केरल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी नीत एनडीए स्थानीय निकाय चुनाव में शानदार प्रदर्शन के आधार पर बड़ा राजनीतिक आग़ाज़ करने की ओर अग्रसर है। भाजपा वर्तमान विधासभा चुनाव में राज्य में 1982 से केरल में स्थापित माकपा नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और कांग्रेस पार्टी नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के द्विपक्षीय राजनीति को तोड़कर एक नया राजनीतिक समीकरण देने के लिए पृष्ठभूमि तैयार कर लिया है। भाजपा ने स्थानीय निकाय चुनाव से पूर्व लोकसभा चुनाव 2024 में केरल की द्विपक्षीय राजनीति में अपनी ताकत का एहसास करवाया था, जब पार्टी ने त्रिस्सूर लोकसभा सीट जीतने के साथ ही तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट महज 16 हज़ार मतों से हारी थी। विदित हो कि भाजपा ने गुजरात में अहमदाबाद नगर निगम और कर्नाटक में शिमोगा नगर निगम चुनावों में जीत दर्ज़ करके ही इन राज्यों में अपना परचम लहराया था।
भाजपा के राजनीतिक उभार से परेशान वामपंथी गठबंधन
केरल में भाजपा के इस उभार से दोनों गठबंधन काफी पेशोपेश में है। एलडीएफ नीत वाम दलों को डर है कि त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल की तर्ज़ पर भाजपा उसको राजनितिक हाशिये पर पहुंचाने की ओर बढ़ती दिख रही है। वहीं कांग्रेस पार्टी अपने परे देश में विलुप्त होते जनाधार से काफी चिंतित है और उसे डर है कि पूरे देश की तरह भाजपा इस राज्य में भी उसका जनाधार समाप्त कर अपने में मिला लेगी।
राज्य की जनता एलडीएफ और यूडीएफ के सरकारों से परेशान है। केरल की जनता 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को हराकर यह स्पष्ट कर चुकी है कि राज्य की सत्ता के लिए कांग्रेस पार्टी अब उपयुक्त नहीं रह गई है। 1982 के बाद लगातार सात बार 2016 तक चुनाव दर चुनाव केरल में सत्ता एलडीएफ और यूडीएफ के बीच हस्तांतरण होने की परम्परा थी। मगर, 2021 में पहली बार एलडीएफ ने यूडीएफ को करारी शिकस्त देकर दोबारा सत्ता में वापसी की थी। इतना ही नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी की 2021 में सीटें 2016 से भी कम हो गई थी। अतएव अब कांग्रेस पार्टी नीत यूडीएफ का राज्य की राजनीति में कोई भविष्य नहीं बचा है।
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केरल की जनता के सामने खुल चुकी कांग्रेस-UDF गठबंधन की पोल
केरल की आम जनता राज्य के मुख्यमंत्री पी. विजयन और कांग्रेस पार्टी की सुप्रीमो सोनिया गांधी के बीच हुई गुप्त राजनीतिक समझौते को समझ चुकी है और अब भाजपा नीत एनडीए को समर्थन करने का मन बना चुकी है। इन दोनों के बीच हुए गुप्त समझौते के तहत कांग्रेस पार्टी राज्य में पी विजयन के नेतृत्व वाले एलडीएफ को सत्ता में रहने में मदद करेगी, जबकि बदले में पी. विजयन गांधी परिवार को वायनाड सीट के साथ ही कांग्रेस पार्टी को राज्य से अधिकतम लोकसभा सीटें जिताने में मदद करेंगे। विगत दो लोकसभा चुनावों 2019 और 2024 में कांग्रेस पार्टी को सर्वाधिक लोकसभा की सीटें केरल राज्य से ही जीती है। 2021 के विधानसभा चुनाव में एलडीएफ के द्वारा जीती गई 60 विधानसभा सीटों पर लोकसभा के चुनाव में यूडीएफ ने बढ़त बनाई थी। केरल विधानसभा की सीटों का यह संख्या 43 प्रतिशत है। इस तरह की राजनीतिक उथल-पुथल सिर्फ़ किसी गुप्त समझौते के तहत ही हो सकती है।
भाजपा का केरल में बढ़ा जनाधार
भाजपा 2024 के लोकसभा के चुनाव में कुल 20 सीटों पर सीधे मुकाबले में थी। 11 विधानसभा की सीटों पर पहले पायदान और 9 सीटों पर दूसरे पायदान पर रही थी। भाजपा तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट 2014 और 2024 के लोकसभा चुनाव में महज 15 हज़ार और 16 हज़ार मतों के अंतर से हारी थी। 2024 में तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट पर चुनाव में भाजपा सात में से छह सीटों पर सीधे मुकाबले में थी। भाजपा तीन सीटों पर प्रथम पायदान पर थी, वहीं तीन सीटों पर दूसरे पायदान पर रही थी।
भाजपा नीत एनडीए का केरल स्थानीय निकायों के चुनाव में प्रदर्शन बहुत ही उम्दा रहा था। पलक्कड़ नगर पालिका में भाजपा ने नगर परिषद की 53 सीटों में से 25 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार जीत दर्ज़ की थी। इसी तरह 2020 में पलक्कड़ नगर पालिका में भाजपा के पास 28 सीटें थीं, जबकि 2015 में जब वह पहली बार सत्ता में आई थी, तब उसे 24 सीटें मिली थी। वहीं भाजपा ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की 45 साल की सत्ता को पूरी तरह नेस्तनाबूत कर दिया। 101 सदस्यों वाले तिरुवनंतपुरम नगर निगम में एनडीए ने 50 वार्ड जीतने के साथ ही सत्ताधारी एलडीएफ को 29 सीटों पर समेट दिया था। एनडीए ने पहली बार एर्नाकुलम जिले की त्रिप्पुनितुरा नगर पालिका में भी उम्दा प्रदर्शन करते हुए एलडीएफऔर यूडीएफ को पीछे छोड़ते हुए सबसे बड़ी गठबंधन बनी।
जनता से दूर होती कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी से केरल की जनता दिनों दिन दूरी बनाती जा रही है और केरल के कई सांसद पार्टी के बदले अपने बुते लोकसभा में जीत रहे हैं। उद्धरण के लिए तिरुवनंतपुरम की जनता शशि थरूर को मतदान करती है ना कि कांग्रेस पार्टी को। इस लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली सात विधानसभा की सीटों में महज एक सीट कोवलम कांग्रेस पार्टी के पाले में है। छह विधानसभा की सीटों पर लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक होने के बावजूद भी शशि थरूर का 2024 में चुनाव जीतना यह बताता है कि यहां के मतदाता सिर्फ थरूर को मत करते हैं ना कि कांग्रेस या यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को। विधानसभा और लोकसभा चुनाव में यूडीएफ और एलडीएफ के जीत के बावजूद भी भाजपा का नगर निगम में शानदार प्रदर्शन यह सिद्ध करता है कि यह दल अब इन दोनों गठबंधनों के मतों में बड़े पैमाने पर सेंधमारी कर रहा है। कांग्रेस पार्टी और वाम दलों का गिरता जनाधार सिर्फ तिरुवनंतपुरम तक ही सीमित नहीं है। भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ विधानसभा के चुनाव में मिलने की सम्भावना है।
केरल में कांग्रेस पार्टी के प्रति लोगों के मोहभंग का एक बड़ा कारण पार्टी नेतृत्व के द्वारा चार बार के सांसद शशि थरूर को गाँधी परिवार द्वारा नज़रअंदाज करना भी है। केरल की जनता को उम्मीद थी कि अच्छे प्रदर्शन के कारण शशि थरूर को कांग्रेस पार्टी लोकसभा में पार्टी का नेता या उपनेता अवश्य बनाएगी, मगर गांधी परिवार ने अपने पारिवारिक वफादार गौरव गोगोई को उपनेता का पद सौंपकर केरलवासियों का अपमान किया है।

















