भारत में घटती जन्म दर पर अलर्ट! जनसंख्या पर 1952 का अभियान, आपातकाल और अब आंध्र सरकार का आदेश
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भारत में घटती जन्म दर पर अलर्ट! जनसंख्या पर 1952 का अभियान, आपातकाल और अब आंध्र सरकार का आदेश

भारत में जनसंख्या नियंत्रण नीति 1952 से अब तक कई बदलावों से गुजरी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार प्रजनन दर घटकर लगभग 2 के करीब पहुंच गई है, जिस पर आंध्र प्रदेश सरकार ने चिंता जताई है।

Written byराजेश शांडिल्यराजेश शांडिल्य — edited by Shivam Dixit
Mar 9, 2026, 10:00 pm IST
inविश्लेषण

भारत में जनसंख्या नियंत्रण का मुद्दा आजादी के बाद से ही नीति, समाज और राजनीति के केंद्र में रहा है। हाल ही में आंध्र प्रदेश सरकार ने चिंता जताते हुए एक निर्णय लिया है, जो एक चेतावनी भी है। कहीं ना कहीं लग रहा है कि भारत की स्वतंत्रता के करीब 5 साल बाद राष्ट्रीय स्तर पर विश्व में पहली बार शुरु हुआ एक अभियान और आपातकाल (1975–1977) के मध्य जो हुआ, उसके साइड इफैक्ट का नतीजा है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन किए जाने वाले राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि देश में कुल प्रजनन दर पिछले वर्षों में लगातार घटी है।

घटती प्रजनन दर से बदलती जनसंख्या संरचना की चिंता

यह आंकड़े चिंताजनक इसलिए हैं,सक्योंकि कुछ राज्यों में यह दर दो से भी नीचे चली गई है, जिससे भविष्य में जनसंख्या संरचना बदलने की संभावना दिखती है। इस कारण नीति निर्माताओं के सामने नई चुनौती है, ताकि जनसंख्या नियंत्रित रखने के साथ साथ संतुलन भी रहे। इसी संदर्भ में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू ने भी यह चिंता व्यक्त की है कि यदि जन्म दर लगातार घटती रही तो आने वाले समय में युवाओं की संख्या कम हो सकती है। नायडू सरकार ने गिरती जन्म दर को देखते हुए दूसरे या तीसरे बच्चे के जन्म पर 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता,तीसरे बच्चे के लिए 5 वर्ष तक हर माह करीब 1000 रुपये और शिक्षा जैसी सुविधाएं देने का प्रस्ताव रखा है। इस निर्णय के साथ कई राज्यों में अब जनसंख्या नियंत्रण के ढर्रे के साथ संतुलन रखने पर भी चर्चा तेज हुई है।

1952 में शुरू हुआ राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम

दरअसल भारत ने वर्ष 1952 में राष्ट्रीय स्तर पर परिवार नियोजन कार्यक्रम आरंभ किया था, जिसे उस समय विश्व में इस प्रकार का पहला सरकारी प्रयास माना गया। शुरुआती वर्षों में सरकार का उद्देश्य लोगों को छोटे परिवार के लाभ समझाना था। रेडियो, पोस्टर और दीवार लेखन के माध्यम से व्यापक प्रचार किया गया और गढ़े जा रहे थे,परिवार नियोजन अपनाइए, छोटा परिवार, सुखी परिवार, कम बच्चे, खुशहाल जीवन और परिवार छोटा, जीवन बडा जैसे नारे। इसी काल में परिवार नियोजन का प्रतीक लाल त्रिकोण भी अपनाया गया, जो आज भी स्वास्थ्य सेवाओं से जुडे केंद्रों पर दिखता है।

70 के दशक में आक्रामक अभियान और आपातकाल का प्रभाव

70 के दशक में जनसंख्या वृद्धि को लेकर चिंता बढ़ने लगी और अभियान अधिक आक्रामक रूप में सामने आया। हम दो, हमारे दो, दो या तीन बस, छोटा परिवार, देश का उपकार और बच्चे दो ही अच्छे जैसे नारे पूरे देश में फैलाए गए, लेकिन आपातकाल के समय जब नसबंदी को प्रशासनिक दबाव के साथ लागू किया, तो विरोध और असंतोष की स्थिति पैदा हुई और तत्कालीन सरकार को राजनीतिक तौर पर क्षति हुई। इसका प्रभाव लंबे समय तक महसूस किया गया। आज 2026 में भी जब जनसंख्या नियंत्रण से जुडी किसी सख्त नीति की चर्चा होती है, तो आपातकाल का उदाहरण के रुप में सामने होता है।

आपातकाल के बाद नीति में बदलाव और जागरूकता पर जोर

हालांकि आपातकाल के बाद सरकार ने नीति में बदलाव किया और अस्सी तथा नब्बे के दशक में जोर जागरूकता, मातृ स्वास्थ्य और बाल स्वास्थ्य पर दिया गया। दो बच्चे, उज्ज्वल भविष्य और परिवार कल्याण, देश कल्याण जैसे संदेशों के माध्यम से लोगों को स्वेच्छा से छोटा परिवार अपनाने के लिए प्रेरित किया था,मगर 21 वीं सदी में जनसंख्या संतुलन को लेकर आंध्र प्रदेश ही नहीं अन्य राज्यों में भी नई चर्चाएं शुरू हो रही है।

…तब औसतन 6 बच्चों को जन्म देती थीं एक महिला

आजादी के समय एक महिला औसतन लगभग छह बच्चों को जन्म देती थी, जबकि हाल के सर्वेक्षणों के अनुसार यह दर घटकर लगभग दो बच्चों के आसपास आ गई है। आंध्र प्रदेश में यह दर इससे भी कम, लगभग डेढ से दो के बीच दर्ज की गई है।

विशेषज्ञ मानते हैं यह कारण

आंकडों से स्पष्ट है कि भारत में जनसंख्या वृद्धि की गति धीरे धीरे नियंत्रित हो रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका मुख्य कारण शिक्षा का प्रसार, महिलाओं का सशक्तिकरण, शहरीकरण, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और आर्थिक परिवर्तन हैं।

1952 से 2026 तक कई उतार चढ़ाव

इस प्रकार 1952 के परिवार नियोजन अभियान से लेकर 2026 तक भारत की जनसंख्या नीति ने कई उतार चढाव देखे हैं, नारों से लेकर विवादों तक और कठोर उपायों से लेकर जागरूकता आधारित दृष्टिकोण तक। लेकिन अनुभव यही बताता है कि स्थायी परिणाम तभी मिलते हैं जब सामाजिक और आर्थिक विकास साथ साथ आगे बढता है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट

  • -1950 का दशक : लगभग 5.9 से 6 बच्चे प्रति महिला
  • -1970 का दशक : लगभग 5.2
  • -1990 का दशक : लगभग 3.9
  • -2005 के आसपास : लगभग 2.9
  • -2015 के आसपास : लगभग 2.3
  • -2019–21में लगभग 2.0
  • -2026 तक कुल प्रजनन दर लगभग 1.9 से 2.0 के आसपास
  • -जो जनसंख्या को स्थिर रखने के स्तर के करीब
  • -जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए चाहिये लगभग 2.1 की दर
Topics: भारत प्रजनन दरपरिवार नियोजन अभियानIndia population control policydeclining birth rate Indiafertility rate India NFHS dataराष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)Chandrababu Naidu birth rate concernPopulation policy IndiaIndia family planning history 1952भारत जनसंख्या नीतिpopulation growth India analysisजनसंख्या नियंत्रण भारतजन्म दर भारतचंद्रबाबू नायडू जनसंख्या बयान
राजेश शांडिल्य
राजेश शांडिल्य
वरिष्ठ पत्रकार [Read more]
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