पश्चिम बंगाल  : अधिकार सबका विकास कुछ का
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पश्चिम बंगाल : अधिकार सबका, विकास कुछ का

सरकारी नीतियों के केंद्र में होता है सबके विकास का भाव। किंतु ममताराज के दौरान मुस्लिमों के लिए आवंटन बढ़ता गया क्योंकि ऐसा करने के पीछे थी वोटबैंक मजबूत करने की मंशा

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 11, 2026, 01:57 pm IST
in विश्लेषण, पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल के समकालीन राजनैतिक विमर्श में ‘अल्पसंख्यक कल्याण’ शब्द मात्र एक प्रशासनिक शब्दावली नहीं, बल्कि एक सुनियोजित चुनावी रणनीति बन चुका है। 2011 में सत्ता परिवर्तन के बाद ममता बनर्जी सरकार ने राज्य के संसाधनों का जिस प्रकार पुनर्विभाजन किया है, वह ‘समावेशी विकास’ के बजाय ‘चुनिंदा तुष्टीकरण’ की ओर अधिक झुका दिखता है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार के 2011 में सत्ता में आने के बाद से अल्पसंख्यक कल्याण, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय के लिए योजनाओं और बजटीय आवंटन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। 2010 से 2026 के बीच अल्पसंख्यक बजट में हुई 1100% से अधिक की वृद्धि ने राज्य के सामाजिक ताने-बाने और वित्तीय संतुलन को प्रभावित किया है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वयं विधानसभा में घोषणा की कि 2010-11 में 472 करोड़ रुपये के बजट की तुलना में 2023-24 में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के लिए आवंटन बढ़कर 4,233 करोड़ रुपये हो गया, जो आठ गुना से अधिक की वृद्धि दर्शाता है। वृद्धि का यह सिलसिला और भी बढ़ा और 2024-25 के लिए बजटीय आवंटन बढ़कर 5,530.65 करोड़ रुपये हो गया, जो 2010-11 की तुलना में लगभग 11.7 गुना अधिक है। इसके बाद 2025-26 के ताजा बजट में तो यह आंकड़ा 5,602 करोड़ रुपये को पार कर गया।

बजटीय विस्फोट

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सत्ता संभालने के बाद से ‘अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग’ के बजट में जो वृद्धि हुई है, वह राज्यों के वित्तीय इतिहास में अनूठी ही है।

वर्ष 2010-11 (वामपंथी शासन का अंतिम वर्ष) के दौरान अल्पसंख्यक विभाग का कुल आवंटन 472 करोड़ रुपये था। तब की वामपंथी सरकार का ध्यान मुख्य रूप से मदरसा शिक्षकों के वेतन और ‘बहु-क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम’ (एमएसडीपी) के तहत बुनियादी ढांचे तक सीमित था। सत्ता में आते ही ममता बनर्जी ने वर्ष 2011-12 के बजट को बढ़ाकर 615 करोड़ रुपये कर दिया। वर्ष 2024-25 के संशोधित अनुमानों के अनुसार यह बजट इस साल 5,530.65 करोड़ रुपये तक पहुंच गया और वर्ष 2026 के लिए पेश हालिया बजट में अल्पसंख्यक कल्याण के लिए रिकॉर्ड 5,620 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

शिक्षा बनाम मदरसा

जब हम अल्पसंख्यक बजट की तुलना अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक क्षेत्रों से करते हैं, तो प्राथमिकता का अंतर स्पष्ट हो जाता है। 2021 से 2026 के बीच जहां एससी/एसटी कल्याण बजट की वृद्धि दर औसत 8-10% रही, वहीं अल्पसंख्यक विभाग के बजट में 25% से अधिक की वार्षिक वृद्धि देखी गई।

राज्य के सामान्य प्राथमिक शिक्षा बजट में बुनियादी ढांचे की कमी के बावजूद, अकेले ‘ऐक्यश्री’ योजना के लिए 1,500 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया है। यह छात्रवृत्ति विशेष रूप से अल्पसंख्यक छात्रों के लिए है।

‘लक्खी भंडार’ जैसी सार्वभौमिक योजनाओं के समानांतर, अल्पसंख्यक महिलाओं के स्वरोजगार के लिए पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम के माध्यम से विशेष ऋण सुविधाएं दी गई हैं, जो सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए उपलब्ध नहीं। 2010 से 2026 के बीच अल्पसंख्यकों के लिए बजट का 472 करोड़ रुपये से बढ़कर 5,620 करोड़ रुपये पर पहुंच जाना दिखाता है कि सरकार ने राज्य की संचित निधि का बड़ा हिस्सा एक खास समुदाय के सामाजिक सुदृढ़ीकरण के लिए ‘सुरक्षित-सा’ कर दिया।

संस्थागत भेदभाव

धार्मिक आयोजनों के मामले में ममता सरकार की नीतियां दोहरे मापदंड का शिकार रही हैं। ममता सरकार ‘हज हाउस’ के निर्माण और हज यात्रियों की सुविधाओं के लिए करोड़ों रुपये आवंटित करती है। इसके विपरीत, गंगासागर मेला -जो कुंभ के बाद दूसरा सबसे बड़ा हिन्दू समागम है- को ‘राष्ट्रीय मेला’ घोषित कराने के लिए तो राज्य सरकार केंद्र से लड़ती है, लेकिन हिन्दू तीर्थयात्रियों के लिए ‘धार्मिक यात्रा कोष’ बनाने की पहल नहीं करती जैसा हज के लिए मौजूद है।

मुअज्जिन बनाम पुजारी: 2012 में इमामों और मुअज्जिनों के लिए भत्ता शुरू किया गया। वर्तमान में इमाम को 3,000 रुपये और मुअज्जिन को 1,500 रुपये मिलते हैं।

हिन्दू आबादी लगभग 70% होने के बावजूद, पुरोहित कल्याण योजना में पुजारी को केवल 1,500 रुपये मिलते हैं, और इसके लिए पात्रता शर्तें (जैसे आय प्रमाणपत्र और गरीबी रेखा) इतनी कठिन हैं कि केवल 8,000 पुजारी इसका लाभ ले पा रहे हैं। जबकि 55,000 से अधिक इमामों और मुअज्जिनों को बिना किसी कठिन ‘आय पड़ताल’ के वक्फ बोर्ड के माध्यम से सीधे भुगतान किया जाता है। पश्चिम बंगाल वक्फ बोर्ड की आधिकारिक सूची और अल्पसंख्यक मामलों के विभाग की वार्षिक रिपोर्ट (2023-24) के अनुसार राज्य में 30,000 से अधिक इमाम और 25,000 से अधिक मुअज्जिन इस योजना के तहत पंजीकृत हैं।

जनसंख्या का हाल

जनगणना 2011 के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 27.01%, ईसाई 0.72%, बौद्ध 0.31%, जैन 0.07% और सिख आबादी 0.07% है। परिभाषा के अनुसार ये सभी अल्पसंख्यक हैं। 2011 में हुई जनगणना और 2026 के अनुमानों के आधार पर स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह हैं। स्थिति का अंदाजा लगाने के लिए 2011 की जनगणना को आधार माना गया है क्योंकि 2021 की जनगणना स्थगित हो गई थी।

“दि रायसीना हिल्स (दिसं 2025)” और “फाइंडईजी (2026 अनुमानों)” के अनुसार, मुस्लिम आबादी 30% से 33% के बीच पहुंच गई है। जनगणना 2011 के अनुमानों और कोलकाता आबादी 2026 डेटा के अनुसार ईसाई आबादी में मामूली वृद्धि देखी गई है, जो मुख्य रूप से दार्जिलिंग और जलपाइगुड़ी के चाय बागान क्षेत्रों में केंद्रित है। बौद्ध आबादी (मुख्यतः उत्तर बंगाल के पहाड़ी क्षेत्रों में) स्थिर है। सिखों की आबादी में 2001 से 2011 के बीच गिरावट दर्ज की गई थी, और 2026 के अनुमानों में भी यह प्रवृत्ति जारी रहने की संभावना है।
योजनाओं का झुकाव: ‘ऐक्यश्री’ छात्रवृत्ति या ‘मदरसा बुनियादी ढांचा’ योजनाओं का 94% लाभ केवल मुस्लिम समुदाय को मिलता है। जबकि दार्जिलिंग के बौद्धों या कोलकाता के एंग्लो-इंडियंस और सिखों के लिए कोई विशेष ‘कल्याण बोर्ड’ या वैसा भारी-भरकम बजट नहीं जैसा मुस्लिम समुदाय के लिए है। ‘हज हाउस’ के निर्माण में जितनी तत्परता दिखाई गई, उतनी अन्य अल्पसंख्यक समूहों की सांस्कृतिक विरासत को बचाने में नहीं दिखी। स्पष्ट है कि ममता सरकार के लिए ‘अल्पसंख्यक’ शब्द केवल ‘मुस्लिम’ का पर्यायवाची है।

एकमुश्त मतदान है कारण

अब सवाल यह उठता है कि यदि ममता सरकार वोटबैंक को साधे रखने की रणनीति के कारण ही मुसलमानों की तरफदारी करती है, तो वह हिन्दूपरस्त राजनीति क्यों नहीं करतीं, क्योंकि पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं की आबादी तो 70% के आसपास है। इसका उत्तर चुनावी समाजशास्त्र में है।

दक्षिण एशिया और विशेष तौर पर भारत और पाकिस्तान के सामाजिक आचार-व्यवहार की विशेषज्ञता रखने वाले प्रसिद्ध फ्रांसीसी राजनीतिक विज्ञानी क्रिस्टोफ जैफरलॉट अपनी पुस्तक ‘रेलीजन, कास्ट एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया’ में तर्क देते हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय ‘अस्तित्वगत सुरक्षा’ के कारण एकमुश्त मतदान करता है। बंगाल में मुस्लिम मतदाता रणनीतिक रूप से उस दल को चुनता है जो उसे ‘सामाजिक और धार्मिक संरक्षण’ दे सके और इस कारण वह सबसे बड़ा ‘वोटबैंक’ बन जाता है।

इसके विपरीत, हिन्दू मतदाता जाति, वर्ग और विचारधारा में बंटा होता है जैसा कि जोया चटर्जी अपनी पुस्तक ‘दि स्पॉएल्स ऑफ पार्टिशन’ में बताती हैं कि बंगाल का हिन्दू समाज (मतुआ, राजबंशी, सवर्ण, ओबीसी में) ऐतिहासिक रूप से खंडित रहा है और इसलिए हिन्दुओं को एकमुश्त वोटबैंक के रूप में मानकर रणनीति नहीं बनाई जा सकती।

ममता बनर्जी जानती हैं कि 30% मुस्लिम वोट अगर ‘एकमुश्त’ मिल जाएं, तो उन्हें जीत के लिए केवल 15-20% हिन्दू वोटों की जरूरत होगी। यदि वह केवल ‘हिन्दू राजनीति’ करतीं, तो उन्हें भाजपा के साथ उन वोटों के लिए संघर्ष करना पड़ता जो पहले से ही जातियों में बंटे हैं। अतः 30% का ‘ठोस वोटबैंक’ उनके लिए सत्ता की गारंटी बन जाता है।

हज सब्सिडी रुकने के बाद बढ़ी परोक्ष मदद

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2012 में एक महत्वपूर्ण आदेश में हज सब्सिडी (हवाई किराये में छूट) को 2018 तक चरणबद्ध तरीके से खत्म करने का आदेश जारी किया। उसके बाद बंगाल समेत पूरे देश में यह सब्सिडी बंद कर दी गई। लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने इसकी भरपाई का अलग रास्ता निकाल लिया।

2017 में ममता सरकार ने एक अभूतपूर्व घोषणा की कि यदि हज यात्रा के दौरान किसी यात्री की मृत्यु हो जाती है, तो राज्य सरकार उसके परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवजा देगी। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाते हुए जब हिन्दुओं के गंगासागर मेले में किसी हादसे की स्थिति में ऐसी ही व्यवस्था की मांग की तो मजबूरन राज्य सरकार ने गंगासागर तीर्थयात्रियों के लिए भी 5 लाख रुपये का जीवन बीमा शुरू किया, लेकिन तब भी यह ‘हज मुआवजे’ का आधा ही रहा।

इसके अलावा राज्य सरकार ने 100 करोड़ रुपये की लागत से हज हाउस बनवाया जहां हजयात्रियों के लिए यात्रा से पहले ठहरने, भोजन और जरूरी जानकारी वगैरह देने की मुफ्त व्यवस्था होती है। यदि यात्री होटल में रुकते, तो उन्हें जेब से पैसे देने पड़ते। हज कमेटी के कर्मचारियों का वेतन, टीकाकरण का खर्च और हवाई अड्डे तक परिवहन की व्यवस्था राज्य सरकार वहन करती है।

तुष्टीकरण और सत्ता समीकरण

ममता बनर्जी सरकार के दौरान जैसे-जैसे अल्पसंख्यक बजट बढ़ाया गया, वैसे-वैसे चुनावी परिणामों में तृणमूल कांग्रेस का मुस्लिम वोट प्रतिशत बढ़ता गया।

2011 के विधानसभा चुनाव में अल्पसंख्यकों के लिए बजट 615 करोड़ रुपये था और तब तृणमूल को 45 प्रतिशत मुस्लिम वोट मिले थे। 2021 कि विधानसभा चुनाव में जब अल्पसंख्यक बजट 4,100 करोड़ रुपये किया गया तो उसके हिस्से मुसलमानों का 75% वोट आया। इसी रणनीति पर चलते हुए 2026 के हालिया बजट में ममता सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए बजट को बढ़ाकर 5,620 करोड़ रुपये कर दिया है।

अल्पसंख्यक कल्याण की आड़ में मुस्लिम वोट बैंक को साधने की यह कोशिश लोकतांत्रिक संतुलन के लिए घातक है। यह नीति ‘समान विकास’ के बजाय ‘चुनावी लाभ’ के लिए राज्य के खजाने का उपयोग करती है। जब तक वोटों का यह ध्रुवीकरण बना रहेगा, तब तक बंगाल की बजटीय नीतियों में तुष्टीकरण की यह झलक दिखती रहेगी।
स्रोतः पश्चिम बंगाल बजट अनुमान 2010-2026; जनगणना 2011;
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम की वार्षिक रिपोर्ट,
पश्चिम बंगाल आर्थिक सर्वेक्षण।

Topics: मदरसा शिक्षाबंगाल चुनाव 2026अल्पसंख्यक कल्याणवोटबैंक की राजनीतिऐक्यश्रीबंगाल चुनवपश्चिम बंगाल चुनावी मुद्देममता बनर्जीतुष्टीकरणपाञ्चजन्य विशेष
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