इंदौर की प्रसिद्ध गेर: रंगपंचमी पर रंगों का अद्भुत उत्सव
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इंदौर की प्रसिद्ध गेर: रंगपंचमी पर रंगों का अद्भुत उत्सव

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में रंगपंचमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। स्वच्छता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध इंदौर अपनी जीवंत परंपराओं के लिए भी जाना जाता है।

Written byकैलाश विजयवर्गीयकैलाश विजयवर्गीय — edited by Mahak Singh
Mar 9, 2026, 11:56 am IST
in मध्य प्रदेश
प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

भारतीय त्योहार अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं के कारण विश्वभर में अलग पहचान रखते हैं। कुछ त्योहार जैसे दीपावली, दशहरा, होली पूरे देश में मनाए जाते हैं और कुछ क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान के रूप में विकसित हो जाते हैं- जैसे-  पंजाब में लोहड़ी, नागालैंड में हॉर्नबिल, दक्षिण में ओणम और पोंगल, तथा बंगाल में दुर्गा पूजा अपनी विशेष पहचान रखते हैं। इसी तरह रंगपंचमी का त्योहार, जो होली के पाँच दिन बाद मनाया जाता है- मालवा, विशेष रूप से इंदौर की पहचान बन चुका है। द्वापर युग में इसी तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी ने रंगोत्सव मनाया था और देवताओं ने उन पर पुष्पवर्षा की थी। तब से इसे देव पंचमी भी कहा जाता है।

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में रंगपंचमी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। स्वच्छता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध इंदौर अपनी जीवंत परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। यहाँ रंगपंचमी के अवसर पर निकलने वाली ‘गेर’ इसी समृद्ध परंपरा और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। ‘गेर’ शब्द का अर्थ है- इकट्ठा होना या किसी को घेर लेना।

इंदौर में गेर की परंपरा का इतिहास होलकर राजवंश के समय से जुड़ा हुआ है। उस दौर में रंगपंचमी के दिन ‘फाग यात्रा’ के रूप में गेर निकाली जाती थी। उत्सव की शुरुआत 20 तोपों की सलामी से होती थी और इसके बाद शाही परिवार के सदस्य आम जनता के साथ बिना किसी भेदभाव के सड़कों पर होली खेलते थे। यह परंपरा समाज में समानता और भाईचारे का संदेश देती थी।

ऐतिहासिक परंपरा से आधुनिक उत्सव तक

समय के साथ यह परंपरा कुछ समय के लिए कमज़ोर पड़ी, लेकिन 1950 के दशक में इंदौर के प्रसिद्ध टोरी कॉर्नर क्षेत्र से मिल मजदूरों और उनके नेताओं ने इसे फिर से शुरू किया। उस समय लोग राहगीरों को रंग लगाकर उन्हें उत्सव में शामिल करते थे और रंग-गुलाल उड़ाते हुए समूह के रूप में राजवाड़ा तक पहुँचते थे। शुरुआती दौर में यह यात्रा बैलगाड़ियों पर रंग-गुलाल और फूलों के साथ निकाली जाती थी। धीरे-धीरे यह आयोजन शहर की प्रमुख सांस्कृतिक परंपरा बन गया और इसकी पहचान देश-विदेश तक फैल गई।

आज इंदौर की गेर एक विशाल और भव्य जुलूस का रूप ले चुकी है। इसका मुख्य केंद्र इंदौर का ऐतिहासिक राजवाड़ा चौक होता है, जहाँ से यह जुलूस शहर के प्रमुख मार्गों से होकर गुजरता है। इस दौरान बड़े वाहनों और टैंकरों में रंग, गुलाल और पानी के फव्वारे लगाए जाते हैं। आसमान में उड़ता गुलाल, रंगीन पानी की बौछारें और ढोल-नगाड़ों की गूँज पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देती हैं। हजारों लोग नाचते-गाते इस जुलूस में शामिल होते हैं और पूरा शहर रंगों से सराबोर हो जाता है।

गेर की सबसे बड़ी विशेषता इसका सामाजिक संदेश है। यह उत्सव धर्म, जाति, लिंग और आर्थिक स्थिति के भेदभाव से परे सभी लोगों को एक साथ जोड़ता है। जैसे अलग-अलग रंग मिलकर एक सुंदर चित्र बनाते हैं, वैसे ही विभिन्न समुदाय मिलकर समाज की एकता को मजबूत करते हैं। इसी कारण गेर को सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है। इसमें शहर के सभी क्षेत्रों के नेतृत्वकर्ता-सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक-बिना भेदभाव के सम्मिलित होते हैं।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण और जन-भागीदारी

कभी-कभी हम अपने त्योहारों की मूल भावना और संदेश से विचलित हो जाते हैं और सांस्कृतिक उत्सव को पश्चिमी सभ्यता के फूहड़पन में बदलने लगते हैं। मुझे स्मरण है कि 1990 के दशक में गेर की प्रकृति अपनी मूल भावना से कुछ भटक गई थी—इसमें अश्लीलता और फूहड़पन ने जगह बना ली थी। तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मालवा प्रांत के तत्कालीन प्रचारक जी ने बैठक बुलाकर इसमें अश्लीलता समाप्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने एक पूर्ण सांस्कृतिक गेर निकालने का संकल्प लिया और इसकी जिम्मेदारी मुझे, स्वर्गीय लक्ष्मण सिंह गौड़, कैलाश शर्मा, शंकर यादव, पुष्पेंद्र धनोतिया, मुकेश जैन इत्यादि लोगों को सौंपी। हमने शहर में पहली बार पूर्ण धार्मिक-सांस्कृतिक गेर, “राधा-कृष्ण गेर” के रूप में निकाली, जिसका नेतृत्व स्वर्गीय लक्ष्मण सिंह गौड़ ने किया था। इस गेर में पहली बार शहर की लगभग 2,000 महिलाएँ शामिल हुईं, जिनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संघ के स्वयंसेवकों ने संभाली। इस प्रकार गेर अपने मूल स्वरूप में लौटी और समाज के हर वर्ग का विश्वास पुनः इसमें जागा।

“इंदौर की गेर”

समय के साथ इस उत्सव में आधुनिक संगीत और तकनीक का भी समावेश हुआ है, लेकिन इसकी पारंपरिक आत्मा आज भी कायम है। “इंदौर की गेर” की सबसे बड़ी विशेषता, लोगों का इसमें स्वप्रेरणा से शामिल होना है। वर्षों से इस परंपरा की निरंतरता को इंदौर के लोगों ने जन-भागीदारी से बनाए रखा है। गेर का नेतृत्व, प्रबंधन और संचालन इंदौर के लोगों द्वारा ही होता है; प्रशासन केवल सहयोगी के रूप में उपस्थित रहता है। गेर में सम्मिलित होना हर इंदौरी के लिए उल्लास, उत्सव और गर्व की बात है। जो शामिल नहीं हो पाते, वे अपने घरों की छत से जुलूस को निकलते देख उन पर रंग-गुलाल उड़ाकर आनंदित होते हैं। जुलूस देखने के लिए अब घरों की छतें किराए पर देने की व्यवस्था भी होने लगी है और इसकी बुकिंग विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म से भी की जा सकती है। छत पर बैठक व्यवस्था, प्राकृतिक रंग-गुलाल के साथ आतिथ्य-सत्कार पर्यटकों को विशेष आनंद प्रदान करता है।

यही कारण है कि हर वर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक इस अनूठे उत्सव को देखने इंदौर पहुँचते हैं, जिससे होटल, परिवहन और स्थानीय व्यापार को भी लाभ होता है। इस आयोजन को सुव्यवस्थित और सुरक्षित बनाने के लिए विशेष प्रबंध किए जाते हैं।

वर्ष 2025 में लगभग 5 लाख लोग गेर में शामिल हुए थे। भीड़ के हटने के बाद चारों ओर जूते-चप्पल, डिस्पोजल, रंग और गुलाल फैले हुए थे। नगर निगम के लिए इंदौर शहर की स्वच्छता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती थी, किंतु मात्र 38 मिनट में पूरे राजवाड़ा क्षेत्र की सफाई कर नगर निगम ने इतिहास रच दिया। इस बार भी गेर में बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की संभावना है, लेकिन हमारे इंदौर ने हर्ष और उल्लास को पर्यावरण एवं स्वच्छता के साथ मनाने की परंपरा को सुदृढ़ किया है।

वैश्विक पहचान की ओर

इंदौर की इस अनोखी परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए इसे यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल कराने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। यदि यह प्रयास सफल होता है, तो गेर उत्सव विश्व स्तर पर भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के रूप में और अधिक प्रसिद्ध हो जाएगा।

कुल मिलाकर, इंदौर की गेर केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि एकता, उल्लास और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यह परंपरा हर वर्ष नए उत्साह के साथ मनाई जाती है और लोगों को यह संदेश देती है कि जीवन में रंगों की तरह विविधता और मेल-मिलाप भी उतना ही आवश्यक है। जब रंग बिखरते हैं, तो चारों ओर उत्सव का वातावरण बन जाता है और यही गेर की असली पहचान है।

Topics: Indore's Cultural FestivalGer Festival Indore HistoryIndore's GerIndore's Rangpanchami GerRangpanchami IndoreIndore Ger FestivalRajwada Ger IndoreRangpanchami Ger TraditionIndore's Ger FestivalMalwa's RangpanchamiHistory of Rangpanchami
कैलाश विजयवर्गीय
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