अहिंसा परमो धर्मः: महावीर स्वामी का दर्शन जो वैश्विक हिंसा और पर्यावरण संकट का समाधान है
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अहिंसा परमो धर्मः: महावीर स्वामी का दर्शन जो वैश्विक हिंसा और पर्यावरण संकट का समाधान है

वर्तमान विश्व युद्ध, हिंसा, आतंकवाद और पर्यावरण संकट के दौर में भगवान महावीर का अहिंसा, अनेकांतवाद और 'जियो और जीने दो' का सिद्धांत कैसे विश्व शांति स्थापित कर सकता है। महावीर के पंचशील और विवेकपूर्ण जीवन दर्शन की गहन व्याख्या।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by कुलदीप सिंह
Mar 31, 2026, 09:44 am IST
in धर्म-संस्कृति
भगवान महावीर

भगवान महावीर

विश्व युद्ध के वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में सुरसा के मुख की भांति तेजी से बढ़ती जा रही हिंसा और विघटन की बाढ़ को रोकने में भगवान महावीर का अहिंसा व सहअस्तित्व सिद्धांत ही सबसे प्रभावी साबित हो सकता है। दुर्भाग्य से वर्तमान दुनिया जाति, धर्म और राष्ट्रीयता के बीच विभाजित है। तरह-तरह के मतभेदों  और वर्चस्व स्थापित करने की होड़ के कारण स्थितियां निरंतर भयावह होती जा रही है। समूचा विश्व युद्ध और आतंकवाद, हिंसा, धार्मिक असहिष्णुता और आर्थिक शोषण, पर्यावरण और प्रकृतिक असंतुलन जैसी विषम वैश्विक परिस्थितियों का सामना कर रहा है।

लालच व क्रोध के दानव ने समूची दुनिया के सामाजिक ताने-बाने को तार-तार कर दिया है। खून के रिश्ते तक स्याह हो गये हैं। मानवता, आत्मीयता व संवेदना विरले ही दिखती है। इंसानी लालच और स्वार्थ के कारण जीव जंतुओं की हजारों प्रजातियां आज लुप्त हो चुकी हैं और अनेक पर संकट गहरा रहा है। यदि मानव इसी तरह जीव-जंतुओं और वृक्ष-वनस्पतियों का विनाश करता रहेगा तो एक दिन न दुनिया मचेगी और न मानव समाज। आज जिस तेजी से पर्यावरण प्रदूषण का खतरा गहराता जा रहा है, उसका मूल में है प्राकृतिक ताने-बाने का विनाश। ऐसे अशांत, भ्रष्ट व हिंसक समाज में भगवान महावीर का ‘अहिंसा’ का जीवन दर्शन ही मानव मन को सच्ची शांति प्रदान कर सकता है। यद्यपि महावीर से पहले “अहिंसा परमो धर्मः” का उल्लेख “महाभारत” के अनुशासन पर्व में मिलता है लेकिन इसको आमजन में लोकप्रिय महावीर ने ही किया।

अहिंसा के तत्वज्ञान के सूक्ष्मतम व्याख्याता

भगवान महावीर ने ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का शंखनाद कर ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की भावना को देश और दुनिया में जाग्रत किया था। भगवान महावीर ने ‘अहिंसा’ की जितनी सूक्ष्म व्याख्या की है, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने मानव को मानव के प्रति ही प्रेम और मित्रता से रहने का संदेश नहीं दिया अपितु सृष्टि के हर जीवधारी के प्रति मित्रता और अहिंसा के व्यवहार पर बल दिया है। महावीर की अहिंसा महज हिंसा पर अंकुश नहीं है, यह छोटे से छोटे प्राणी के लिए प्रेम और करुणा की जीवन-दृष्टि है। महावीर की ‘अहिंसा’ विश्वधर्म की धुरी और मानवता का मूल है। उनकी अहिंसा मानवता की मुंडेर पर प्रेम का प्रज्वलित दीप है।

उनके अनुसार, एक अहिंसा से जुड़ना धर्म के समस्त पहलुओं से जुड़ जाना है। अहिंसा प्राणीमात्र में एक समग्र जीवन देखने का गहरा अंतरदर्शन है। एक अहिंसा का पूजन समग्र मानवता की पूजा है। अहिंसा की पराकाष्ठा को छूना धर्म और अध्यात्म की ऊँचाई को छूना है। वर्तमान अशांत, आतंकी, भ्रष्ट और हिंसक वातावरण में भगवान महावीर की अहिंसा ही शांति प्रदान कर सकती है। महावीर की अहिंसा केवल सीधे वध को ही हिंसा नहीं मानती है, अपितु मन में किसी के प्रति बुरा विचार भी हिंसा है। महावीर की अहिंसा के दो हाथ हैं – अपरिग्रह और अनेकांत। अपरिग्रह हमें निर्वस्य नहीं करता।

सबके लिए रोटी-कपड़ा -मकान की व्यवस्था ही अपरिग्रह है। मनुष्य जो आज डिब्बाबंद जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो चुका है, अनेकांत उसे पंथ, और परंपरा की रूढ़ परतों से बाहर निकलने को प्रेरित करता है। जैन मुनि आचार्य चन्द्रप्रभ के अनुसार भगवान महावीर कहते हैं कि अहिंसा धर्म की माँ है और विवेक धर्म का जनक है। जिसके जीवन में विवेक और अहिंसा है, वह सुरक्षित है। धर्म का सार सूत्र है- विवेक से चलो। विवेक से बैठो। विवेक से बोलो। विवेक से सोओ। विवेक से खाओ। सब कुछ विवेकपूर्वक संपादित करो। जहाँ जीवन में हर गतिविधि पर विवेक का अंकुश, विवेक का प्रकाश रहता है, वहाँ कहीं भी पापानुबंध नहीं होते। विवेक ही तो व्यक्ति की हंसदृष्टि है, जो उसे अच्छे व बुरे का बोध कराती है।

वे कहते हैं कि यदि आप किसी कार्य को विवेकपूर्ण ढंग से करते हैं और फिर भी कोई जीव हिंसा हो जाए तो भी आप पाप के भार से मुक्त रहते हैं। महावीर यही संदेश देते हैं कि मूल्य व्यक्ति के मरने या जीने का नहीं अपितु मूल्य है उसके प्रति रहने वाले भावों का। यदि कोई हमारी बहन-बेटियों की इज्जत पर हाथ डाले तो क्या हम अहिंसा का नारा लगाकर चुपचाप खड़े रहेंगे? या फिर हमारे पूजागृहों पर हमले करे, क्या तब भी हमारी चेतना दुबकी रहेगी? ध्यान रखें अहिंसा कायरता का मार्ग नहीं बताती वरन अहिंसा को तो वही जी सकता है जिसके पास वीरत्व और पुरुषत्व है। देश की सुरक्षा के लिए युद्ध करना हिंसा नहीं, अपितु अहिंसा है।

“जियो और जीने दो” का प्रकाशपथ

“जियो और जीने दो”-ये केवल चार शब्द नहीं, बल्कि भगवान महावीर द्वारा दिखाए गए उस प्रकाशपथ का सार हैं, जो आज भी इंसान को अंधकार से बाहर निकालने की ताक़त रखता है। ‘जियो और जीने दो’ अर्थात् सह-अस्तित्व, अहिंसा एवं अनेकांत का नारा देने वाले महावीर स्वामी के लोकहितकारी सिद्धांत ही आज विश्व की अशांति दूर कर शांति कायम करने में समर्थ हैं। भगवान महावीर ने समतामूलक समाज का उपदेश दिया था। उनकी मान्यता थी कि जहां राग, द्वेष होता है, वहां विषमता पनपती है। सभी समस्याओं का की जड़ है राग और द्वेष। व्यक्ति अपने स्वार्थों का पोषण करने, अहं को प्रदर्शित करने, दूसरों को नीचा दिखाने, सत्ता और विमषता के गलियारे में भटकता रहता है। भगवान महावीर ने बताया कि अभाव और अत्यधिक उपलब्धता दोनों ही हानिकारक हैं।

‘पंचशील’ का दिव्य तत्वदर्शन

भगवान महावीर का दर्शन केवल धार्मिक नहीं, अत्यंत व्यावहारिक और सार्वभौमिक है। उनके पंचशील (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह)  आज के हर मनुष्य के लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं। ‘अहिंसा’ का अर्थ है- मन, वचन व कर्म से किसी भी जीव को कष्ट न देना। ‘सत्य’ अर्थात जो देखा, जो जाना-उसी को बोलना। ‘अस्तेय’ यानी जो तुम्हारा नहीं, उसे न लेना। ‘ब्रह्मचर्य’ से आशय है इन्द्रियों पर संयम रखना और ‘अपरिग्रह’ से तात्पर्य है जितनी ज़रूरत है, उतना ही रखो। इन पांच अनमोल सिद्धांतों की आत्मा में छिपा है संयम और संतुलन; जो वर्तमान की सभी वैश्विक समस्याओं के निराकरण का मूल अस्त्र   है।

महावीर का अनूठा ‘अनेकांतवाद’

भगवान महावीर ने हमें ‘अनेकांतवाद’ सिखाया-एक ऐसा विचार जिसमें हर व्यक्ति की सोच, मत और दृष्टिकोण को महत्व दिया जाता है। महावीर ने ‘अनेकांत सिद्धांत’ के माध्यम से शांति, मानवता एवं लोकतांत्रिक मूल्यों की महत्ता को स्थापित किया था। ‘अनेकांत’ सिद्धांत के अनुसार कई प्रकार के विचारों से सत्य को जानना अनेकांत है। अर्थात सत्य को पाने के लिए कोई एक विचार पर्याप्त नहीं है। महावीर का अनेकांत दर्शन सभी प्रकार के विचारों व दृष्टिकोण को सम्मान देता है। महावीर ने कहा था कि यदि हमारा विचार सत्य हो सकता है, दूसरे का विचार भी सत्य हो सकता है। यह दृष्टिकोण समाज में उत्पन्न विभेद को समाप्त कर शांति का सूत्र बन सकता है। उनके इस दृष्टिकोण में  सत्याग्रह, व्यापकता, उदारता, सहिष्णुता, अहिंसा, एकता आदि गुण प्रकट होते हैं। भगवान महावीर ने हमें अनेकांत दृष्टि देकर वस्तु के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराया है। साथ ही हमारे भीतर वैचारिक सहिष्णुता और प्राणीमात्र के प्रति सद्भाव का बीजारोपण भी किया है।

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