साहित्य अकादमी में LGBTQ विमर्श: भारतीय मूल्यों पर 'वैचारिक प्रहार', पश्चिमी अवधारणा की नई बिसात
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साहित्य अकादमी में LGBTQ विमर्श: भारतीय मूल्यों पर ‘वैचारिक प्रहार’, पश्चिमी अवधारणा की नई बिसात

भारत में LGBTQ के माध्यम से ये वैचारिक नक्सलाइट्स बहुधा ही गंद फैलाते रहते हैं। यह उनके प्रति संवेदना के लिए नहीं अपितु देश में अनावश्यक वितंडा खड़ा करने के लिए किया जाता है।

Written byडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानीडॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी — edited by Mahak Singh
Apr 1, 2026, 04:56 pm IST
in भारत
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारत की सर्वोच्च साहित्यिक संस्थाओं में से एक, साहित्य अकादमी द्वारा LGBTQ लेखक सम्मेलन का आयोजन एक गहरे वैचारिक विमर्श और टकराव का संकेत है। दुखद है कि यह सम्मेलन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार, के तत्वावधान में हो रहा है। संस्कृति मंत्रालय को यह देखना चाहिए कि क्या हमारी संस्कृति के सभी सिरमौर विषयों पर क्या साहित्य अकादमी ने चर्चा सम्पन्न करा ली है? केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को इस साहित्य आकादमी से पूछना होगा, कि “भारतीय ज्ञान परंपरा की कितनी चर्चा और कितने लेखक सम्मेलन ‘साहित्य अकादमी’ ने करा लिए हैं? क्या हमारे सभी ज्वलंत और आवश्यक सांस्कृतिक प्रश्न उत्तर पा चूकें है जो इस प्रकार के विषय को चर्चा केंद्र में रखने का निर्णय लिया गया? प्रश्न यह नहीं है कि किसी विषय पर चर्चा क्यों हो रही है, बल्कि यह है कि किन विषयों को प्राथमिकता दी जा रही है और उसके पीछे कौन-सी वैचारिक शक्तियाँ सक्रिय हैं?

LGBTQ विमर्श और भारतीय संस्कृति के बीच वैचारिक टकराव

हम एलजीबीटीक्यू के मौलिक अधिकारों के विरोध में नहीं हैं किंतु इनके कंधों पर रखकर भारतीय मूल्यों, देशज अधिष्ठानों, हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं पर जिस प्रकार बंदूकें चलाई जा रही हैं उसके विरोध में हैं। भारत में LGBTQ के माध्यम से ये वैचारिक नक्सलाइट्स बहुधा ही गंद फैलाते रहते हैं। यह उनके प्रति संवेदना के लिए नहीं अपितु देश में अनावश्यक वितंडा खड़ा करने के लिए किया जाता है। हमें यह देखना चाहिए कि वे कौन सी छिपी हुई शक्तियां हैं जो भारत में बालक, बालिकाओं के लिए एक से बाथरूम चाहती हैं? ये मार्क्सिस्ट शक्तियां विद्यालयों के बालक बालिकाओं को एक ही हास्टल में एक ही कक्ष में रखें जाने की वकालत करती हैं। साहित्य अकादमी का यह लेखक सम्मेलन इन सब बातों की ही तो चर्चा करेगा। इसका लक्ष्य केवल भारतीय परंपराओं पर तोप दागना ही तो होगा। गे और लेस्बियन सेक्स के ऊपर लेखक सम्मेलन में किस प्रकार की चर्चा आएगी, इसकी कल्पना से हृदय सिहर उठता है। लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर की चर्चा केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान वाले, साहित्य अकादमी के आयोजन में आना एक खतरनाक वैचारिक विस्फोट है। यह वैचारिक बारूदी सुरंगें हैं जो हमारे वैचारिक अधिष्ठान के नीचे लगातार बिछाई जा रही हैं।

परंपरा, LGBTQ विमर्श और वैचारिक विवाद

ट्रांसजेंडर या किन्नर समाज के प्रति सदैव ही हमारे भारतीय समाज का, शास्त्रों का, ऋषि परंपरा का संवेदनशील मंतव्य रहा है। ये हमारी परंपराओं में स्थायी रूप से सम्मानपूर्वक बसे हैं। समय के साथ-साथ इनके विषय में आवश्यक निर्णय लिए जाने चाहिए, जो कि शासन से लेकर समाज तक लिए भी गए हैं। किंतु ट्रांसजेंडर के अतिरिक्त ये जो गे, लेस्बियन क्वीर आदि हैं इनका स्थान हमारे समाज में कहां होना चाहिए?

आज भारत में एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि यह पूरा विमर्श तथाकथित “कल्चरल मार्क्सिज़्म” की रणनीति का हिस्सा है। इस विचारधारा का मूल उद्देश्य हमारे समाज की पारंपरिक संरचनाओं, परिवार, धर्म, संस्कृति और नैतिकता, को धीरे-धीरे दुर्बल करना ही है। हमारी ऋषि परंपरा और सनातनी संस्कृति को हटाकर उनकी जगह एक नए प्रकार की वैचारिक संरचना स्थापित करना ही ऐसे आयोजनों का लक्ष्य होता है। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को इस देशज वर्ग के विचारों का आदर करते हुए इस विषय को साहित्य अकादमी के आयोजन से अलग करवाना चाहिए।

भारतीय संस्कृति, पुरुषार्थ और सामाजिक मूल्यों पर विमर्श

भारतीय संस्कृति की जड़ें अत्यंत गहरी और संतुलित हैं। यहाँ मनुष्य को केवल उसकी इच्छाओं या प्रवृत्तियों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके धर्म, कर्तव्य और सामाजिक उत्तरदायित्व के आधार पर देखा गया है। ऋषि परंपरा ने जीवन को चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – में संतुलित किया है। इस व्यवस्था में ‘काम’ मर्यादा और संतुलन के भीतर है, न कि उच्छृंखल अभिव्यक्ति के रूप में। ‘काम आनंद’ की एक परिपूर्ण परिभाषा, परिधि, प्रतीति, अभिव्यक्ति हमारे पास युगों से हैं। हमारी ‘विवाह संस्था’ को चोटिल करने का दुष्प्रयास है यह लेखक सम्मेलन। हमारी चिति पर यह नई विध्वंसक मान्यताएँ लादकर वैचारिक बलात्कार किया जा रहा है?

LGBTQ जैसे विषयों को जिस प्रकार से आज शो ऑफ किया जा रहा है, वह भारतीय दृष्टिकोण से अधिक पश्चिमी अवधारणाओं से प्रेरित है। यह केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं है, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों पर भी इसका प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव पड़ता है। इस दुष्प्रभाव की चिंता करनी चाहिए। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि देश में राजनीतिक स्तर पर परिवर्तन हुआ है और राष्ट्रवादी विचारधारा को समर्थन मिला है। लेकिन क्या वास्तव में व्यवस्था बदली है? हमारी शासन व्यवस्था राष्ट्रीयता की उपेक्षा क्यों करती है? अनजाने में हमारी सत्ता क्यों पश्चिमी मूल्यों की पक्षधर बनकर खड़ी हो जाती है? यह एक गंभीर प्रश्न है।कई उदाहरण यह संकेत देते हैं कि शैक्षणिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थानों में अब भी वामपंथी विचारधारा का गहरा प्रभाव बना हुआ है। चाहे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम हों, इतिहास लेखन हो या साहित्यिक संस्थाओं के कार्यक्रम, बहुधा वही दृष्टिकोण प्रमुख होता है जो भारत की परंपरागत मान्यताओं से भिन्न है और उसके विरोध में है। साहित्य अकादमी का यह निर्णय भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। प्रश्न स्वाभाविक है कि जब देश में ग्रामीण साहित्य, वेद-उपनिषद, भारतीय भाषाओं के संरक्षण, या राष्ट्रीय साहित्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, तब LGBTQ जैसे विषय को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है?

बुद्धिजीवी वर्ग, वामपंथी दृष्टिकोण और सांस्कृतिक विमर्श

भारत का “कथित बुद्धिजीवी” वर्ग सदैव ही स्वयं को प्रगतिशील और उदारवादी बताता है, लेकिन इसके विचारों में एक स्पष्ट झुकाव वामपंथी सोच की ओर होता है। यह वर्ग भारतीय परंपराओं को पिछड़ा बताने में संकोच नहीं करता, जबकि पश्चिमी विचारों को आधुनिकता का प्रतीक मानता है। यह वही वर्ग है जो रामायण और महाभारत पर प्रश्न उठाता है। यह वर्ग परंपरागत परिवार व्यवस्था को चुनौती देता है। यह वर्ग भारतीय संस्कृति को “पितृसत्तात्मक” या “रूढ़िवादी” कहकर खारिज करने का प्रयास करता है।

LGBTQ लेखक सम्मेलन जैसे आयोजन इनके लिए केवल साहित्यिक मंच नहीं, बल्कि एक वैचारिक विध्वंस और बारूदी सुरंग फैला देने का माध्यम है। कल्चरल मार्क्सिज्म की अवधारणा यह कहती है कि यदि किसी समाज को बदलना है, तो उसकी संस्कृति को बदलें। भारत में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे विभिन्न माध्यमों से चल रही है, फिल्मों, वेब सीरीज, शिक्षा और अब साहित्यिक मंचों के माध्यम से। बड़ा ही सीधा सा उद्देश्य है इनका। हमारे पारंपरिक मूल्यों को “पुराना” और “अप्रासंगिक” साबित करना, नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर करना, और जड़विहीन पहचान निर्मित करना। अब देखते हैं इस नए मार्क्सिस्ट वितंडे ‘एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मेलन’ का आयोजन होता है या ‘भारतीय ज्ञान परंपरा – लेखक सम्मेलन’ होता है। यह भी देखते हैं कि, केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के कंधों पर चढ़कर हमारी नियति, हमारी संस्कृति को कौन तय करेगा? ऋषि वंशज तय करेंगे या पश्चिम की औलादें और बाजारवादी ताकतें तय करेंगी।

Topics: Cultural PoliticsIndian CultureTransgender RightsSanatan cultureNational IdeologyIndian knowledge traditionCultural MarxismSahitya AkademiMinistry of CultureLeftist IdeologyLGBTQ RightsLGBTQ Writers' ConferenceIdeological Discourse
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी
मूलतः मध्य प्रदेश के बैतूल से हैं. छह पुस्तकों का लेखन एवं दो पुस्तकों का संपादन. 'जनसंख्या असंतुलन एक चुनौती' एवं 'कांग्रेस मुक्त भारत की अवधारणा' विशेष तौर पर चर्चित. कविता संग्रह 'स्वप्न ही तो है कविता', साहित्य अकादमी से सम्मानित. विदेश मंत्रालय भारत सरकार में सलाहकार, छिंदवाड़ा यूनिवर्सिटी में कार्य परिषद् सदस्य रह चुके हैं. [Read more]
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