अभिव्यक्ति की आजादी vs जिम्मेदारी: फेसबुक पेजों और यूट्यूब चैनलों के बंद होने की असली वजह
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अभिव्यक्ति की आजादी vs जिम्मेदारी: फेसबुक पेजों और यूट्यूब चैनलों के बंद होने की असली वजह

सोशल मीडिया पर हिंदू परंपराओं का अपमान और भ्रामक प्रचार करने वाले पेज बंद होने पर 'प्रेस आजादी' का रोना क्यों? विस्तार से समझें फेसबुक और यूट्यूब की कार्रवाई के पीछे की हकीकत।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by कुलदीप सिंह
Mar 30, 2026, 02:42 pm IST
in विश्लेषण
Social Media Addiction

प्रतीकात्मक तस्वीर

आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक और यूट्यूब आम लोगों की आवाज बनने के साथ-साथ सूचना का सबसे बड़ा स्रोत भी हैं। लेकिन इन प्लेटफॉर्म्स पर कुछ पेज और चैनल ऐसे भी हैं जो खबर के नाम पर प्रोपगैंडा फैलाते हैं, धार्मिक आस्था का मजाक उड़ाते हैं और व्यूज-लाइक के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। हाल ही में @moliticsindia, @NationalDastak और @apnarajeevnigam जैसे फेसबुक पेज भारत में प्रतिबंधित हो गए। इसी तरह फोर पीएम नाम का एक यूट्यूब चैनल भी सरकार की कार्रवाई का शिकार हुआ। इनके बंद होने को कुछ लोग प्रेस की आजादी पर हमला बताते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इनकी बंदिश की बड़ी वजह खुद इनके द्वारा फैलाया जा रहा दुष्प्रचार और गैर-जिम्मेदाराना कंटेंट है।

झूठी और भ्रामक खबरों का प्रचार

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के अपने नियम होते हैं। फेसबुक (मेटा) और यूट्यूब स्पष्ट रूप से कहते हैं कि उनके प्लेटफॉर्म पर झूठी, भ्रामक, हिंसा भड़काने वाली या धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली सामग्री की इजाजत नहीं है। जब कोई पेज या चैनल बार-बार इन नियमों का उल्लंघन करता है, तो प्लेटफॉर्म को एक्शन लेना पड़ता है। @NationalDastak और MoliticsIndia जैसे पेजों पर अक्सर ऐसी खबरें और वीडियो पोस्ट किए जाते थे जो एक तरफा थे, तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करते थे और खासकर हिंदू परंपराओं, रीति-रिवाजों और आस्था को निशाना बनाते थे। हिंदुओं की पूजा-पद्धति, त्योहारों या धार्मिक प्रतीकों पर व्यंग्य करना इनके कंटेंट का आम हिस्सा लगता था। फोर पीएम चैनल भी बीजेपी और हिंदुत्व के खिलाफ लगातार दुष्प्रचार चलाता दिखा, जहां व्यूज बढ़ाने के लिए सनसनीखेज और बिना सबूत के दावे किए जाते थे।

व्यूज के चक्कर में हिन्दू घृणा

यह कोई नई बात नहीं है। पिछले कई सालों में देखा गया है कि कुछ चैनल और पेज व्यूज के लालच में हिंदू समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाते हैं। उदाहरण के लिए, किसी मंदिर की परंपरा या किसी धार्मिक अनुष्ठान को ‘अंधविश्वास’ बताकर मजाक उड़ाना, या हिंदू देवी-देवताओं को अपमानजनक तरीके से दिखाना इनकी रणनीति का हिस्सा बन गया था। कांग्रेस और उसके समर्थक आईटी सेल को यह कंटेंट खूब भाता था, क्योंकि यह उनके राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने का आसान हथियार बन जाता था। नेशनल दस्तक जैसे पेजों से कांग्रेस का ‘प्रेम’ छुपा नहीं रहता। ये पेज अक्सर एक खास विचारधारा को बढ़ावा देते थे, जहां हिंदुत्व को ‘फासीवाद’ बताया जाता था और विपक्षी दलों की तारीफ में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती थी। लेकिन जब सच्चाई सामने आती है और प्लेटफॉर्म्स एक्शन लेते हैं, तो रोना शुरू हो जाता है कि ‘आजादी पर हमला’ हो रहा है।

इसे भी पढ़ें: Nepal: Action में Balen Govt., शिक्षा में ‘सुधार’ के साथ ही लटकी योजनाओं पर कड़ा निर्देश, विपक्षियों पर गाज गिरनी जारी

अभिव्यक्ति की आजादी या कानून

तर्क यह है कि प्रेस की आजादी का मतलब यह नहीं कि कोई भी कुछ भी बोल-लिख सके। आजादी की सीमा तब खत्म होती है जब वह दूसरों की आजादी या समाज की शांति को नुकसान पहुंचाने लगे। भारतीय संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) में स्पष्ट सीमाएं भी हैं-राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और दूसरे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए। अगर कोई चैनल या पेज लगातार झूठ फैलाकर समाज में वैमनस्य पैदा करता है, तो सरकार और प्लेटफॉर्म्स को हस्तक्षेप करना जरूरी हो जाता है। Section 69A of IT Act और प्लेटफॉर्म्स के कम्युनिटी गाइडलाइंस इसी उद्देश्य से बने हैं।

फोर पीएम चैनल का उदाहरण लें। यह चैनल वर्षों से बीजेपी सरकार के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करता रहा। उसके वीडियो में अक्सर बिना साक्ष्य के दावे किए जाते थे कि सरकार गिरने वाली है या हिंदुत्व देश के लिए खतरा है। व्यूज बढ़ाने के लिए क्लिकबेट टाइटल और थंबनेल इस्तेमाल किए जाते थे। जब सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर इसे ब्लॉक किया, तो इसका स्वागत होना चाहिए था। लेकिन कुछ लोग इसे सेंसरशिप बताने लगे। सच्चाई यह है कि ऐसे चैनल न सिर्फ एक राजनीतिक दल को निशाना बनाते थे, बल्कि पूरे हिंदू समाज की आस्था को चोट पहुंचाते थे। हिंदू परंपराओं- जैसे राम मंदिर, गौ-रक्षा या सांस्कृतिक उत्सवों-को ‘घृणा’ का प्रतीक बताना इनकी आदत बन गई थी।

@NationalDastak, MoliticsIndia और Apna Rajeev Nigam जैसे पेज भी इसी श्रेणी में आते हैं। इन पर पोस्ट अक्सर एक तरफा होते थे, जहां विपक्ष की तारीफ और सत्ता पक्ष की आलोचना में तथ्य गौण हो जाते थे। धार्मिक मुद्दों पर इनके कंटेंट में व्यंग्य और अपमान की झलक साफ दिखती थी। जब फेसबुक ने इन पेजों को भारत में प्रतिबंधित किया, तो पीछे की वजह प्लेटफॉर्म के नियमों का उल्लंघन था-मिसलीडिंग कंटेंट, कोऑर्डिनेटेड इनऑथेंटिक बिहेवियर और कम्युनिटी स्टैंडर्ड्स का उल्लंघन। फेसबुक पहले भी ऐसे पेजों पर एक्शन ले चुका है, चाहे वे किसी भी विचारधारा के हों।

झूठी और भ्रामक पोस्ट पर सख्त सरकार

यहां यह समझना जरूरी है कि सोशल मीडिया कोई अनियंत्रित जगह नहीं है। प्लेटफॉर्म्स को अपनी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है, वरना वे कानूनी मुश्किल में फंस सकते हैं। भारत सरकार ने हाल के वर्षों में डीपफेक, मिसइनफॉर्मेशन और प्रोपगैंडा के खिलाफ सख्ती बढ़ाई है। तीन घंटे के अंदर अनलॉफुल कंटेंट हटाने का नियम भी इसी दिशा में है। लेकिन कुछ लोग इसे ‘डरपोक’ सरकार की कार्रवाई बताते हैं। असल में, यह जिम्मेदार पत्रकारिता को बढ़ावा देने का प्रयास है।

जिम्मेदार मीडिया क्या करता है? वह तथ्यों की जांच करता है, दोनों पक्षों की बात रखता है और समाज को एकजुट करने वाली सामग्री पेश करता है। लेकिन इन बंद पेजों और चैनलों ने उल्टा रास्ता चुना-व्यूज के लिए ध्रुवीकरण, आस्था का अपमान और राजनीतिक प्रचार। हिंदू समाज, जो देश की बहुसंख्यक आबादी है, अपनी परंपराओं और विश्वासों की रक्षा का हक रखता है। जब कोई इनका मजाक उड़ाता है, तो यह न सिर्फ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है, बल्कि सामाजिक सद्भाव को भी खतरे में डालता है। कांग्रेस और उसके समर्थकों का इन पेजों से लगाव समझ में आता है। ये पेज अक्सर कांग्रेस की लाइन पर चलते दिखते थे- हिंदु विरोध, बीजेपी आलोचना और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण। लेकिन जब प्लेटफॉर्म्स या सरकार एक्शन लेती है, तो ‘प्रेस फ्रीडम’ का राग अलापा जाता है। याद रखें, प्रेस फ्रीडम का मतलब फ्री-फॉर-ऑल नहीं है। दुनिया भर में प्लेटफॉर्म्स ऐसे कंटेंट पर बैन लगाते हैं जो हिंसा भड़काए या झूठ फैलाए। अमेरिका में भी फेसबुक और यूट्यूब ने राजनीतिक प्रोपगैंडा पर एक्शन लिया है।

डिजिटल मीडिया को नैतिक होने की आवश्यकता

इन बंदिशों से एक बड़ा सबक निकलता है-डिजिटल मीडिया को भी नैतिकता और जिम्मेदारी का पालन करना चाहिए। व्यूज और लाइक्स कमाने के चक्कर में अगर आस्था का अपमान किया जाएगा, तो परिणाम भुगतने पड़ेंगे। सरकार को भी पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए, ताकि कार्रवाई पर सवाल न उठे। लेकिन यह भी सच है कि बिना सबूत के प्रचार करने वाले चैनल और पेज लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकते हैं।

चश्में बदलने की आवश्यकता

अंत में, फेसबुक पेजों और फोर पीएम जैसे चैनलों के बंद होने को सिर्फ सेंसरशिप के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। यह प्लेटफॉर्म्स और सरकार द्वारा प्रोपगैंडा और गलत कंटेंट के खिलाफ लिया गया जरूरी कदम है। हिंदुओं की परंपरा और आस्था का सम्मान हर भारतीय का कर्तव्य है। जब मीडिया इसे मजाक बनाता है, तो समाज को विरोध करना चाहिए। सच्ची पत्रकारिता तथ्यों पर टिकी होती है, न कि व्यूज के लालच पर। इन घटनाओं से उम्मीद है कि डिजिटल मीडिया अधिक जिम्मेदार बनेगा और प्रोपगैंडा की जगह सच्ची खबरों को जगह मिलेगी।

नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने लगभग 10 हजार ट्विटर अकाउंट्स ब्लॉक करवाए थे। ये अकाउंट्स मुख्य रूप से उन लोगों के थे जो यूपीए सरकार, डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस नेताओं की आलोचना करते थे। 2014 में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद पीएमओ ने हस्तक्षेप कर इनमें से करीब 10 हजार अकाउंट्स खुलवाए। यह कदम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मजबूत करने और सभी के साथ संवाद बढ़ाने की दिशा में उठाया गया था।

Topics: Insults to Hindu FaithDigital DisinformationFreedom of Expression vs. Responsibilityसोशल मीडिया प्रोपगैंडाYouTube Channels Spreading Anti-Hindu Hateफेसबुक पेज बैनहिंदू आस्था अपमानडिजिटल दुष्प्रचारअभिव्यक्ति की आजादी vs जिम्मेदारीहिंदू घृणा फैलाने वाले यूट्यूब चैनलSocial Media PropagandaFacebook Page Bans
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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