बिहार के गया जिले में बनकट गांव है, जो जिला मुख्यालय से लगभग 50 किमी दूर आमस प्रखंड की चिलमी कला पंचायत का हिस्सा है। बात-बात पर थाना और न्यायालय का चक्कर काटने वालों के लिए यह गांव एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस गांव में गत 112 वर्ष से कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। गांव में कोई व्यक्ति नशा नहीं करता है। सारे फैसले मिल-जुल कर लिए जाते हैं। इस छोटे से गांव में दर्जनों युवतियां स्नातक हैं। सेवानिवृत्त पुलिस इंस्पेक्टर अजीत कुमार सिंह इस गांव को एक आदर्श मानते हैं। उनके अनुसार, “आजादी के बाद से गांव का कोई मुकदमा थाने के रिकार्ड में नहीं है। पंचायत का निर्णय ही अंतिम होता है।”
एक और खास बात यह कि गांव में सार्वजनिक स्थलों की सफाई ग्रामीण स्वयं करते हैं। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि 1914 के सर्वे में बाहर से आकर बसे तुलसी यादव, मुंगेशर यादव, नथुनी यादव एवं सजीवन यादव के घरों का ही अस्तित्व था। उस समय चारों ओर जंगल था, जिसे काटकर खेती योग्य भूमि बनाई गई। इसी कारण गांव का नाम बनकट पड़ गया।
अभी गांव की आबादी लगभग 300 है। इस गांव के लोगों को आपसी भाईचारे और संस्कार पर गर्व है। यह गांव पूरी तरह से अपराध और नशामुक्त है। बुजुर्गों में कुछ लोग सिर्फ खैनी खाते हैं। वैसे भी बिहार में चाय, खैनी और पान को लोग नशा की श्रेणी में नहीं रखते। गांव के लोगों का सुख-दुख साझा होता है और यही इस गांव की विशेषता है। यह गांव दूसरे गांव के लिए उदाहरण प्रस्तुत करता है कि अगर आपसी भाईचारा के साथ रहेंगे तो सभी खुशहाल रहेंगे।
ग्रामीण ओमप्रकाश यादव कहते हैं, ”भाई-भाई व पति-पत्नी के बीच मनमुटाव कहां नहीं होते? अगर ऐसे मामले सामने आ भी गए तो उसे गांव से आगे बढ़ने नहीं दिया जाता है। कोई बड़ा झगड़ा तो होता ही नहीं।” ग्रामीण धनंजय कुमार बताते हैं, ”किसी विवाद के निपटारे के लिए गांव के सामुदायिक भवन में पंचायत बैठती है। एक व्यक्ति को मध्यस्थता की जिम्मेदारी दी जाती है। दोनों पक्ष बारी-बारी से अपनी बात रखते हैं। फिर, पंचायत के पांच सदस्य अलग होकर विचार-विमर्श करते हैं। इसके बाद लिया गया उनका मौखिक फैसला सर्वमान्य होता है।” चिलमी कला पंचायत के मुखिया महेंद्र पासवान कहते हैं, ”गांव में भाईचारा इतना अच्छा है कि कोई मामला पंचायत से बाहर नहीं जाता है। यही इस गांव की विशेषता है और पहचान भी।”
यहां विवाद सुलझाने का तरीका भी अनुकरणीय है। आरोप सिद्ध होने पर आरोपी पर आर्थिक दंड लगाया जाता है। एक निर्धारित समय-सीमा के अंदर आरोपी को दंड का पैसा समाज को देना पड़ता है। आरोपी पैसा देने में असमर्थ होता है, तो उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाता है। लोग उसके घर से खान-पान नहीं करते हैं। हालांकि ऐसी परिस्थिति किसी आरोपी के साथ अभी तक नहीं आई है। ग्रामीणों के द्वारा एकत्रित पैसों का उपयोग जरूरतमंदों या आर्थिक रूप से कमजोर ग्रामीण को मदद पहुंचाने के लिए होता है। गरीब परिवारों के शादी—विवाह मेें भी इस पैसे को खर्च किया जाता है।
इन कारणों से गांव में एक अलग माहौल रहता है। सभी एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखते हैं। इस कारण कभी कोई विवाद भी नहीं होता है।

















