जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI) यूनिवर्सिटी एक बार फिर विवादों में घिर गई है। आरोप है कि विश्वविद्यालय ने अत्यंत विवादास्पद तरीके से शिक्षकों की नियुक्तियां की हैं। योग्य उम्मीदवारों की अनदेखी करते हुए ऐसे व्यक्तियों को प्राथमिकता दी है जिनकी पृष्ठभूमि संदिग्ध मानी जाती है, शैक्षणिक अंक अपेक्षाकृत कम हैं, और जिनका संबंध वामपंथी या विवादास्पद राजनीतिक आंदोलनों से बताया जाता है। ऐसा मामला जामिया के तुलनात्मक धर्म केंद्र (सेंटर फॉर कम्पेरेटिव रिलिजन) में चिंगिज खान की सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति का है। नियुक्ति जनवरी 2026 की बताई जा रही है।
चिंगिज़ खान को लेकर यह हैं आरोप
चिंगिज़ खान को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के सेंटर फॉर कम्पेरेटिव रिलिजन में स्थायी सहायक प्रोफेसर के रूप में जनवरी 2026 में नियुक्त किया गया
आवश्यक विशेषज्ञता के बिना संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) आधार पर सहायक प्रोफेसर के रूप में जुलाई 2025 में नियुक्त किया गया था। यह भी आरोप है कि उनकी नियुक्ति को सुगम बनाने के लिए पात्रता मानकों में बदलाव किया गया
चिंगिज खान की संविदा में नियुक्ति से पूर्व 17 मार्च 2025 को जामिया के कुलपति प्रो. मजहर आसिफ के साथ एक शोध पत्र जामिया से प्रकाशित सेज पब्लिकेशन का जर्नल ‘History and Sociology of South Asia’ किया जिसका शीर्षक है- “Tracing the Historical Roots of Muslims’ Settlement and Migration in Northeast India: A Case Study of Assam and Manipur”। यह शोध पत्र प्रो. आसिफ के कुलपति कार्यकाल के दौरान प्रकाशित हुआ।
चिंगिज खान को मणिपुर पुलिस ने किया था गिरफ्तार
अप्रैल 2020 में मणिपुर पुलिस ने चिंगिज खान को गिरफ्तार किया था और देशद्रोह, वैमनस्य फैलाने, सार्वजनिक शरारत (public mischief) और आपराधिक षड्यंत्र जैसे आरोप लगाए गए थे। ये आरोप Ichel Express अख़बार में लिखे गए एक लेख से जुड़े थे, जिसमें उन्होंने मणिपुर में पंगल मुसलमानों के उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
जेएनयू छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी घोष ने द्विटर पर चिंगिज़ खान की एक तस्वीर साझा की थी, जिसमें वह ब्रिटिश पत्रकार राल्फ विंस्टन फॉक्स द्वारा लिखित पुस्तक “Genghis Khan” हाथ में लिए हुए दिखाई दे रहे थे।
चिंगिज खान ने खेले त्री बेंगून अवा चिंग में चलाए गए अतिक्रमण हटाने (eviction drive) अभियान को लेकर भाजपा सरकार की आलोचना भी की थी।
सरकारी मापदंड के उल्लंघन का भी आरोप
कहा जा रहा है कि इस तरह की नियुक्ति सरकारी मापदंडों और यूजीसी के गाइडलाइंस का उल्लंघन है। हालांकि इस संबंध में जामिया की ओर से कोई बयान जारी नहीं किया गया है।















