13 साल पहले जन आंदोलन की भस्म से आम आदमी पार्टी तैयार हुई थी। इस नये राजनीतिक दल के सुप्रीमों बने थे अरविंद केजरीवाल। उनका जलवा शुरु से अब तक कायम है। पिछले 13 वर्षों से उनकी कट्टर ईमानदारी क महायज्ञ जारी है,जिसमें 14 दिग्गजों की आहुति हो चुकी है,क्या राघव चड्ढा 15 वें होंगे। ताजा घटनाक्रम के बाद यह सवाल होना लाजिमी है। स्वतंत्र भारत के राजनीतिक दलों के इतिहास में आम आदमी पार्टी ने कई तरह की कीर्तिमान स्थापित किये।
राजनीतिक दल गठन के साथ ही आप ने दावा किया कि उनकी पार्टी आमजन के हित में काम करेगी,लेकिन संघर्ष के अनेक साथी और गुरु अन्ना हजारे तटस्थ रहे। इसके बाद बाद कई चुनाव लड़े गये। आप के विधायक,सांसद, मुख्यमंत्री,उपमुख्यमंत्री और मंत्री बने।मगर स्थिति हालात अस्सी के दशक की फिल्म के गीत… कालीराम का खुल गया पोल,बीच बजरिया फट गया ढोल,हो गया उसका ढब्बा गोल,बोल हरि,बोल हरि,बोल हरि बोल….जैसी बन गई। फिलहाल पार्टी में भी बोल हरि बोल जैसी स्थित बनी है। समय के साथ पार्टी के भीतर मतभेद और टकराव की घटनाएं थम नहीं रही। भविष्य में अंजाम क्या होगा राम जाने।
पूरे विवाद की जड़ नीति और नैतिकता के मुद्दों पर टकराव को माना जा रहा है,क्योंकि राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के उपनेता राघव चड्ढा को जिस ढंग से खामोश किया गया है,वह किसी बड़े फेरबदल से कम नहीं। इसी तरह से स्वाति मालीवाल बेशक स अभी पार्टी में टिकी हैं,पार्टी के अंदर असहमति और उनके विवाद के किस्से जग जाहिर हो चुके हैं। इसी तरह से शुरुआत में सबसे पहला और बड़ा झटका उस समय लगा था, जब शाजिया इल्मी ने कामकाज के तरीके पर सवाल उठाते हुए पार्टी छोड़ दी। इसके बाद योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने आंतरिक लोकतंत्र की मांग की थी और उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। यह घटना आम आदमी पार्टी के इतिहास की पहली और सबसे बड़ी दरार के रुप में आंकी जा सकती है।

इसके बाद कविराज कुमार विश्वास जैसे लोकप्रिय चेहरे राजनीति से तोबा तोबा और पार्टी पर व्यंग्य बाण छोड़ते हुए किनारे हुए। 2017 में कपिल मिश्रा ने नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए और मामला सामने आया। उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया। इसके बाद टीवी एंकर आशुतोष कांशीराम ने इस्तीफा दिया।उनके नाम के आगे कांशीराम इसलिये लगाया है,क्योंकि बसपा दिग्गज कांशीराम के एक तमाचे के बाद वह हिट हुए। 2019 में अलका लांबा और एचएस फुल्का ने भी अलग राह चुन ली। पंजाब में भी परिस्थितियां अलग नहीं रहे। सुच्चा सिंह छोटेपुर को आरोपों के बाद हटा दिया गया। प्रख्यात फिल्म एवं हास्य कलाकार गुरप्रीत सिंह घुग्गी को नेतृत्व परिवर्तन में हटा दिया गया। सुखपाल सिंह खैरा ने बगावत कर नई राह पकड़ी और दिग्गज पत्रकार कंवर संधू भी अलग हुए। इससे साफ हुआ कि राज्य स्तर पर भी भिन्नता गहरे हैं।
अन्य राज्यों में भी कमोबेश यही स्थिति रही। हरियाणा के तेज तर्रार युवा नेता नवीन जयहिंद और अनगिनत राजनीतिक दलों से होते हुए अशोक तंवर भी यहां ज्यादा समय तक टिक नहीं पाए। गुजरात में इंद्रनील राजगुरु ने पार्टी छोड़ी और पाटीदार चेहरा अल्पेश तथा धार्मिक मालवीय भी ज्यादा समय तक नहीं टिक सके। गोवा में एल्विस गोम्स ने दूरी बना ली।अब पार्टी में रही रार राघव चड्ढा को लेकर दिख रही है। उन्हें अचानक बैक टू पवेलियन दिखाते हुए अशोक मित्तल को पार्टी लाइन पर ही टिक कर बैटिंग करने को भेजा है।बहरहाल राघव चड्ढा के हालात भी पुराने दिग्गजों जैसी स्थिति का संकेत दे रही है।

















