सैदपुर गांव : हर मोर्चे पर
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सैदपुर गांव : हर मोर्चे पर

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले का सैदपुर गांव देशभक्ति और वीरता की परंपरा के लिए जाना जाता है। यह गांव वर्षों से “फौजियों के गांव” के रूप में प्रसिद्ध है, जहां लगभग हर परिवार का कोई न कोई सदस्य सेना से जुड़ा रहा है।

Written byआदित्य भारद्वाजआदित्य भारद्वाज
Mar 18, 2026, 08:32 am IST
in विश्लेषण, उत्तर प्रदेश
गांव में मिलिट्री हीरोज के नाम पर बना इंटर कॉलेज

गांव में मिलिट्री हीरोज के नाम पर बना इंटर कॉलेज

भारत की धरती को “वीरभोग्या वसुंधरा” कहा गया है, क्योंकि इस भूमि ने अनगिनत वीर सपूतों को जन्म दिया है। देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले सैनिकों की कहानियां भारतीय इतिहास का गौरव हैं। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में स्थित सैदपुर गांव भी ऐसी ही वीरता की परंपरा का प्रतीक माना जाता है। यहां के लोगों ने वर्षों से सेना में सेवा देकर देश की रक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। दिल्ली से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित यह गांव “फौजियों के गांव” के नाम से प्रसिद्ध है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यहां के युवक मजबूत कद-काठी और साहसी स्वभाव के होते हैं। इसी कारण अंग्रेजी शासन के समय भी सैदपुर के युवकों को सेना में भर्ती के लिए विशेष प्राथमिकता दी जाती थी। यही वजह है कि गांव के अधिकांश परिवारों का संबंध सेना से रहा है और पीढ़ियों से यहां के युवक फौज में भर्ती होते आए हैं।

सैदपुर गांव का सैन्य इतिहास प्रथम विश्व युद्ध से भी जुड़ा हुआ है। उस समय अंग्रेजों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों से सैनिकों को विदेश भेजना शुरू किया था। समुद्र पार जाकर युद्ध लड़ने को लेकर उस समय कई लोगों में संकोच था, लेकिन सैदपुर गांव के 155 युवकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जर्मनी में जाकर युद्ध लड़ा। वहां इन सैनिकों ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। इस युद्ध में गांव के 29 जवान वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि कुछ वहीं बस गए और शेष वापस लौट आए। आज भी गांव के बुजुर्ग गर्व के साथ इस इतिहास को याद करते हैं। आजादी के बाद भी सैदपुर के सैनिकों ने हर युद्ध में देश के लिए वीरता का परिचय दिया। चाहे 1962 का भारत-चीन युद्ध हो या 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध-हर मोर्चे पर गांव के जवानों ने साहस और शौर्य का प्रदर्शन किया। आतंकवाद विरोधी अभियानों में भी यहां के सैनिकों ने अपनी जान की बाजी लगाई है।

1965 के भारत-पाक युद्ध में गांव के कैप्टन सुखबीर सिंह खेमकरण सेक्टर में लड़ते हुए शहीद हो गए थे। उस समय तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी स्वयं उनका अस्थि कलश लेकर गांव पहुंची थीं। इसी प्रकार 1971 के युद्ध में विजय सिरोही और मोहन सिरोही एक ही दिन शहीद हुए थे। करगिल युद्ध में भी गांव के जवान सुरेंद्र सिंह ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।

गांव के बीचोंबीच एक शहीद स्मारक बनाया गया है, जिस पर उन सभी वीर सैनिकों के नाम अंकित हैं जिन्होंने देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। यहां से गुजरते समय गांव के लोग स्वाभाविक रूप से सिर झुकाकर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं। सूबेदार मेजर रतन सिंह ( सेनि.) बताते हैं कि गांव में बड़ी संख्या में सेवानिवृत्त सैनिक रहते हैं। गांव में ऐसे कई परिवार हैं जिनकी कई पीढ़ियां सेना में सेवा कर चुकी हैं। यहां के युवाओं के लिए सेना में भर्ती होना केवल नौकरी नहीं, बल्कि देशभक्ति और कर्तव्य का प्रतीक माना जाता है।

देश के लिए समर्पण और बलिदान की यह परंपरा सैदपुर गांव को एक अलग पहचान देती है। यही कारण है कि इसे वीरों की धरती और सैनिकों के तीर्थस्थल के रूप में भी देखा जाता है।

Topics: विजय सिरोहीशहीद सुरेंद्र सिंहशहीद स्मारकसैन्य संस्कृतिजैविक खेतीमिलिट्री हीरोज इंटर कॉलेजपाञ्चजन्य विशेषवीरता की परंपरावीरों की धरतीसाहसी स्वभावसर्वोच्च बलिदानगो-सेवाफौजियों का गांवशौर्य और देशभक्तिसैनिकों का तीर्थस्थलवीरभोग्या वसुंधराकैप्टन सुखबीर सिंह
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