योगी का गौ संरक्षण मॉडल : भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम और सर्वाधिक समृद्ध संस्कृतियों में से एक है, जिसका मूल दर्शन ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ईशावास्यमिदं सर्वं के शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित है। यह वह अद्वितीय दर्शन है जिसने सृष्टि को एक जीवंत और परस्पर संबद्ध इकाई के रूप में स्वीकार किया है, जहाँ मानव, प्रकृति और समस्त जीवजगत एक दूसरे के पूरक हैं, प्रतिस्पर्धी नहीं। इसी समग्र दृष्टिकोण के कारण भारतीय परंपरा में प्रकृति के प्रत्येक तत्व को आदर और संरक्षण का विषय माना गया है। नदियों को मातृरूप में, वृक्षों को देवत्व के रूप में और पृथ्वी को धारण करने वाली शक्ति के रूप में पूजने की परंपरा इसी जीवनदृष्टि का परिणाम है।
इसी व्यापक सांस्कृतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में गौ का स्थान भी अत्यंत विशिष्ट है। भारतीय संस्कृति की प्रतीकस्वरूपा गाय की महिमा वेदों से लेकर समस्त धार्मिक ग्रंथों में गाई गई है। विशेषतः अथर्ववेद में गौ की महिमा का विस्तृत वर्णन ‘गो सूक्त’ में मिलता है। महाभारत में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को गौ माहात्म्य सुनाते हुए कहते हैं, ‘मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदा’, अर्थात् गौ सभी प्राणियों की माता है और समस्त सुखों को प्रदान करने वाली है। इसी भाव को वेदों में ‘गावो विश्वस्य मातरः’ के रूप में व्यक्त किया गया है, जो गौ को सम्पूर्ण विश्व की माता के रूप में स्थापित करता है।
आध्यात्मिक उन्नति का साधन है गौ सेवा
सनातन परंपरा में गौ सेवा को आध्यात्मिक उन्नति का साधन माना गया है। गौ सेवा के प्रभाव से ही गौतम ऋषि न्यायशास्त्र के प्रवर्तक बने, महर्षि जमदग्नि को परशुराम जैसे तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई और महर्षि वशिष्ठ को अष्टसिद्धियों की उपलब्धि हुई। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन तो गौ सेवा से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है, इसी कारण वे गोपाल कहलाए। उनकी एकमात्र आकांक्षा यही थी कि, ‘गावों मे अग्रतः सन्तु, गावो मे सन्तु पृष्ठतः, गावो मे सर्वतः सन्तु, गवां मध्ये वसाम्यहम्।’ अर्थात् गाय मेरे आगे रहें, गाय मेरे पीछे रहें, गाय मेरे हृदय में रहें और मैं सदा गायों के बीच निवास करूँ।
गौर संरक्षण पर क्या कहता है संविधान
गाय के इन्हीं सांस्कृतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व को देखते हुए, हमारे संविधान निर्माताओं ने भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद 48 में स्पष्ट रूप से राज्य को निर्देशित किया है कि वह गायों और बछड़ों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए आवश्यक कदम उठाए तथा उनके वध का प्रतिषेध करे। अतः गौ संरक्षण का प्रश्न केवल एक प्राणी की रक्षा का विषय नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-मूल्य और सांस्कृतिक चेतना के व्यापक विमर्श से जुड़ा है। इतिहास के पन्नों में महाराजा दिलीप और नंदिनी का प्रसंग सत्ता की सार्थकता का बोध कराता है। इक्ष्वाकु वंशी सम्राट दिलीप ने गौ-रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने का निर्णय लिया था, जो यह सिद्ध करता है कि भारतीय राजधर्म की गौरवशाली परंपरा में सत्ता की सार्थकता सिंहासन के उपभोग में नहीं, बल्कि गौ-वंश की रक्षा, लोक-संवेदना, लोक-कल्याण और राष्ट्र के सनातन सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति स्वयं को समर्पित कर देने में है।
किंतु दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता के पश्चात, दशकों तक देश और प्रदेशों की अभारतीय मानस वाली सरकारों ने इस ‘दिलीप मॉडल’ को पूरी तरह विस्मृत कर दिया। काँग्रेस, समाजवादी आदि पार्टियों की सरकारें न केवल गोवंश के प्रति असंवेदनशील थीं, बल्कि उनकी नीतियां परोक्ष रूप से गो-हत्या और तस्करी को ‘मौन वैधानिक संरक्षण’ प्रदान करती रहीं। तुष्टीकरण की राजनीति और सांस्कृतिक विस्मृति के उस दौर में, गो-तस्करी एक संगठित ‘सिंडिकेट’ के रूप में फल-फूल रही थी। हजारों अवैध बूचड़खाने इस बात का प्रमाण थे कि शासन की प्राथमिकता में संवैधानिक और सनातन मूल्य कहीं नहीं थे। उस कालखंड में कसाइयों का दुस्साहस और गायों की बेबसी एक अत्यंत भयावह चित्र प्रस्तुत कर रही थी।
पहले गौ वध शाला था उत्तर प्रदेश
2017 से पूर्व का उत्तर प्रदेश गोवंश के लिए एक वधशाला बन चुका था। प्रदेश के विभिन्न जनपदों में हजारों की संख्या में अवैध बूचड़खाने संचालित थे। विडंबना यह थी कि कानून की नाक के नीचे ये इकाइयां फल-फूल रही थीं। आए दिन राजमार्गों पर ट्रकों में क्रूरतापूर्वक भरकर गोवंश को वध हेतु ले जाने की खबरें आम बात थीं। उत्तर प्रदेश में तस्कर इतने दुस्साहसी थे कि वे पुलिस और स्थानीय नागरिकों पर हमला करने से भी नहीं हिचकते थे। तत्कालीन सरकारों के पास निराश्रित गोवंश के प्रबंधन का कोई ठोस विजन नहीं था। गोशालाएं केवल कागजों पर या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी हुई थीं। यह कालखंड उत्तर प्रदेश के इतिहास में सांस्कृतिक और प्रशासनिक पराजय का एक काला अध्याय था।
वर्ष 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता का परिवर्तन प्रदेश में सनातन संस्कृति के पुनरुद्धार का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आते ही प्रदेश में गो-संरक्षण के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई गई। सरकार के गठन होते ही प्रदेश भर में संचालित अवैध बूचड़खानों पर कड़ी कार्रवाई शुरू हुई जो आज भी लगातार जारी है। दशकों से कानून की धज्जियां उड़ा रहे इन केंद्रों को बंद कर सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया कि गोवंश के साथ क्रूरता अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। वेदों का वह स्पष्ट निर्देश कि गाय ‘अघ्न्या’ है और ‘गौ का वध करने वाले को कठोरतम दंड या मृत्युदंड मिलना चाहिए’, आज उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था में एक प्रेरणा पुंज की तरह झलकता है।
गोकशी रोकने के लिए उठाए गए कदम
योगी सरकार ने गोकशी को पूरी तरह से रोकने के लिए वर्ष 2020 में गोवध निवारण कानून में संशोधन किया और अध्यादेश जारी किया, जिसमे गो-वध के दोषियों के लिए 10 वर्ष तक के कठोर कारावास और 5 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। आज, गो-तस्करी और गो-वध के आरोपियों के विरुद्ध गैंगस्टर एक्ट, गुंडा एक्ट और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है। उनकी अवैध संपत्तियों को कुर्क करने जैसे कड़े कदम उठाए जा रहे है। इसके तहत अब तक प्रदेश भर में गोकशी के 14,182 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 35,924 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। योगी सरकार अपराधियों पर आर्थिक स्तर पर प्रहार करते हुए लगभग 83 करोड़ 32 लाख रुपये की संपत्ति भी जब्त की है। विगत कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए है जहाँ ‘भय का केंद्र’ बदल गया है। एक समय था जब कसाई को देखकर गायें डरा करती थी, किंतु आज गाय को देखकर कसाई डरते हैं। यह परिवर्तन ‘विधि के शासन’ और ‘दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति’ से उपजा है। आज उत्तर प्रदेश का वर्तमान नेतृत्व उसी ‘दिलीप मॉडल’ का अनुसरण कर रहा है, जहाँ शासन की पूरी शक्ति और मशीनरी गौ-वंश को अभयदान देने में जुटी है।
गौ संरक्षण के लिए असली चुनौती क्या
गोवंश को केवल वध से बचाना ही पर्याप्त नहीं होता, असली चुनौती उनके सुरक्षित आश्रय, उचित पोषण, रखरखाव आदि की होती है। इसके लिए, योगी आदित्यनाथ ने ‘उत्तर प्रदेश गोशाला अधिनियम’ के माध्यम से निजी और सरकारी गोशालाओं के लिए कड़े मानक तय किए। निराश्रित गोवंश के प्रबंधन हेतु योगी सरकार ने प्रदेश भर में 7,716 स्थानों पर गो-संरक्षण का एक विशाल ढांचा खड़ा किया, जिसमें वर्तमान में लगभग 12,58,000 गोवंश पूरी तरह सुरक्षित हैं। इस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए 5,446 गो-आश्रय स्थलों को सीधे सीसीटीवी निगरानी से जोड़ा गया है। वर्तमान में 7,592 से अधिक कैमरों के माध्यम से राज्य के 56 जनपदों में स्थापित ‘कमांड एवं कंट्रोल रूम’ से गोवंश के खान-पान, स्वास्थ्य, स्वच्छता और सुरक्षा की चौबीसों घंटे रियल-टाइम मॉनिटरिंग की जा रही है।
सामाजिक सहभागिता से जोड़ा जा रहा गौ संरक्षण
उत्तर प्रदेश में गौसंरक्षण को सामाजिक सहभागिता से भी जोड़ा जा रहा है। योगी सरकार ‘मुख्यमंत्री निराश्रित/बेसहारा गोवंश सहभागिता योजना’ संचालित कर रही है, जिसके अंतर्गत निराश्रित गोवंश को आश्रय देने के लिए पशुपालक को प्रति माह प्रति गाय ₹1,500 का अनुदान दिया जा रहा है। इस व्यवस्था से पशुपालक भी दुग्ध उत्पादकता के माध्यम से आर्थिक रूप से सशक्त हो रहे हैं।
योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में गोसंरक्षण की अवधारणा अब एक आर्थिक मॉडल के रूप में विकसित हो रही है। गोशालाओं को उत्पादन, नवाचार और ग्रामीण विकास के केंद्र के रूप में स्थापित किया जा रहा है, जिसका आधार ‘पंचगव्य वैल्यू चेन’ (दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर) है। इसके माध्यम से 100 से अधिक ऑर्गेनिक उत्पादों का एक विशाल बाजार तैयार किया जा रहा है। इस मॉडल में ‘वेस्ट टू वेल्थ’ की अवधारणा को व्यवहार में उतारा गया है, जहां गोबर और गोमूत्र से बायोगैस, बायो-सीएनजी, जैविक खाद और अन्य उपयोगी उत्पाद बनाए जा रहे हैं। जालौन में स्थापित हो रहे बायोगैस प्लांट इस दिशा में एक पायलट प्रयोग हैं, जहां से प्राप्त अनुभव पूरे प्रदेश में लागू किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में उत्पादन, ब्रांडिंग और विपणन तक की समग्र व्यवस्था विकसित की जा रही है। योगी सरकार का विजन गोशालाओं को आत्मनिर्भर बनाकर उन्हे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के ‘इंडस्ट्रियल हब’ के रूप में विकसित करना है।
गो वंश को पर्यटन से जोड़ने की कोशिश
सरकार गो-वंश संरक्षण को पर्यटन से जोड़ने का भी उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। इसका सजीव उदाहरण झांसी नगर निगम के बिजौली स्थित कान्हा उपवन गौवंश आश्रय स्थल है जिसे ‘गौ-पर्यटन केंद्र’ के रूप में विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य है कि स्कूली छात्र एवं पर्यटक यहां आकर संरक्षित गौवंशों के साथ-साथ गौ-आधारित प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं कृषि व्यवस्था के जीवंत स्वरूप को प्रत्यक्ष देख सकें। इस केंद्र में वैदिक कालीन गौ-आधारित परिवेश को सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया है। यहां आने वाले पर्यटकों और विद्यार्थियों को बैलगाड़ी की सवारी के माध्यम से गौ-परिक्रमा पथ पर कोल्हू, कुएं से पानी निकालने वाला रहट तथा खेतों में जुताई के लिए बैलों के उपयोग जैसे पारंपरिक कार्यों का सजीव प्रदर्शन भी कराया जाता है।
योगी सरकार गो-वंश संरक्षण को सीधे कृषि से जोड़ते हुए ‘गो आधारित प्राकृतिक खेती मिशन’ के अंतर्गत प्रदेश के लगभग 94,000 हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती को बढ़ावा दे रही है। यह पहल किसानों की लागत कम करने और उत्पादकता में वृद्धि लाने में सहायक है। इस प्रकार, गोशालाएं अब कृषि, ऊर्जा, उद्योग, पर्यटन आदि क्षेत्रों को जोड़ने वाली केंद्रीय कड़ी बनती जा रही हैं।
क्या कहती है आर्थिक दृष्टि
आर्थिक दृष्टि से यह मॉडल आने वाले समय में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पूंजी प्रवाह को बढ़ाएगा, रोजगार सृजन करेगा, ग्रामीण पलायन को रोकेगा और सकल घरेलू उत्पाद में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा। योगी आदित्यनाथ ने यह कर दिखाया है कि आज गोवंश न केवल संरक्षित है, बल्कि राज्य की ‘ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी’ के लक्ष्य का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी बन चुका है। आज उत्तर प्रदेश निस्संदेह भारत का सबसे सुरक्षित ‘गो-संरक्षण मॉडल स्टेट’ बन गया है, जहाँ तकनीक और परंपरा का संगम एक नई ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव रख रहा है।
गौ-संरक्षण हेतु प्रशासनिक स्तर पर लागू की गई ये दूरदर्शी आर्थिक नीतियां और धरातल पर क्रियान्वित हो रहे ये ‘हाई-टेक’ मॉडल उस गहन आत्मिक संकल्प की परिणति हैं, जो उत्तर प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर विराजमान एक ‘योगी’ के हृदय में गौ-वंश के प्रति रचा-बसा है। हम सभी ने उन अविस्मरणीय और हृदयस्पर्शी दृश्यों को बार-बार देखा है, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी व्यस्ततम राजकीय दिनचर्या के मध्य भी गो-वंश के बीच होते हैं। जहाँ वे गौ-माताओं को उनके नाम से पुकारते हैं, उन्हें गुड़-रोटी खिलाते है, उनकी पीठ सहलाते और उनकी सेवा करते है। उनके लिए यह न तो राजकीय दायित्व है, न तो संवैधानिक बाध्यता और न ही प्रशासनिक औपचारिकता , यह उस कालातीत परंपरा का आधुनिक दर्शन कराता है, जिसे सदियों से भारतीय मनीषियों ने संजोया है। उन्हे यह बोध है कि गाय, गंगा, गीता और गायत्री ये सभी भारतीय संस्कृति के सुदृढ़ स्तंभ है। इनको सबल रूप में पाकर ही हमारी यह उदार एवं उदात्त सनातन सांस्कृतिक परंपरा विश्व में अपना विशिष्ट एवं श्रेष्ठ स्थान बनाए हुए है।
गो-संरक्षण मॉडल वैश्विक स्तर पर सफलता की गाथा लिख रहा
आज जब उत्तर प्रदेश का गो-संरक्षण मॉडल वैश्विक स्तर पर अपनी सफलता की गाथा लिख रहा है, तब कुछ लोग व्यक्तिगत कुंठा या राजनैतिक विद्वेष से वशीभूत होकर निराधार आरोप लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में गाय असुरक्षित है। धर्म की ओट में दिए जा रहे ऐसे वक्तव्य वस्तुतः धरातल की वास्तविकता से कोसों दूर हैं। योगी सरकार के इन नौ वर्षों के भगीरथ पुरुषार्थ ने यह सिद्ध कर दिया है कि भारत में यदि आज गौ-माता सर्वाधिक निर्भय और सुरक्षित है, तो वह केवल उत्तर प्रदेश की पावन धरा पर है। सत्य की वेदी पर यह अकाट्य तथ्य अंकित है कि ऐसे आरोप लगाने वाले तत्व आज स्वयं उपहास के पात्र बनकर रह गए हैं। उनकी बातों को न तो देश की प्रबुद्ध जनता गंभीरता से लेती है और न ही उत्तर प्रदेश का वह किसान, जिसकी फसल और श्रद्धा दोनों को योगी सरकार ने सुरक्षा प्रदान की है। यह उत्तर प्रदेश का वह स्वर्णिम काल है, जहाँ गौ-माता की अप्रमेय महिमा और हमारी संस्कृति के प्राण-तत्व पुनः ‘वैदिक आलोक’ में प्रतिष्ठित हो रहे हैं। गो-वंश आज अपने उसी प्राचीन गौरव को पुनः प्राप्त कर रहा है, जो कभी ऋषियों के तपोवन और आर्यावर्त की समृद्धि का मूलाधार हुआ करते थे। यह उसी सनातन चेतना का पुनर्जागरण है, जिसमें न केवल उत्तर प्रदेश, अपितु संपूर्ण राष्ट्र और विश्व का कल्याण निहित है।











