अल्मोड़ा: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी समारोह में क्षेत्र सह प्रचार प्रमुख तपन जी ने संघ की सौ वर्ष की यात्रा पर आयोजित जन गोष्ठी में कहा कि जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा, तब यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि विश्व इतिहास की एक निर्णायक घड़ी थी।
उस समय यह कहा गया, “विश्व इतिहास में इस दिन को उस दिन के रूप में याद किया जाएगा, जब अंग्रेज़ों ने आखिरकार भारत छोड़ दिया।” लेकिन प्रश्न यह उठता है कि यदि भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ, तो अंग्रेजों का प्रमुख अखबार गार्जियन ऐसा क्यों लिख रहा था? इसका कारण केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं था, बल्कि एक गहरी ऐतिहासिक प्रक्रिया की शुरुआत थी—“colonization of mind” का अंत। भारत केवल राजनीतिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो रहा था, बल्कि वह मानसिक, सांस्कृतिक और वैचारिक स्तर पर भी स्वतंत्र होने की दिशा में अग्रसर था। यह एक decolonization की प्रक्रिया थी, जिसके साथ-साथ reculturization—अर्थात् अपनी मूल संस्कृति, परंपरा और “स्व” की पुनर्स्थापना—भी प्रारंभ हो रही थी।
हेडगेवार ने स्वाभिमानी भारत का देखा था सपना
यह दृष्टि कोई आकस्मिक विचार नहीं था। इसे लगभग एक शताब्दी पूर्व डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने देखा था—एक ऐसा भारत, जो अपने स्वाभिमान के साथ खड़ा हो, और जिसका समाज अपने मूल स्वरूप को पहचान कर आत्मविश्वास से आगे बढ़े।
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संघ की तपस्या और संघर्ष की गाथा
इस लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग अत्यंत कठिन था। उन्होंने कहा संघ के प्रारंभिक कार्यकर्ताओं के पास न संसाधन थे, न सुविधाएँ, उस युग की तपस्या और समर्पण का प्रतीक है। आज जो वैभव दिखाई देता है, वह उन्हीं त्याग और संघर्षों का परिणाम है।1940 के दशक में जब माधव सदाशिव गोलवलकर (गुरुजी) सरसंघचालक बने, उन्होंने देशभर का व्यापक प्रवास किया और समाज को चेताया कि देश विभाजन की ओर बढ़ रहा है। लेकिन उस समय बहुत कम लोग इस संभावना को स्वीकार करने को तैयार थे। जब 1947 में विभाजन हुआ, तो—लाखों लोग बेघर हुए, असंख्य लोगों की जान गई। महिलाओं पर अत्याचार हुए। उस समय संघ को स्पष्ट निर्देश दिया गया—
श्री तपन ने कहा “जब तक एक भी हिन्दू वहाँ है, तब तक उस स्थान को छोड़कर मत आना।”स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लेकिन अंतिम व्यक्ति तक को सुरक्षित निकालने का प्रयास किया।
संघ से कुछ पार्टियां असहज
माताओं और बहनों की रक्षा के लिए अद्वितीय साहस और बलिदान के उदाहरण सामने आए। संघ की बढ़ती लोकप्रियता ने कुछ राजनीतिक शक्तियों को असहज कर दिया।गांधी जी की हत्या का झूठा आरोप संघ पर लगाया गया। उन्होंने कहा कि संघ का कार्य केवल संगठन तक सीमित नहीं रहा। उसका उद्देश्य था— भारत के “स्व” के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण।इसलिए विभिन्न क्षेत्रों में अनेक संगठन खड़े किए गए—अधिवक्ता परिषद (विधि क्षेत्र), विश्व हिंदू परिषद (धार्मिक-सांस्कृतिक क्षेत्र), भारतीय मजदूर संघ (श्रम क्षेत्र), भारतीय किसान संघ (कृषि क्षेत्र)राष्ट्रीय दृष्टिकोण का परिवर्तन, 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय, जब कुछ यूनियन “चाहे जो मजबूरी हो, मांग हमारी पूरी हो” जैसे नारे लगा रही थीं, तब भारतीय मजदूर संघ ने एक नई दिशा दी—“देश के हित में करेंगे काम, काम का लेंगे पूरा दाम।”
कर्तव्यों की बात
यह दृष्टिकोण केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि कर्तव्यों की भी बात करता है। राम जन्मभूमि आंदोलन को केवल एक मंदिर निर्माण तक सीमित नहीं देखा जा सकता। यह वास्तव में भारत के स्वत्व और स्वाभिमान के जागरण का आंदोलन था। श्री तपन ने कहा राम मंदिर एक प्रतीक बना, एक ऐसे समाज के जागरण का, जो अपनी पहचान को पुनः स्थापित करना चाहता है। संघ की सौ वर्षों की यात्रा ने समाज में यह विश्वास उत्पन्न किया है— “हम भी विश्व में अपना स्थान प्राप्त कर सकते हैं।”
विश्व को दिशा दिखा सकता है भारत
भारत अब केवल अनुसरण करने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि, विश्व को दिशा देने वाला राष्ट्र बनने की क्षमता रखता है। इसके लिए आवश्यक है। अपने “स्व” की पहचान, समाज में समरसता, संस्कारों का पुनर्जागरण, और स्वाभिमान का जागरण करता है। वे कहते हैं कि जब समाज अपने मूल स्वरूप को पहचान लेता है, तो राष्ट्र स्वयं सशक्त होकर विश्व में अग्रणी बन जाता है।
कार्यक्रम में प्रमुख रूप से विभिन्न श्रेणियों के प्रमुख जन एवं संघ के स्वयंसेवक सहित जिला संघ चालक किशन गुरुरानी, नगर संघ चालक लक्ष्मण सिंह भोज, विभाग प्रचारक कमल, जिला प्रचारक वीरेंद्र, तथा जिला कार्यवाह जगदीश की गरिमामयी उपस्थिति रही। कार्यक्रम का संचालन जिला संपर्क प्रमुख सुरेश कांडपाल द्वारा कुशलतापूर्वक किया गया।
अंत में तपन जी ने श्रोताओं के साथ सीधे संवाद कर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया। कार्यक्रम का समापन वंदे मातरम् के साथ हुआ।

















