
प्रतीकात्मक तस्वीर
देहरादून: उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बड़ा और अहम बदलाव लागू होने जा रहा है। 1 जुलाई से राज्य में मदरसा बोर्ड को भंग किया जाएगा, जिसके बाद सभी मदरसों को नई नियमावली के तहत संचालित होना अनिवार्य होगा।
नई व्यवस्था के अनुसार, अब किसी भी मदरसे को संचालित करने के लिए उत्तराखंड अल्पसंख्यक प्राधिकरण की धारा 14 के अंतर्गत तय 11 सख्त शर्तों को पूरा करना होगा। सरकार का उद्देश्य मदरसों को मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली से जोड़ना और छात्रों को बेहतर शैक्षणिक अवसर प्रदान करना है।
नई गाइडलाइन के तहत मदरसों के लिए निम्नलिखित शर्तें अनिवार्य कर दी गई हैं।
1. किसी भी छात्र या शिक्षक को धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा
2. केवल मान्यता प्राप्त डिग्रीधारी शिक्षकों की नियुक्ति
3. संस्थान का संचालन अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा
4. राज्य शिक्षा परिषद से संबद्धता अनिवार्य
5. सोसायटी रजिस्ट्रार में पंजीकरण आवश्यक
6. जमीन संस्थान/सोसायटी के नाम पर हो, व्यक्तिगत नहीं
7. सभी वित्तीय लेनदेन संस्थान के बैंक खाते से ही
8. सोसायटी के सभी सदस्य अल्पसंख्यक समुदाय से हों
9. प्राधिकरण और परिषद के निर्देशों का पूर्ण पालन
10. सांप्रदायिक एवं सामाजिक सद्भाव बनाए रखना अनिवार्
11. 3 वर्षों की ऑडिट रिपोर्ट, खेल मैदान और प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध होना
मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष मुफ्ती शमून काश्मी के अनुसार, अब मदरसों में पढ़ाई पूरी तरह राज्य शिक्षा बोर्ड के सिलेबस के अनुसार होगी। इसके तहत दिन में 6 से 7 पीरियड सामान्य विषयों के होंगे, जिसमें धार्मिक शिक्षा अलग समय (स्कूल के बाद) “पार्ट-2” में होगी। इस बदलाव का मकसद छात्रों को आधुनिक शिक्षा और मुख्यधारा से जोड़ना है।
कुल मान्यता प्राप्त मदरसे – 482
कुल छात्र संख्या – 50,000+
देहरादून में मान्यता प्राप्त मदरसे – 36
अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी जेएस रावत ने स्पष्ट किया है कि 11 शर्तों को पूरा किए बिना किसी भी मदरसे को धार्मिक शिक्षा की मान्यता नहीं दी जाएगी। नई व्यवस्था के तहत सभी संस्थानों को प्राधिकरण के नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।
मदरसा बोर्ड भंग होने के बाद छात्रों के भविष्य को लेकर उठ रहे सवालों पर अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि अब मिलने वाले प्रमाण पत्र राज्य शिक्षा परिषद के तहत होंगे।
उसी स्तर के अनुसार नियम साथ ही, सरकार शुरुआती दौर में सख्ती के बजाय संस्थानों को नियमों के अनुरूप ढलने के लिए समय और अस्थायी मान्यता भी दे सकती है। उत्तराखंड में मदरसों को लेकर यह बदलाव शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ा सुधार माना जा रहा है। इससे न केवल पारदर्शिता और गुणवत्ता बढ़ेगी, बल्कि हजारों छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा में बराबरी का अवसर भी मिलेगा।