कश्मीर के गांदरबल जिले में शादियोपोरा गांव के पास झेलम (वितस्ता) और सिंध नदियों के संगम पर दशार कुंभ मेला आयोजित हो रहा है। यह 10 दिन का कार्यक्रम 15 जुलाई से 24 जुलाई तक चलेगा। इसका मकसद कश्मीर में सनातन परंपरा को फिर से जीवित करना और कश्मीरी हिंदुओं को अपनी जड़ों से जोड़ना है।
दशार कुंभ क्या है?
दशार कुंभ एक खास खगोलीय घटना है। इसमें 10 विशेष ज्योतिषीय योग एक साथ बनते हैं। यह सामान्य 12 साल वाले कुंभ से अलग है। संगम पर पवित्र स्नान करने से आध्यात्मिक शुद्धि होती है। शादियोपोरा का यह स्थल पुराना है। यहां एक छोटा सा द्वीप है, जहां प्राचीन चिनार का पेड़ और शिवलिंग है। पहले के समय में श्रद्धालु नाव से वहां पहुंचकर स्नान करते थे।
1941 में हुआ था आखिरी दशार कुंभ
जम्मू-कश्मीर अभिलेखागार के अनुसार आखिरी दशार कुंभ 4 जून 1941 को हुआ था। उस दिन ज्येष्ठ मास की 22वीं तिथि थी। उस समय एक लाख से ज्यादा श्रद्धालु पहुंचे थे। प्रशासन ने करीब 40 हजार का अनुमान लगाया था। सरकार ने कई इलाकों में छुट्टी भी घोषित कर दी थी। 1947 के बाद बंटवारे, कश्मीरी हिंदुओं के विस्थापन और खगोलीय योग की दुर्लभता की वजह से यह परंपरा रुक गई। करीब 75 साल बाद अब इसे फिर से शुरू करने की कोशिश की जा रही है।
इस मेले का आयोजन स्वदेशी सनातन संघ, भारत सहस्रबाहु सहस्रपाद ट्रस्ट, सेवा समर्पण सनातन फाउंडेशन, पंडित प्रेमनाथ शास्त्री कल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट और शादियापुर कमिटी के सहयोग से हो रहा है।मुख्य कार्यक्रम 22 जुलाई को अमृत स्नान है। इसमें देशभर से साधु-संत शामिल होंगे। इसके अलावा दो दिन का धर्म सम्मेलन भी होगा, जिसमें जम्मू-कश्मीर और दूसरे राज्यों के अलग-अलग संप्रदायों के संत हिस्सा लेंगे।
3-4 लाख लोगों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीदें
आयोजकों के मुताबिक इस बार 3 से 4 लाख श्रद्धालु पहुंच सकते हैं। तुलना के लिए, 2016 में कश्मीर में एक दिन का कुंभ हुआ था, जिसमें 35 हजार लोग आए थे। स्वामी कलिकानंद सरस्वती ने बताया कि 10 दिन के इस कुंभ में 3-4 लाख भक्तों के आने की उम्मीद है। 22 जुलाई को अमृत स्नान होगा और देश के अलग-अलग हिस्सों से साधु-संत पहुंचेंगे। दो दिन के धर्म सम्मेलन में जम्मू-कश्मीर और बाकी देश के संत विभिन्न संप्रदायों का प्रतिनिधित्व करेंगे।
















