15 मार्च, 2026 का दिन राष्ट्रजीवन के लिए गहन शोक, आत्ममंथन और मौन का क्षण बन गया, जब राष्ट्र सेविका समिति की वरिष्ठ प्रचारिका, पूर्व सह-कार्यवाहिका तथा असंख्य सेविकाओं की प्रेरणास्रोत सुश्री रेखा राजे (रेखा ताई) देहत्याग कर अनंत यात्रा पर प्रस्थान कर गईं। उनका जाना केवल एक व्यक्तित्व का अवसान नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या, राष्ट्रनिष्ठा और नारी-जागरण के एक उज्ज्वल युग का विराम है। वे उन विरल विभूतियों में थीं, जिनका जीवन स्वयं एक संदेश, साधना और एक सतत प्रेरणा बन जाता है। साधारण जीवन से असाधारण संकल्प तक उनका जीवन बहुत ही कर्मठ था। महाराष्ट्र के पुणे में जन्मी रेखा ताई का प्रारंभिक जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण रहा।
प्रारंभिक शिक्षा पुणे में प्राप्त करने के उपरांत उन्होंने कानपुर से समाजशास्त्र, राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर (एम.ए.) तथा बी.एड. की उपाधि अर्जित की। बाल्यकाल से ही राष्ट्र सेविका समिति से जुड़कर ‘निष्णांत वर्ग’ तक शिक्षित होने वाली रेखा ताई ने युवावस्था में ही अपने जीवन का ध्येय निश्चित कर लिया था—कि यह जीवन व्यक्तिगत सुख या प्रतिष्ठा के लिए नहीं, अपितु राष्ट्र के पुनर्जागरण के लिए समर्पित होगा। उन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर प्रचारिका जीवन का निर्णय ले स्वयं को राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित किया। उनका जीवन एक तपस्विनी साधिका के समान था, जिसने अपने अस्तित्व का प्रत्येक अंश समाज को अर्पित कर दिया।
संगठन के कार्य विस्तार के लिए रेखा ताई ने लगभग 14 वर्ष तक अध्यापन कार्य किया, उससे जो राशि मिलती थी, संगठन कार्य के विस्तार के लिए ही उन्होंने व्यय की। उनके लिए शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह चरित्र निर्माण का सशक्त माध्यम थी। उनका दृष्टिकोण व्यापक था। सामाजिक समरसता पर आज बात होती है लेकिन उनके जीवन में शुरू से ही समरसता समाहित थी। यह उनके व्यवहार में देखने को मिलता था। कभी अकेले कुछ नहीं खाया उन्होंने। सबको बांटकर ही खाने का उनका स्वभाव रहा।
आपातकाल में अदम्य साहस
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के चुनौतीपूर्ण काल यानी आपातकाल में जब चारों ओर भय और असुरक्षा का वातावरण था, तब रेखा ताई ने युवावस्था में निर्भीकता के साथ सत्याग्रह में सहभागिता की। संगठन कार्य में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें तीन माह पंद्रह दिन का कारावास सहना पड़ा। यह उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष को उजागर करता है, जिसमें सत्य के प्रति अडिगता, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष और राष्ट्रहित सर्वोपरि था।
प्रेरणा से जीवनधर्म की ओर
श्रेष्ठ चिंतक एवं विचारकों से प्राप्त प्रेरणा को उन्होंने केवल स्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे अपने जीवन का धर्म बना लिया। उनके लिए संगठन की कार्यपद्धति केवल संरचनात्मक अंग नहीं, बल्कि राष्ट्रशक्ति का जीवंत स्वरूप था। संगठन कार्य हेतु उनकी निर्णय क्षमता में बहुत ही आत्मविश्वास तथा दूरदर्शिता थी। रेखा ताई ने संगठन में अनेक महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। दिल्ली प्रांत प्राचारिका, उत्तर क्षेत्र प्रचारिका, अखिल भारतीय सेवा प्रमुख, अखिल भारतीय सह-कार्यवाहिका के माध्यम से उन्होंने देशभर में शाखा विस्तार, सेविकाओं का प्रशिक्षण, वैचारिक मार्गदर्शन तथा नेतृत्व निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ताई का दृढ़ विश्वास था कि जागृत नारी ही जागृत राष्ट्र की आधारशिला है। उन्होंने महिलाओं को राष्ट्रनिर्माण की केंद्रशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए सतत कार्य किया। उनके कार्य के प्रमुख आयामों में भारतीय संस्कृति का संरक्षण, चरित्र निर्माण, परिवार संस्था का सुदृढ़ीकरण, आत्मरक्षा, आत्मसम्मान तथा नेतृत्व क्षमता का विकास सम्मिलित थे।
देह का विलीन लेकिन अमर प्रेरणा
महान व्यक्तित्व भौतिक रूप से भले ही इह लोक से चले जाते हैं, किन्तु उनके विचार, संस्कार और कर्म सदैव जीवित रहते हैं। रेखा ताई का जीवनकार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए एक उज्ज्वल पथप्रदर्शक बना रहेगा। रेखा ताई दीपक नहीं, ध्रुवतारा थीं। दीपक क्षणिक हो सकता है, किन्तु ध्रुवतारा सदैव दिशा प्रदान करता है।
हे राष्ट्रसेवा की तपस्विनी, आपका जीवन हम सबके लिए प्रेरणा है। आपकी स्मृति और आपके संस्कार सदैव हमारे पथ को आलोकित करते रहेंगे। कृतज्ञ भाव से विनम्र श्रद्धांजलि।
(लेखिका राष्ट्र सेविका समिति की उत्तर क्षेत्र प्रचारिका हैं)

















