'Religion' नहीं 'धर्म' कहिए : संविधान की व्याख्या पर नई बहस, सुप्रीम कोर्ट में उठी बड़ी मांग
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‘Religion’ नहीं ‘धर्म’ कहिए : संविधान की व्याख्या पर नई बहस, सुप्रीम कोर्ट में उठी बड़ी मांग

सुप्रीम कोर्ट में संविधान के हिंदी और अंग्रेजी पाठ को लेकर नई बहस छिड़ी। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अनुच्छेद 394A के तहत हिंदी पाठ को भी प्रामाणिक मानने की दी गई दलील।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Apr 9, 2026, 07:00 pm IST
inभारत, दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली । भारत के सर्वोच्च न्यायालय में सबरीमाला पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान बेहद महत्वपूर्ण बहस छिड़ गई है। धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान की व्याख्या को लेकर यह बहस छिड़ी है। मामले में यह तर्क दिया गया है कि संविधान का हिंदी पाठ केवल अनुवाद नहीं, बल्कि अंग्रेजी पाठ के समान ही प्रामाणिक और निर्णायक है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल की ओर से दाखिल लिखित दलीलों में कहा गया है कि अनुच्छेद 394A के तहत हिंदी में प्रकाशित संविधान को आधिकारिक दर्जा प्राप्त है।

अनुच्छेद 394A : हिंदी पाठ को मिला वैधानिक अधिकार

दलीलों में स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 1987 में किए गए संशोधन के बाद अनुच्छेद 394A जोड़ा गया, जिसके तहत हिंदी में प्रकाशित संविधान और उसके सभी संशोधन “सभी उद्देश्यों के लिए प्रामाणिक” माने जाते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि भारतीय संविधान हिंदी पाठ न्यायिक प्रक्रिया में उतना ही प्रभावी है जितना अंग्रेजी पाठ।

‘Religious Denomination’ बनाम ‘संप्रदाय’ की बहस

मामले का एक प्रमुख पहलू अनुच्छेद 26 में प्रयुक्त “religious denomination” शब्द की व्याख्या है। दलीलों में कहा गया है कि हिंदी पाठ में इसके लिए “संप्रदाय” शब्द का उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ पश्चिमी अवधारणा से कहीं अधिक व्यापक है। तर्क यह दिया गया कि संप्रदाय की परिभाषा केवल एक संगठित समूह तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गुरु-शिष्य परंपरा, आस्था, विचारधारा और सांस्कृतिक पहचान भी शामिल होती है।

स्वदेशी दृष्टिकोण से संविधान की व्याख्या पर जोर

सुप्रीम कोर्ट के हालिया संदर्भों का हवाला देते हुए कहा गया कि संविधान की व्याख्या भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए। इस दृष्टिकोण को स्वदेशी संवैधानिक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो विदेशी कानूनी अवधारणाओं पर निर्भरता को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

‘Morality’ का अर्थ ‘सदाचार’ से जोड़ने की मांग

दलीलों में यह भी कहा गया कि अनुच्छेद 25 और 26 में प्रयुक्त “morality” शब्द का सही अर्थ हिंदी में “सदाचार” है। यह केवल सैद्धांतिक नैतिकता नहीं, बल्कि समाज द्वारा स्वीकृत आचरण, परंपराएं और व्यवहार हैं। इस आधार पर संवैधानिक सदाचार की व्याख्या को भारतीय सामाजिक मूल्यों से जोड़ने की मांग की गई है।

‘Religion’ नहीं, व्यापक अर्थ में ‘धर्म’

दस्तावेज़ में यह भी स्पष्ट किया गया कि संविधान में प्रयुक्त “religion” शब्द का अर्थ भारतीय संदर्भ में “धर्म” है, जो जीवन के हर पहलू—आचरण, कर्तव्य, आध्यात्मिकता—को प्रभावित करता है। इससे धर्म की व्यापक परिभाषा को मान्यता देने की बात कही गई है, जो पश्चिमी सीमित अवधारणा से अलग है।

न्यायिक व्याख्या पर पड़ सकता है दूरगामी प्रभाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस भविष्य में धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों पर गहरा प्रभाव डाल सकती है। खासकर तब, जब अदालत को “संप्रदाय”, “धर्म” और “सदाचार” जैसे शब्दों की व्याख्या करनी होगी। इस पूरे विवाद से यह संकेत मिलता है कि अब संविधान की व्याख्या में भारतीय परंपरा, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों को अधिक महत्व दिया जा सकता है।

भारतीय मूल्यों को प्राथमिकता देने की दिशा में कदम

अगर इस पूरे मामले का सार निकालें तो संविधान की व्याख्या केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसे भारतीय सभ्यता, परंपरा और सामाजिक संरचना के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। संविधान हिंदी बनाम अंग्रेजी की यह बहस आने वाले समय में न्यायिक दृष्टिकोण को नई दिशा दे सकती है।

Topics: Supreme Court constitution debateArticle 394A Hindi constitutionreligious denomination meaning Indiaconstitutional interpretation IndiaHindi vs English constitutionlegal news India todayIndian judiciary news
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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