उत्तराखंड में मलिन बस्तियों का बढ़ता संकट: देहरादून की नदियों पर घुसपैठियों का कब्जा और SIR प्री-मैपिंग की दिक्कतें
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उत्तराखंड में मलिन बस्तियों का बढ़ता संकट: देहरादून की नदियों पर घुसपैठियों का कब्जा और SIR प्री-मैपिंग की दिक्कतें

देहरादून में रिस्पना-बिंदाल नदियों के किनारे अवैध मलिन बस्तियों का विस्तार, NGT के आदेशों की अनदेखी, कांग्रेस की तुष्टिकरण राजनीति और SIR प्री-मैपिंग में लाखों वोटर्स का मिलान न हो पाना। उत्तराखंड में 700 के करीब मलिन बस्तियां अब सिरदर्द बन गई हैं।

Written byउत्तराखंड ब्यूरोउत्तराखंड ब्यूरो — edited by कुलदीप सिंह
Apr 9, 2026, 09:58 am IST
inउत्तराखंड
SIR in Uttarakhand

प्रतीकात्मक तस्वीर

देहरादून: देवभूमि राज्य के गठन के बाद बाहरी राज्यों से आए घुसपैठियों ने नदी नालों को घेर कर सरकारी भूमि अतिक्रमण कर लिया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के सख्त निर्देशों के बावजूद इन बस्तियों को नहीं हटाया जा सका है।

जानकारी के मुताबिक सरकारी भूमि पर इन अवैध कब्जों ने मलिन बस्ती का रूप ले लिया है, ये बस्तियां SIR में सिरदर्द बन गई है और लाखों की संख्या में वोटर्स की प्री मैपिंग नहीं हो पा रही है। जानकारी ये भी कहती है कि इसी फ्लड जोन में सरकारी भूमि हुए अतिक्रमण की एक बड़ी वजह घुसपैठ आबादी से जुड़ी हुई है। SIR प्री मैपिंग अभियान में लाखों मतदाताओं के नामों को लेकर यहां असमंजस्य की स्थिति बनी हुई है। एक जानकारी के मुताबिक यूपी से लगे जिलों में कई लाख मतदाता प्री मैपिंग में नहीं मिल पा रहे हैं।

देहरादून में थीं 75 मलिन बस्तियां

राजधानी देहरादून और जिले की बात की जाए तो राज्य बनने के वक्त यहां जिले में 75 मलिन बस्तियां थी, जिनमें नाम मात्र की आबादी थी, लेकिन 2004 में इनकी संख्या बढ़ कर 102 और 2008 में 129 हो गई। 2016 में ये संख्या 150 तक जा पहुंची और अब ये संख्या 200 के करीब पहुंच गई है। देहरादून के बीच बहने वाली रिस्पना बिंदाल और अन्य बरसाती नदियों के दोनो तरफ कई किमी तक नदी श्रेणी फ्लड जोन की सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे हैं और यहां बसे और बसाए गये लोगों ने नाम वोटर सूची में दर्ज किए हुए थे।
2016 में कांग्रेस सरकार ने इन बस्तियों को नियमित करने की घोषणा कर दी। कांग्रेस के विधायकों ने यहां बाहर से आए लोगों को बसाने और अपना वोट बैंक मजबूत करने की नीयत से ये की घोषणा की थी।

बताया जाता है कि इन बस्तियों को बसाने के लिए जमीयत उलेमा ए हिंद जैसे संगठनों का कांग्रेस ने सहारा लिया था। उत्तराखंड की राजनीति में पिछले विधान सभा चुनावों पर नजर डालें तो तीन बार ऐसा हो चुका है जब बीजेपी और कांग्रेस के वोट प्रतिशत में कुछ खास अंतर नहीं रहता था, सरकार बनाने के लिए 35 सीटों के बहुमत के आसपास दोनों राजनीतिक दल पहुंचते थे। ऐसे में कांग्रेस ने तुष्टिकरण की राजनीति के तहत बाहर से आए लोगों को यहां बसाने और उनकी बस्तियों को रेगुलाइज करने के लिए ये दांव खेला था। इस घोषणा के पूरा होने से पहले ही राज्य में बीजेपी की 2017 में सरकार आ गई और उसने इन बस्तियों के नियमितिकरण पर रोक लगा दी, तब से लेकर अभी तक ये रोक जारी है, लेकिन मलिन बस्तियों का विस्तार होने का क्रम अभी भी जारी है। हालांकि कांग्रेस बार-बार अपनी घोषणा को दोहराती भी है और इस विषय को हाईकोर्ट में भी ले जाने की कोशिश की है।

उत्तराखंड में अवैध मलिन बस्तियों पर नजर

पूरे राज्य की यदि बात करें तो 582 मलिन बस्तियां 2016 में सर्वे में आई थी। जिनमें नगरीय क्षेत्र की 270 बस्तियां नियमित पहले से थी, अब मलिन बस्तियों की संख्या बढ़ कर अब 700 के आसपास बताई जा रही है। राज्य की खनन वाली नदियों और नालों के किनारे बाहर से श्रमिकों की आबादी ने सरकारी भूमि पर कब्जे कर बसावट कर ली है, जिनमें ज्यादातर लोग बिजनौर पीलीभीत सहारनपुर मुजफ्फरनगर यहां तक कि असम बिहार झारखंड आदि राज्यों से है ये तक बताया गया है कि इनमें रोहिंग्या और बंग्लादेशी भी है।

सरकारी जमीन पर बनाए हुए हैं 1.5 लाख से अधिक अवैध घर

2016 में अवैध रूप से 771585 की आबादी ने 153174 मकान सरकारी भूमि पर बनाए हुए है, जिनमें से 37% नदी नालों के किनारे, 10% ने केंद्र सरकार की भूमि पर, 44% ने राज्य सरकार की राजस्व, वन, सिंचाई आदि भूमि पर अवैध रूप से बसावाट की हुई थी। अब आठ साल बाद इनकी संख्या 10 लाख से ज्यादा पहुंच गई बताई गई है। एक अनुमान के मुताबिक, सरकारी भूमि पर कब्जे कर 57% लोगो ने पक्के,29% ने अद्धपक्के और 16 % की झोपड़ियां है जोकि धीरे धीरे अद्धपक्के मकानों में तब्दील हो रही है। नदी श्रेणी फ्लड जोन के भूमि पर अतिक्रमण को लेकर एनजीटी ने राज्य सरकार को बार बार आदेशित किया और जुर्माना भी लगाया है कि उक्त भूमि खाली करवाए ताकि नदियों के प्राकृतिक बहाव में कोई दिक्कत नही आए अन्यथा एक दिन बड़ा नुकसान हो जायेगा।

देहरादून की बिंदाल, रिस्पना, नैनीताल जिले की गौला और कोसी नदियों, हरिद्वार में गंगा, उधम सिंह नगर में गौला, किच्छा आदि नदियों के बारे में एनजीटी के स्पष्ट निर्देश है कि यहां से अतिक्रमण हटाया जाए। किंतु शासन प्रशासन, राजनीतिक दबाव के चलते खामोश हो रहा है। राजनीतिक दलों ने एनजीटी की कारवाई पर अवरोध खड़े किए हुए है, कुछ समय पहले रिस्पना रिवर फ्रंट योजना भी बनाई गई जो कि अब ठंडे बस्ते में है, प्रशासन भी एनजीटी को दिखाने के लिए कुछ अतिक्रमण हटा देता है और फिर चुप्पी साध लेता है। बहरहाल ये मलिन बस्तियां बाहर से आए लोगों के अवैध कब्जों की वजह से भविष्य में परेशानी का सबब बनने जा रही है।

SIR प्री मैपिंग में दिक्कतें

भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा कराए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्री मैपिंग जब उत्तराखंड में हुई तब, इन्हीं मलिन बस्तियों की ज्यादातर मतदाता सूचियों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। SIR में देश में एक ही स्थान पर वोटरसूची में नाम दर्ज होना चाहिए इस प्रक्रिया में बाहरी राज्यों से आए लोगो ने 2003 से पूर्व की जानकारी नहीं दी है। खबर है कि बिहार में हाल ही विधान सभा चुनाव हुए और बड़ी संख्या में वहां वोटर लिस्ट में नाम दर्ज हुए अब जब वहां दर्ज हुए तो यहां नाम कैसे दर्ज कराए जाते? इस लिए SIR की प्री मैपिंग में बड़ी संख्या में नामों का मिलान नहीं हो पा रहा है। ये भी पता चला है कि यहां घुसपैठियों ने अपने मूल निवास राज्य पर ही वोटर लिस्ट में अपने नाम दर्ज करवाए हैं।

निर्वाचन आयोग ने एक ऐप भी जारी किया है जहां एक बार नाम दर्ज हुआ है और दूसरे राज्य में नाम वोटरलिस्ट में दर्ज हो रहा है तो सो ऐप तुरंत डबलिंग पकड़ ले रहा है। जानकारी के अनुसार एक विषय भी सामने आया है कि भविष्य में सभी चुनावों के लिए एक ही मतदाता सूची बनाई जाएगी  इसलिए बाहरी क्षेत्रों से आए लोग अपने मूल राज्य या गांव की तरफ ही वोटर लिस्ट में नाम दर्ज करवा रहे है। उनके द्वारा ये सोच भी काम कर रही कि उनके मूल निवास क्षेत्र में स्थान निकाय या अन्य चुनाव में परिवार के वोट की अहम भूमिका मानी जाती है।

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