
भारत के प्राचीन इतिहास के प्रति वर्तमान सरकार का झुकाव कोई अचंभित करने वाला विषय नहीं है। इसी कड़ी में आगामी वित्त वर्ष का बजट प्रस्तुत करते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतरमण ने 15 पुरातात्विक स्थलों को उत्खनित व विकसित करने हेतु विशेष राशि आवंटित की है। इन पुरास्थलों में राखीगढ़ी, लोथल, धोलावीरा, आदिचिन्नलूर इत्यादि प्रमुख हैं। इन सभी पुरास्थलों में से एक राखीगढ़ी के लिए विशेष तौर पर 500 करोड़ रु. की राशि आवंटित की गई है। प्रश्न है कि राखीगढ़ी का ऐसा क्या महत्व है कि सरकार का झुकाव उसकी ओर अधिक है।
राखीगढ़ी हरियाणा के हांसी जिले में अवस्थित है। भारत की प्राचीनतम सरस्वती सिंधु सभ्यता का यह पुरास्थल ऋग्वेद में वर्णित दृष्दवति नदी के किनारे पर स्थित था। इस पुरास्थल की 1997 से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) द्वारा समय-समय पर खुदाई की जा रही है। हाल ही में हुए सघन पुरातात्विक सर्वेक्षण से यह ज्ञात हुआ है कि राखीगढ़ी नगर का कुल क्षेत्रफल 350 हेक्टेयर से अधिक था। यह विस्तार राखीगढ़ी को सरस्वती सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा नगर होना सिद्ध करता है। यहां यह बात भी उल्लेखनीय है कि राखीगढ़ी से कुछ दूरी पर ही सरस्वती नदी व दृष्दवति नदी का संगम अवस्थित था। यही कारण है कि सभ्यता का सबसे बड़ा नगर यहां स्थित था।
राखीगढ़ी का पुरास्थल कुल 11 टीलों में विभाजित है। यहां हुए पुरातात्विक उत्खननों के फलस्वरूप सरस्वती सिंधु सभ्यता के प्रारंभिक व विकसित काल के पुरावशेष प्रकाश में आए हैं। यहां से प्राप्त वैज्ञानिक तिथियों के अनुसार यहां 8000 वर्ष पूर्व से लेकर 4000 वर्ष पूर्व तक मानव बसाहट विद्यमान थी। सरस्वती सिंधु सभ्यता के परवर्ती काल के पुरावशेष हमें राखीगढ़ी से प्राप्त नहीं होते।
राखीगढ़ी की महत्ता इस वैज्ञानिक तथ्य में भी निहित है कि यहां मौजूद सरस्वती सिंधु सभ्यता के कंकालों के डीएनए अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि इन कंकालों में कोई मध्य एशियाई जीन मौजूद नहीं था। इस प्रकार जिन विद्वानों का यह मत था कि संभवतः सरस्वती सिंधु सभ्यता के लोग बाहरी थे, इस पर पूर्ण विराम लग गया है तथा यह सभ्यता पूर्णतः स्वदेशी सभ्यता थी।
‘आर्य आगमन’ के मिथक को सिद्ध करने के लिए सरस्वती सिंधु सभ्यता में घोड़े की अनुपस्थिति का मुद्दा उठाया जाता है। परंतु राखीगढ़ी में हुए पुरातात्विक उत्खनन से घोड़े की मृण्मूर्ति यानी मिट्टी से बनी मूर्ति प्रकाश में आई है। उत्खननकर्ता डॉ. अमरेन्द्र नाथ ने अपने शोधपत्र में इस विषय का उल्लेख किया है। यह इस बात की द्योतक है कि इस सभ्यता में घोड़ा पहले से ही विद्यमान था।
राखीगढ़ी उत्खनन से विभिन्न अर्ध कीमती पत्थर, जैसे-कार्नेलियन, अगेट, जैस्पर, लाजवर्द आदि के मनके प्राप्त हुए हैं। ये पत्थर गुजरात और अफगानिस्तान से यहां लाए जाते थे। यह पुरावशेष इस बात को प्रमाणित करते हैं कि यहां रहने वाले लोग दूरस्थ इलाकों तक व्यापार करते रहे होंगे। राखीगढ़ी में इन अर्ध कीमती पत्थरों का उपयोग कर मनके व आभूषण भी बनाए जाते थे। यहां तांबे की छेनियां भी प्राप्त हुई हैं। गौरतलब है कि तांबे की खदानें राखीगढ़ी के आसपास विद्यमान नहीं हैं। 2023-24 में डॉ. संजय मंजुल के नेतृत्व में हुए पुरातात्विक उत्खनन में राखीगढ़ी में एक स्टेडियम सरीखी संरचना के होने के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं। सरस्वती सिंधु सभ्यता में इसके पूर्व केवल गुजरात स्थित धोलावीरा से ही इस तरह की संरचना के प्रमाण मिले हैं।
वर्तमान समय में भी राखीगढ़ी में उत्खनन जारी है। यह उत्खनन टीला क्रमांक 1,2 व 3 पर किया जा रहा है। उत्खनन अगले 3 वर्ष तक होना है। टीला संख्या 3 में पूर्व में उत्खनित स्थल को शेड लगा कर आम जनता के लिए खोला गया है। सरकार का भी यही विचार है कि आगामी समय में यहां के सभी उत्खनित टीलों को शेड लगाकर आम जनता के लिए खुला ही रखा जाए जिससे वे अपने गौरवशाली अतीत व राखीगढ़ी के प्राचीन नगर को अपनी आंखों से देख सकें। इस प्रकार राखीगढ़ी की महत्ता को देखते हुए सरकार का उस पर विशिष्ट ध्यान न्यायसंगत है।
(लेखक शहीद भगत सिंह महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के प्राध्यापक हैं)