीय मूल्यों पर आधारित रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि भारतीय समाज में मानव मात्र का सम्मान सर्वोपरि रहा है। यहाँ जीवन की मूल धारणा प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलने की रही है, जहाँ मानव और प्रकृति के बीच सह-अस्तित्व का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि हमारी संस्कृति केवल विकास की बात नहीं करती, बल्कि सतत और संतुलित विकास की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग भी दिखाती है। इसके साथ ही, भारत की सामाजिक संरचना सदैव समावेशी रही है—जहाँ सभी वर्गों, समुदायों और परंपराओं को साथ लेकर चलने की भावना रही है। विशेष रूप से जनजातीय समाज, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत के महत्वपूर्ण संरक्षक हैं, उनके जीवन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के माध्यम से सकारात्मक परिवर्तन लाना आवश्यक है, ताकि उनकी भाषा, आस्था और संस्कृति का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सके।
आज भी अगर हमें इन मूल्यों को सबसे सजीव रूप में कहीं देखना हो, तो वह हमारे जनजातीय क्षेत्रों में देखने को मिलता है। कई बार आधुनिक जीवन की भागदौड़ में हम अपने मूल्यों से भटक जाते हैं। ऐसे समय में यदि हमें अपनी दिशा को फिर से सही करना हो, तो जनजातीय समाज हमारे लिए एक “कम्पास रीसेट” करने जैसा स्थान बन सकता है। जनजातीय क्षेत्रों में हमें सिखाने के लिए नहीं, बल्कि सीखने के लिए जाना चाहिए। मेरा भी अनुभव यही रहा है कि विशेषकर उत्तर-पूर्व भारत में जाने पर जीवन के कई नए पहलुओं को समझने का अवसर मिलता है। वहाँ की संस्कृति, परंपराएँ और जीवन शैली हमें नई दृष्टि देती हैं।
भाषा और ज्ञान की समृद्धता- उदाहरण के लिए, अरुणाचल प्रदेश की ‘आदि’ जनजाति में गंध (सुगंध-दुर्गंध) के लिए छह अलग-अलग शब्द हैं। यह दिखाता है कि उनकी भाषा कितनी समृद्ध और अनुभव-आधारित है। वे अपनी भाषा को निरंतर विकसित और समृद्ध बनाने का प्रयास करते रहते हैं। जनजातीय क्षेत्रों के त्योहार और परंपराएँ केवल उत्सव नहीं हैं, बल्कि उनमें गहरा ज्ञान छिपा होता है। जैसे कुछ स्थानों पर फसल कटाई के समय होने वाले नृत्य और कार्यक्रम हमारी विकास यात्रा (इवोल्यूशन) को दर्शाते हैं। यह ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है। इन समाजों की अपनी अलग न्याय व्यवस्था होती है, जो प्रकृति के साथ संतुलन पर आधारित होती है। यदि कोई व्यक्ति प्रकृति को नुकसान पहुँचाता है, तो उसके लिए अलग प्रकार की जिम्मेदारी और सुधार की व्यवस्था होती है। यह हमें सिखाता है कि जीवन और प्रकृति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
स्थानीय तकनीक और नवाचार- जनजातीय समाज तकनीक से भी पीछे नहीं है। उदाहरण के तौर पर, कुछ क्षेत्रों में चूहों को पकड़ने के लिए 14 प्रकार के अलग-अलग जाल (ट्रैप) बनाए गए हैं। यह दर्शाता है कि उनके पास अपने अनुभवों के आधार पर विकसित की गई समृद्ध तकनीकी समझ है। आज पूरी दुनिया कई समस्याओं से जूझ रही है, जैसे उपभोक्तावाद (Consumerism), पर्यावरण संकट और सामाजिक टकराव। ऐसे समय में जनजातीय समाज हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीने का तरीका सिखा सकता है। यदि हमें पर्यावरण संरक्षण के लिए नया दृष्टिकोण बनाना है, तो इन समाजों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
हमारी कमी क्या रही- यह भी सच है कि हमने समाज को समझने और उनके ज्ञान को संरक्षित करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए। हमने उनके इतिहास, उनके संघर्ष, उनके नायकों और समाज सुधारकों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उनके योगदान को वह पहचान नहीं मिली, जिसके वे हकदार हैं। ब समय आ गया है कि हम जनजातीय समाज को नए दृष्टिकोण से देखें। हमें उनके अतीत, वर्तमान और भविष्य पर गंभीर चर्चा करनी चाहिए। उनके ज्ञान, परंपराओं और अनुभवों को समझकर ही हम एक संतुलित और समृद्ध समाज का निर्माण कर सकते हैं।

















