हनुमान जी: शक्ति, प्रबंधन और निस्वार्थ सेवा के अद्भुत आदिगुरु, जानिए उनके दिव्य अवतरण और प्रकटोत्सव की पूरी कथा
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हनुमान जी: शक्ति, प्रबंधन और निस्वार्थ सेवा के अद्भुत आदिगुरु, जानिए उनके दिव्य अवतरण और प्रकटोत्सव की पूरी कथा

विश्व में भारत सहित कंबोडिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया ,मलेशिया और लाओस में भगवान हनुमान की विधिवत रूप से लोग पूजा करते हैं। अमेरिका के डेलावेयर में स्थापित 25 फीट ऊंची हनुमान जी  की प्रतिमा विश्व में आकर्षण का केंद्र है।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा — edited by Mahak Singh
Apr 1, 2026, 04:26 pm IST
in भारत

सर्वकालिक विविध साक्ष्यों और संदर्भों में महाकाल के 11 वें रुद्र अवतारों के रुप में महाबली हनुमान जी विश्व व्यापी हैं। बल और बुद्धि  प्रबंधन के आदिगुरु हैं। विश्व में भारत सहित कंबोडिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया ,मलेशिया और लाओस में भगवान हनुमान की विधिवत रूप से लोग पूजा करते हैं। अमेरिका के डेलावेयर में स्थापित 25 फीट ऊंची हनुमान जी  की प्रतिमा विश्व में आकर्षण का केंद्र है। अमेरिका के 44वें राष्ट्रपति बराक ओबामा,हनुमान जी की एक छोटी सी प्रतिमा हमेशा अपनी जेब में रखते थे।

हनुमान जी: प्रेरणा और प्रबंधन के आदर्श गुरु

ओबामा ने बताया था कि यह प्रतिमा उन्हें सकारात्मक ऊर्जा देता है और जब वह हताश या थका हुआ महसूस करते हैं,तो यह मूर्ति उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। भारत में जिस प्रकार आदिशक्ति के विभिन्न स्वरुपों का सर्वव्यापीकरण हुआ है उसी प्रकार हनुमान जी का संकटमोचक देवता के रुप में लोकव्यापीकण है। हनुमान जी महाप्रबंधक और प्रबंधन के आदि गुरु हैं। वे अपने बल और बुद्धि के प्रबंधन की ऐंसी छवि प्रस्तुत करते हैं जिसे अपनाकर आप कभी असफल नहीं हो सकते हैं। असंभव शब्द उनके शब्द कोश में नहीं है इसलिए रामचरितमानस के किष्किंधाकांड में जामवंत हनुमान जी से कहते हैं कि “कवन सो काज कठिन जग माही, जो नहीं होई तात तुम्ह पाहीं।” हनुमान जी का प्रबंधन कौशल अब पाठ्यक्रमों में भी आ रहा है।

हनुमान जी के अद्वितीय प्रबंधन कौशल के दृष्टांत

प्रबंधन कौशल के रुप अनेक दृष्टांत है, परंतु एक दृष्टांत अद्भुत और अद्वितीय है । यद्यपि हनुमान जी शाश्वत एवं शारीरिक रूप से ब्रम्हचारी हैं परंतु उनके विवाह की कहानी उनके एक गूढ़ ज्ञान प्राप्त करने के महाप्रबंधन का हिस्सा है। जिसके लिए उन्होंने महातपस्वी और तेजस्वी सूर्य पुत्री सुवर्चला से विवाह के लिए उनको यह कहते हुए मनाया कि आपको भी पूर्ण ज्ञान तभी प्राप्त होगा जब आप विवाह करेंगी उधर सूर्य देवता ने भी हरी झंडी दे दी। ज्ञान प्राप्ति के बाद देवी सुवर्चला पुनः तपस्या में लीन हो गयीं और हनुमान जी राम की सेवा में आ गये। इसलिए हनुमान सदा शारीरिक रूप से ब्रम्हचारी ही हैं। ये विश्व का सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन कहा जा सकता है। लंका में माता सीता का पता लगाकर उनको संबल देने उपरांत शत्रु के पक्ष को अपना पराक्रम दिखाकर लंका को जलाकर राख करने का उपक्रम हनुमान जी को एक कुशल दूत ही नहीं वरन् अपने स्वामी भगवान् श्रीराम की शक्ति और सामर्थ्य बताने अद्भुत एवं अद्वितीय उपाख्यान है।

हनुमान जी: निस्वार्थ सेवा और श्रेय त्याग के प्रतीक

हनुमान जी किसी भी महान् कार्य या उपलब्धि का श्रेय नहीं लेते हैं वरन् देते हैं, इसलिए वे निस्वार्थ सेवा भाव से कार्य करने के सबसे बड़े प्रतीक हैं। सुंदरकांड में इसका अति सुंदर चित्रण किया गया है, जब भगवान श्रीराम हनुमान जी से लंका दहन के बारे में प्रश्न करते हैं कि  “कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका। तब हनुमान जी अपनी उपलब्धि का सारा श्रेय प्रभु श्रीराम को ही इस प्रकार देते हैं, “प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।

साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

हनुमान जी का निस्वार्थ सेवा भाव एवं शनि से जुड़ी मान्यताएँ

हनुमान जी के उक्त विचारों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक ओत-प्रोत  है,और संघ अपनी रीति-नीति में शिरोधार्य कर,किसी भी कार्य या उपलब्धि का श्रेय नहीं लेता वरन् देना सिखाता है। भगवान श्री राम पर जब-जब भी संकटों के कृष्ण मेघ आच्छादित हुए,तब-तब हनुमान जी ने उनका निवारण किया। भगवान श्री राम के कनिष्ठ भ्राता, लक्ष्मण जी को जब मेघनाथ ने वीरघातिनी शक्ति से मरणासन्न कर दिया तब हनुमान जी ने अपनी शक्ति,  कौशल और प्रबंधन से लक्ष्मण जी के जीवन की रक्षा की, इसलिए भगवान श्रीराम ने भी हनुमान जी को संकट मोचन के नाम से पुकारा है। उल्लेखनीय है कि शनि महाराज के प्रकोप से बचने का सबसे सहज और सरल उपाय है शनिवार को हनुमान जी की पूजा अर्चना!!! मंगल के स्वामी हनुमान जी का शनि देव पर बड़ा उपकार है, क्योंकि हनुमान जी ने ही शनि महाराज को रावण से मुक्ति दिलाई थी, साथ ही एक बार शनि देव हनुमान जी से पराजय का स्वाद ले चुके हैं , इसलिए शनि महाराज का उनको आशीर्वाद भी है कि शनिवार को हनुमान जी की पूजा और शनि देव को सरसों का तेल अर्पित करने से शनि देव अनिष्ट नहीं करेंगे।

हनुमान जी का दिव्य अवतरण एवं नाम-वैभव

त्रेतायुग का अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा, चित्रा नक्षत्र, मेष  लग्न में हनुमान जी का अवतरण हुआ। पिताश्री केसरी और माता अंजना, ऋषि द्वारा शापित अप्सरा फिर शाप मुक्ति की देवीय योजना के अंतर्गत अंजना जी की शिव की तपस्या के बाद अंशावतार के रूप में पुत्र रुप में आने का आशीर्वाद मिला था। तदुपरांत एक देवीय घटना हुई, जिसमें अग्नि देव द्वारा महाराज दशरथ की रानियों को संतानोत्पत्ति के लिए दी गई देवीय पायस उपयोग के बाद थोड़ी सी कटोरी में बची थी उस कटोरी को एक पक्षी ले उड़ा और तपस्या रत अंजनी के गोद में रख दिया जिसे अंजना ने प्रसाद समझ कर ग्रहण किया और गर्भवती हुईं और हनुमान जी का अवतरण हुआ। हनुमान जी के सर्वप्रमुख नाम बजरंगबली, अंजनी पुत्र, मारुति नंदन, महाबली, रामेष्ट, फाल्गुन सखा, पिंगाक्ष, अमित विक्रम, उदधिक्रमण, सीताशोकविनाशन, लक्ष्मणप्राणदाता, दशग्रीवदर्पहा आदि बहुत प्रचलित हैं।

ऐतिहासिक और पौराणिक आख्यानों में हनुमान जी प्रलय के प्रभाव से मुक्त हैं क्योंकि माता सीता ने हनुमान जी को अजर अमर होने का वरदान दिया है इसलिए वे चिरंजीवी हैं। अतः हनुमान जी के लिए  जन्म अथवा जयंती जैंसे शब्दों का प्रयोग सर्वथा अनुचित है। अतः उनका अवतरण, प्राकट्योत्सव (प्रकटोत्सव, प्रगटोत्सव)है और यही शिरोधार्य होना तर्कसंगत एवं धर्मसम्मत है।

यद्किंचित यह भी कि अवतार, जन्म, जयंती, पुण्यतिथि को लेकर प्रकारांतर से विरोधाभास है, एतदर्थ उसका भी निराकरण आवश्यक है। वस्तुतः शिक्षा, संस्कार,  जिज्ञासु प्रवृत्ति और वैज्ञानिक दृष्टि के कारण मनुष्य में अपने परिदृश्य के पुनरीक्षण की पुनर्जिज्ञासा होती ही रहती है। इससे लाभ यह होता है कि समय के साथ आ गई भ्रांतियों का समयानुकूल उच्छेदन होता रहता है।  सोशल मीडिया के बढ़ते प्रयोग  के कारण कुछ समय से देखने में आया है  कि जन्मदिन , गोलोकगमन, जयंतियों आदि पर गंभीर विमर्श होने लगा है और यह मानव की उस परिष्कृत मनोवृत्ति का परिचायक है जो मानव से संबंधित घटनाओं, नामकरण, संबोधन  आदि को गरिमामंडित करती है। जैसे व्यक्ति कैसा भी दुराचारी हो कोई उसे नर्कवासी नहीं कहता वरन् स्वर्गवासी ही कहता है। इस तथ्य को ध्यान में रखे बिना आज का चिंतन अपूर्ण रहेगा।

बात प्रारंभ करते हैं गीता से क्योंकि यह भारतीय न्याय व्यवस्था में शपथ के लिए विख्यात है। जब श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि सृष्टि के आरम्भ में यह उपदेश मैंने वैवस्वत सूर्य को दिया (गीता, 4/3) तो अर्जुन कहता है हे हरि! आपने तो वसुदेवपुत्र के रूप में अभी कुछ दिन पहले ही जन्म लिया है फिर यह कैसे संभव है?  तब श्रीकृष्ण कहते हैं, प्रिय अर्जुन! मेरे और और तुम्हारे पहले ही कई जन्म हो चुके हैं (गीता, 4/5) जिन्हें मैं जानता हूँ ( परमात्मा होने से) परन्तु तू नहीं जानता (जीवात्मा होने से) अर्थात् , परमेश्वर की जानकारी में सब है, जीवात्मा की जानकारी में नहीं। यद्यपि तपस्या द्वारा सिद्ध पुरुषों को एक सीमा तक यह ज्ञान हो सकता है। आगे चलकर कहा गया है (4/7-8) जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है… मैं स्वयं को सृजित करता हूँ अर्थात् प्रकट या अवतरित करता हूँ।

श्रीमद्भागवत में शौनक आदि ऋषि, इतिहासवेत्ता सूत जी से पूछते हैँ! क्या करने की इच्छा से श्रीकृष्ण अवतरित हुए? (भागवत, 1/1/12) और आप हमें उनके विभिन्न अवतारों और लीलाओं की कथा सुनायें ( भागवत, 1/1/17-18)। यहाँ पर चिंतन किया जाये तो बोध होता है कि  अवतार शब्द का प्रयोग परमात्मा के धरा पर आगमन का द्योतक है। और जन्म शब्द जीवात्माओं के लिए अधिक युक्तिसंगत है यद्यपि पहले ही कह चुके हैं कि व्यक्ति के गौरव में वृद्धि का विचार करने के उद्देश्य से उसके लिए भी अवतरण जैसा शब्द प्रयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। श्रीराम के रूप में परब्रह्म के आगमन के लिए इसीलिए रामचरितमानस में इसीलिए कहा गया है-

 “भये प्रकट कृपाला दीनदयाला, कौशल्या हितकारी।” 

इसलिए देवात्माओं के धरा पर आगमन को प्रकटोत्सव, प्राकट्योत्सव, प्रकाशोत्सव, जैसे गरिमाबोधक शब्दों से इंगित किया जाता है। इसी तरह जयंती शब्द का प्रयोग होता है, यहाँ यह ध्यान में रखना होगा कि साकार और निराकार दो दृष्टियाँ भारतीय परम्परा में रही हैं और वस्तुत: उनमें भेद भी नहीं है, परंतु मन में उनसे प्रसूत भावों  के कारण व्याख्याओं में लोग भेद कर बैठते हैं। किसी व्यक्ति के कर्म उसे महान् बनाते हैं, ऐसे महापुरुषों के  सुयश अथवा कीर्तिपताका का स्मरण करने के लिए उनके जन्मदिन को जयंती शब्द के संबोधित करते हैं जो एक गौरवप्रदाता शब्द है।

उत्तररामचरित में भवभूति, शतकों में  भर्तृहरि, शंकरदिग्विजय आदि संदर्भों  में अवतार शब्द ईश्वर के धरा पर आगमन के लिए प्रयुक्त है। किसी व्यक्ति का देहावसान दिवस भी गरिमामय बन जाये इसलिए पखवाड़े के चांद्र दिवस की अवसान तिथि के साथ पुण्य लगाकर पुण्यतिथि के रूप में दिवंगत के कीर्ति को याद किया जाता है। वस्तुत:  दिव्य आत्माओं की पुण्यतिथि न होकर “लीलासंवरण तिथि” या “लीलासंवरण दिवस”कहना  अधिक उपयुक्त हो सकता है।   कुछ शब्द समय के साथ रूढ़ या बहुप्रचलित हो जाते हैं और प्रथा के रूप में प्रयोग किये जाने लगते हैं।  निष्कर्षत: ” प्राकट्य “शब्द ईश्वर की अपने कला-अंशों के साथ  भूलोक में विभिन्न स्वरुपों में अवतरणिका का सूचक है।

Topics: Mahabali HanumanHanuman WorshipRudra AvatarManagement SkillsStrength and IntelligenceSelfless ServiceShri Ram DevoteeHanuman jiAnjani's SonRamcharitmanasMaruti NandanSankatmochanBurning of LankaBajrangbaliLaxman's Life ProtectionSundarkandSuvarchala Marriage
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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