विश्लेषण

तमिलनाडु चुनाव में गठबंधन में दरार? DMK-कांग्रेस पर उठे बड़े सवाल!

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में गठबंधन की राजनीति गरमा गई है। DMK-कांग्रेस के बीच बढ़ती खटास, विजय की एंट्री और NDA की रणनीति ने मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया है।

Published by
अभय कुमार

दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के चुनावी रण में राजनीतिक तापमान बढ़ता जा रहा है। राज्य में इस बार चुनावी मुकाबला सिर्फ गठबंधनों के बीच ही नहीं बल्कि गठबंधन के घटक दलों के बीच भी है। इस चुनाव का परिणाम गठबंधन दलों के बीच आपसी तालमेल पर भी निर्भर करेगा। तमिलनाडु में एनडीए जहाँ ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेतृत्व में चुनावी मैदान में है, वहीं दूसरी तरफ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम नीत धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन मैदान में है।

वहीं अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम भी 233 सीटों पर उम्मीदवार उतार कर चुनावी मुकाबले को और भी रोचक और त्रिकोणीय बना दिया है। इसमें सभी गठबंधनों की अपनी मजबूती और कमजोरी भी है, जो समय के साथ खुलकर सामने आ रही है।

डीएमके-कांग्रेस गठबंधन पर उठते सवाल

धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और कांग्रेस पार्टी के बीच गठबंधन के बावजूद भी आपसी विश्वास पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। सवाल है कि यह गठबंधन चुनावी मजबूरी में किया गया है या विचारधारा के आधार पर? द्रविड़ मुनेत्र कड़गम नीत धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन में विश्वास की लकीर लगातार कमजोर होती जा रही है। भारत के राजनीतिक इतिहास में जो भी गठबंधन मजबूती और आपसी सहयोग से चुनाव लड़ता है, उसे जीत हासिल होने की ज्यादा संभावना रहती है। गठबंधन के दलों के बीच आपसी दरार और मनमुटाव के कारण अनेक बार जीती हुई बाजियां भी पलट जाती हैं।

विजय के बयान से बढ़ा विवाद

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम-कांग्रेस गठबंधन में ताजा विवाद तब उभरकर सामने आया जब अभिनेता जोसेफ विजय चंद्रशेखर ने दावा किया कि असली कांग्रेस पार्टी उनके साथ है। जोसेफ विजय के अनुसार डीएमके ने धनबल से कांग्रेस को अपने साथ जोड़ा है। स्टालिन ने कुछ कांग्रेस नेताओं को करोड़ों रुपए देकर अपनी जेब में रख लिया है। विजय के इस बयान के कारण पहले से ही असहज चल रहे डीएमके और कांग्रेस पार्टी के गठबंधन पर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार ने कांग्रेस पार्टी का डीएमके गठबंधन के साथ होने की बात दोहराई है। प्रश्न है कि अगर सब कुछ ठीक है तो फिर यह सफाई क्यों दी जा रही है?

सीट बंटवारे और संगठनात्मक असंतोष

कांग्रेस पार्टी और द्रमुक के बीच अंदर ही अंदर विवाद लंबे समय से चल रहा है। दोनों दल एक-दूसरे के साथ मजबूरी में गठबंधन में जुड़े हुए हैं। कांग्रेस पार्टी का राज्य की राजनीति में अकेले कोई ठोस अस्तित्व नहीं है, इस कारण कांग्रेस पार्टी इतनी नाराजगी के बावजूद भी द्रमुक के सामने झुकती दिखती है। राज्य में सीट बंटवारे में डीएमके ने कुल 234 सीटों में से 164 सीटें अपने पास रखी हैं। द्रमुक ने जीतने वाली सीटें अपने पास रखीं और कमजोर सीटें सहयोगी दलों को दी हैं। गठबंधन में कांग्रेस पार्टी को महज 28 सीटें ही चुनाव लड़ने के लिए दी गई हैं। 1967 से पूर्व तमिलनाडु की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाली कांग्रेस पार्टी का इतना सिमटना कई सवाल खड़े करता है। इसके अपमानजनक समझौते के कारण कांग्रेस पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष है।

राहुल गांधी की दूरी और राजनीतिक संकेत

इस गठबंधन से राहुल गांधी की दूरी भी कई प्रश्न खड़े कर रही है। अभी तक राहुल गांधी ने तमिलनाडु में सक्रिय प्रचार भी शुरू नहीं किया है। राहुल गांधी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और द्रमुक प्रमुख स्टालिन के साथ मंच साझा न करना भी कई सवाल खड़ा कर रहा है।

भाजपा के आरोप और राजनीतिक हमले

तमिलनाडु में विपक्षी दल इसको राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं। भाजपा निशाना साधते हुए कह रही है कि डीएमके का यह गठबंधन सत्ता के लिए बनाया गया गणित है, न कि विचारधारा के आधार पर। भाजपा का यह भी दावा है कि जब सहयोगी दलों के बीच भरोसा कमजोर हो, सीटों पर असंतोष हो और नेतृत्व मंच साझा करने में रुचि नहीं दिखा रहा हो, तो जनता ऐसे गठबंधन पर कितना भरोसा करेगी? भाजपा का यह भी कहना है कि राहुल गांधी और डीएमके चुनाव प्रचार में एक ही दिन पुडुचेरी में थे और दोनों के बीच चुनावी गठबंधन के बावजूद भी एक-दूसरे से नहीं मिले। दोनों ने अपने चुनावी संबोधन में एक-दूसरे का नाम तक नहीं लिया, जो उनके बीच आपसी तालमेल की कमी को दर्शाता है।

पुडुचेरी में भी दिखा गठबंधन का असर

विदित हो कि तमिलनाडु की तरह ही पुडुचेरी में भी इन दोनों दलों ने गठबंधन में चुनाव लड़ा है, मगर राहुल गांधी और स्टालिन ने न तो मंच साझा किया और न ही एक-दूसरे का नाम अपने संबोधन में लिया। पुडुचेरी में कांग्रेस पार्टी और डीएमके के बीच कई सीटों पर दोस्ताना संघर्ष ने दोनों दलों के बीच की खाई को और भी गहरा कर दिया है। भाजपा के अनुसार तमिलनाडु में डीएमके गठबंधन की हार कांग्रेस के लिए भी बड़ी हार साबित हो सकती है। तमिलनाडु की चुनावी जंग में गठबंधन दलों का आपसी तालमेल बड़ा सवाल बनता जा रहा है।

कांग्रेस के अंदर बढ़ती नाराजगी

कांग्रेस पार्टी के अंदर डीएमके के प्रति काफी नाराजगी है। कांग्रेस पार्टी का मानना है कि केंद्र में जब कांग्रेस की सरकार होती है तो वह डीएमके को सरकार में साझीदार बनाती है, मगर राज्य में डीएमके ऐसा कांग्रेस के साथ नहीं करती है। इसके अलावा कांग्रेस पार्टी का असंतोष और भी बढ़ गया है क्योंकि पार्टी की सीटों की संख्या में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।

एनडीए में बेहतर तालमेल का दावा

दूसरी तरफ एआईएडीएमके की अगुवाई में एनडीए में काफी तालमेल है और सभी पार्टियों के कार्यकर्ता एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं। इस गठबंधन में भाजपा, एआईएडीएमके, एमडीएमके, पट्टाली मक्कल काची, अम्मा मक्कल मुनेत्र कड़गम सहित छोटे-छोटे दल आपस में एक-दूसरे का खुलकर सहयोग कर रहे हैं।

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