वैश्वीकरण के दौर में ब्रिटिश स्कूल्स क्यों अपनाने लगे इस्लामी मूल्य?
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वैश्वीकरण के दौर में ब्रिटिश स्कूल्स क्यों अपनाने लगे इस्लामी मूल्य?

टेलीग्राफ की रिपोर्ट: ब्रिटेन के टॉप स्कूल्स जैसे हैरो UAE में मुस्लिम छात्रों को पत्नी को 'हल्के से पीटने' का तरीका सिखा रहे हैं। कुरान आधारित किताबें, विवादास्पद इस्लामी शिक्षा और ब्रिटिश मूल्यों का समझौता – पूरी डिटेल पढ़ें।

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा — edited by कुलदीप सिंह
Apr 6, 2026, 11:19 am IST
inविश्व
British School UAE

प्रतीकात्मक तस्वीर

यह वैश्वीकरण का दौर है और हर देश की शैक्षणिक संस्थाएं दूसरे देशों में अपने विस्तार के लिए जा रही हैं। उनका उद्देश्य होता है कि वे अपने आप को उस नए माहौल में स्थापित करें। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या जो शैक्षणिक संस्थाएं दूसरे देश में जा रही हैं, वे किन मूल्यों को पढ़ाएंगी? क्योंकि हर देश के नैतिक, सामाजिक, पंथिक मूल्य अलग अलग होते हैं। क्या वे उन मूल्यों को पढ़ाएंगी जो उस देश के हैं, जहां वे गई हैं, या फिर उन मूल्यों को जो उन्होनें अपने देश में देखें? यह प्रश्न इसलिए उठ खड़ा हुआ है क्योंकि ब्रिटेन के शीर्ष स्कूल्स जब मिडल ईस्ट अर्थात मध्य एशिया में गए तो उन्हें कुछ ऐसा भी पढ़ाना पड़ रहा है जो काफी आपत्तिजनक है।

चौंकाने वाले आंकड़े

टेलीग्राफ ने कई महीनों की छानबीन के बाद बहुत ही चौंकाने वाले तथ्य अपनी रिपोर्ट में प्रस्तुत किये हैं। ब्रिटेन के कई स्कूल्स जिनमें हैरो स्कूल भी शामिल है, वह मिडल ईस्ट में अपना विस्तार कर चुका है और उनमें ब्रिटिश मूल्यों के स्थान पर अब मुस्लिम स्टूडेंट्स के लिए कुरान भी उपलब्ध होगा और साथ ही यह भी बताया जाएगा कि कैसे बात न मानने वाली बीवी को शी किया जाए। टेलीग्राफ ने 2 अप्रैल को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में कुछ ऐसी किताबों के उन अंशों को प्रकाशित किया है, जिनमें यह बताया गया है कि अगर बीवी बात न माने तो शौहर को क्या करना चाहिए। अपनी बीवी को कितना मारना चाहिए और कैसे मारना चाहिए।

बीवियों को पीटने की शिक्षा इस्लाम में

इसके शीर्षक में शामिल है कि ऐसी बीवियों को पहले तो अच्छी सलाह दी जानी चाहिए, फिर उसके बाद भी नहीं माने तो एक बिस्तर पर नहीं लेटना चाहिए और फिर भी न माने तो हल्के से पीटना चाहिए। यह किताब इन बच्चों को बताती है कि बीवियों को सुधारने के लिए अंतिम उपाय उन्हें पीटना है।

इसके अनुसार इसमें लिखा है कि “इसका मकसद शादीशुदा ज़िंदगी को टूटने से बचाना और आपसी साथ तथा सामाजिक नजदीकी को बनाए रखना है। शौहर को अपनी बीवी को कोड़े या छड़ी से, या उसके चेहरे पर मारने की अनुमति नहीं है। उसे इसके लिए सिवाक (दांत साफ करने वाली एक छोटी टहनी) या किसी हल्के रूमाल का उपयोग करना चाहिए।“

केवल मुस्लिम स्टूडेंट्स के लिए हैं ये किताबें

यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक हिय कि ये किताबें और पाठ केवल और केवल मुस्लिम स्टूडेंट्स के लिए ही हैं। हालांकि गैर मुस्लिम बच्चों के लिए यूएई सरकार द्वारा निर्धारित नैतिक शिक्षा की किताबें जरूरी हैं। मुस्लिम बच्चों के लिए ये नैतिक शिक्षाएं नहीं हैं। अभिभावकों को अपने बच्चों को स्कूल में भर्ती कराते समय बच्चों की नागरिकता और धर्म की जानकारी देना अनिवार्य है।

बीवियों को पीटने के साथ ही उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि कैसे पीटने वाले शौहर के साथ मामला आपसी सहमति के साथ निपटा देना है। टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार इसमें यह भी प्रश्न एक जगह पूछा गया है कि यह बताया जाए कि क्यों इस्लाम में केवल आदमियों को यह हक दिया गया है कि वह अपनी बीवी को तलाक दे सके? और एक विकल्प यह भी दिया है कि “क्योंकि वह अधिक सब्र वाला और सहनशील होता है।“

इस सबक के अंत में जाकर इन स्टूडेंट्स को “सामाजिक और शादीशुदा रिश्तों में टकराव के कारणों और उनसे बचने के तरीकों” की एक सूची दी गई है, जिसमें “कुछ बीवियों द्वारा की जाने वाली तनावपूर्ण और बोझिल माँगें” और “पति की कंजूसी तथा पत्नी का साथ देने और उस पर खर्च करने से उसका इनकार” शामिल हैं।

इसमें एक तस्वीर भी टेलीग्राफ के अनुसार दी गई है। जिसमें एक हिजाब पहने हुए महिला दिखाई गई है। और उसमें लिखा है कि “मैं अपने मुल्क द्वारा महिलाओ की स्थिति को सशक्त करने, शिक्षित करने और प्रोत्साहित करने के प्रयासों की तारीफ करता/करती हूँ।“

इस खुलासे के बाद अब इस पर हंगामा हो रहा है। जीबीन्यूज पर इस खुलासे पर बात करते हुए राजनीतिक टिप्पणीकार खदिजा ब्राउन ने कहा कि वह इस खुलासे से सन्न हैं। उन्होंने कहा कि जो भी कुछ पढ़ाया जा रहा है, वह एक ब्रिटिश स्कूल द्वारा पढ़ाया जा रहा है और इससे कोई अंतर ही नहीं पड़ता कि किस पंथ के लोग क्या पढ़ रहे हैं?

कुरान में महिलाओं को पीटने वाली आयत मौजूद

उन्होंने आगे कहा कि अंत में यह सब कुछ यूके में वापस आएगी ही कि यह ब्रिटिश मानक हैं। उन्होंने कहा कि “यह देश—यूनाइटेड किंगडम—जो मैग्ना कार्टा, समानता और महिलाओं के मताधिकार आंदोलन (Suffragettes) का देश है, अब यह सिखा रहा है कि किसी महिला को कैसे पीटा जाए। देखिए, मुझे इस बात से कोई शर्मिंदगी नहीं है और न ही मैं इस तथ्य से पीछे हटती हूँ कि कुरान में एक ऐसी ही आयत मौजूद है।”

उन्होंने आगे कहा कि “लेकिन इस आयत पर दशकों से चर्चा होती आ रही है। और इसे इसके संदर्भ से अलग करके देखा गया है। इसके अलावा भी कई ऐसी आयतें हैं जो प्रेम, स्नेह और दया-भाव सिखाती हैं।“

इस्लामिस्ट महिलाओं को पीटने की दे रहे शिक्षा

उन्होंने कहा कि इस्लामिस्ट्स संदर्भ से हटकर इन आयतों को क्यों पढ़ाते हैं और वह भी यह कि कैसे महिलाओं को पीटा जाए? और उन्होंने यह भी कहा कि उन महिलाओं के विषय में सोचा जाए जो अपने मुल्क से ऐसे ही लोगों के कारण पश्चिमी देशों में शरण लेने आई हैं और अब उनके सामने यह सब आ रहा है। उन्होनें इसे दिल तोड़ने वाला बताया। उन्होनें कहा कि ब्रिटिश संस्कृति और ब्रिटिश जीवन मूल्यों को जिंदा रखना चाहिए। टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार मिडल ईस्ट में यूके के कई स्कूल अपने परिसर खोल रहे हैं और वहाँ पर काम आरंभ कर रहे हैं। यूएई में रहने वाले ब्रिटिश प्रवासी छात्रों को अब हर दिन राष्ट्रगान गाना होगा, जबकि वहाँ पर विदेशी नेताओं की तस्वीरें लगाना प्रतिबंधित है। स्कूल की दीवारों पर केवल सत्ताधारी अमीराती शासकों के आधिकारिक चित्र ही लगाए जा सकते हैं — और लगाए जाने अनिवार्य भी हैं।

और इसके परिणामस्वरूप यूएई में ब्रिटेन के हर स्कूल के प्रवेश हाल में देश के संस्थापक पिता, दिवंगत शेख ज़ायेद बिन सुल्तान अल नाहयान, और उनके 30 बच्चों में से एक, शेख मोहम्मद बिन ज़ायेद अल नाहयान के फ़्रेम किए हुए चित्र लगे हैं। ये चित्र कक्षाओं, स्टाफ़ रूम और गलियारों की दीवारों पर भी लगे हैं, जिनके साथ राष्ट्रगान के बोल भी छपे हुए हैं। व्हाइटबोर्ड पर भी यूएई के झंडे हैं।

इस रिपोर्ट के बाद एक बार फिर से सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है कि क्या ब्रिटिश स्कूल भी अब उन मूल्यों से पीछा छुड़ा रहे हैं, जिन मूल्यों के कारण उनका नाम हुआ, उन्हें ख्याति मिली? तो फिर यह भी कहा जा रहा है कि यह हर शैक्षणिक संस्थान का कर्तव्य है कि वे जहां जा रहे हैं, वहाँ के मूल्यों का पालन करें।

Topics: इस्लामिक कट्टरपंथइस्लामिक शिक्षा
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