महिला दिवस पर विशेष: नारी सशक्तिकरण का स्वर्णयुग था ऋग्वैदिक काल
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महिला दिवस पर विशेष: नारी सशक्तिकरण का स्वर्णयुग था ऋग्वैदिक काल

महिला दिवस विशेष: ऋग्वेद और उपनिषदों में वर्णित महान ऋषिकाओं का योगदान। वैदिक काल में नारी को शिक्षा, दर्शन और आध्यात्मिकता में बराबरी का अधिकार – आज के लिए प्रेरणा।

Written byपूनम नेगीपूनम नेगी — edited by कुलदीप सिंह
Mar 8, 2026, 11:11 am IST
in विश्लेषण
Women in Vedic period

प्रतीकात्मक तस्वीर

समूचे विश्व की स्त्री शक्ति को सम्मान और उनके श्रम, समर्पण और संघर्ष को आदर देने तथा महिला अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने और समाज में उन्हें बराबरी का अधिकार दिलाने के मकसद से प्रति वर्ष 8 मार्च को ‘’महिला दिवस’’ मनाया जाता है। इस परिप्रेक्ष्य में यदि हम अपने भारत देश की बात करें तो पाएंगे कि वर्तमान के सशक्त भारत की सर्वतोमुखी प्रगति में देश की मातृशक्ति प्रत्येक क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है। विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय महिलाओं की विशाल उपलब्धियों की सुदीर्घ श्रृंखला हमें गौरवान्वित करती है।

आज समाज के एक बड़े वर्ग को यह लगता है कि यह नारी सशक्तिकरण विगत कुछ वर्षों की ही उपलब्धि है; परन्तु यह सोच पूरी तौर पर गलत व निराधार है। वैदिक साहित्य के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि ऋग्वैदिक काल प्राचीन भारतीय संस्कृति और सभ्यता का वह कालखंड है जो सभ्यता, समृद्धि, ज्ञान-विज्ञान और उत्कृष्ट संस्कृति के परिपेक्ष्य में ही नहीं, वरन नारी की सामाजिक स्थिति, भूमिका और अधिकार की दृष्टि से भी भारत का ही नहीं; सम्पूर्ण विश्व का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है।

स्त्री शक्ति के महिमागान से भरा पड़ा है वैदिक साहित्य

मनुस्मृति (3/56) का सुप्रसिद्ध सूक्त ‘’यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता’’ इस बात का प्रमाण है कि वैदिक भारत में महिलाओं की स्थिति कितनी सम्मानजनक व गौरवपूर्ण थी। हिन्दू जीवन पद्धति की इस आदर्श आचार संहिता में स्पष्ट लिखा है कि जिस परिवार में स्त्रियां अपने पति व परिजनों के अत्याचार से पीड़ित रहती हैं, वह कुल शीघ्र नष्ट हो जाता है (मनुस्मृति 3/57)। वैदिक साहित्य के विविध उद्धरण इस बात को प्रमाणित करते हैं कि प्राचीन भारत की महान नारियों ने अपनी दूरदर्शी बुद्धिमत्ता, अदभुत साहस, मानवीय संवेदना तथा दया, करुणा व वात्सल्य जैसे के गुणों के आधार पर अनेक कीर्तिमान स्थापित किये थे।

‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’-मनुस्मृति

‘मनुस्मृति’ में भारतीय संस्कृति में स्त्री की उच्च स्थिति के सैकड़ों उदाहरण मिलते हैं। प्रायः लोग समझते हैं कि पुत्र व पुत्री की समानता इस अत्याधुनिक इक्कीसवीं सदी का नारा है, परन्तु सच यह है कि मनु महराज ने ‘‘पुत्रेण दुहिता समा’’ (मनुस्मृति 9/130) कहकर पुत्र-पुत्री की समानता वैदिक काल में ही घोषित कर दी थी। उन्होंने पिता व पति दोनों के कुलों का हित करने वाली कन्या को ‘दुहिता’ (दू+हिता) का संबोधन देकर सदियों पूर्व स्त्रीशक्ति का जो गौरवगान किया था; खेद का विषय है कि हिन्दू द्वेषी वामपंथी विचारकों ने उस ‘दुहिता’ शब्द का अर्थ दोहन से जोड़ दिया। वाकई तरस आता है इनकी इस क्षुद्र बुद्धि पर। यदि तदयुगीन समाज में महिलाओं के पारिवारिक व सामाजिक अधिकारों की बात करें तो उस युग में स्त्री की सत्ता इतनी ऊँची थी कि संतानें अपनी माँ के नाम से जानी जाती थीं; जैसे कौशल्यानंदन, सुमित्रानंदन, देवकीनंदन, कौन्तेय व गंगापुत्र आदि।

मनुस्मृति में नारी अपराध पर दंड के कड़े विधान

इसी तरह पत्नी का नाम पति से पहले रखा जाता था- लक्ष्मीनारायण,  गौरीशंकर, सीताराम, राधाकृष्ण इत्यादि। क्या किसी अन्य धर्म संस्कृति नारी को मान देने के ऐसे उदाहरण मिलते हैं? दरअसल हमारा समूचा वैदिक साहित्य स्त्री शक्ति के महिमागान से भरा पड़ा है। मनुस्मृति (8/323, 9/232, 8/342) में नारियों के प्रति किये जाने वाले हत्या, अपहरण, बलात्कार आदि अपराधों के लिए मृत्युदंड एवं देश निकाला जैसी कठोर सजाओं का प्रावधान मिलता है। किन्तु मनु महराज नारी की असुरक्षित व अमर्यादित स्वतन्त्रता के पक्षधर नहीं थे; इसीलिए उन्होंने स्त्रियों को पिता, पति, पुत्र व भाई आदि की सुरक्षा में रहने को कहा था (मनुस्मृति5/149, 9/5-6)। इसके पीछे उनका मूल मकसद नारी की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना था न कि उनके स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन।

इसे भी पढ़ें: कांग्रेस-AIUDF का गुप्त गठबंधन, असम में वोट विभाजन की साजिश

वेदों और उपनिषदों की महान ऋषिकाएं

वेदों और उपनिषदों में अनेक ऋषिकाओं का वर्णन मिलता है, जिन्होंने दर्शन, ज्ञान और आध्यात्मिकता के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया था। इन ऋषिकाओं ने न केवल वैदिक ज्ञान को संरक्षित और प्रचारित किया, बल्कि समाज में नारी की  सम्मानजनक को भी पोषित किया था। ‘गार्गी वाचक्नवी’ को भारत की पहली विदुषी महिला दार्शनिकों में गिना जाता है। वह ऋषि वाचक्नव की पुत्री थीं और उन्होंने वेदों का गहन अध्ययन किया था। बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित याज्ञवल्क्य के साथ उनके संवाद से स्पष्ट होता है कि वह वेदांत और ब्रह्मविद्या में पारंगत थीं। उन्होंने ब्रह्म (परम सत्य) से जुड़े गूढ़ प्रश्न पूछकर दर्शन की गहरी अवधारणाओं को स्पष्ट किया था। इसी तरह ऋषि याज्ञवल्क्य की पत्नी ‘मैत्रेयी’ ज्ञान और आध्यात्मिकता की मूर्ति थीं।

उन्होंने भौतिक संपत्ति की तुलना में आत्मज्ञान को अधिक महत्व दिया। जब याज्ञवल्क्य ने उन्हें धन और ज्ञान में से किसी एक को चुनने का अवसर दिया तो उन्होंने आत्मज्ञान को प्राथमिकता दी थी। ऋषि अगस्त्य की पत्नी ‘लोपामुद्रा’ एक विदुषी और कवयित्री थीं। उन्होंने ऋग्वेद के कुछ मंत्रों की रचना की और स्त्री-पुरुष संबंधों में संतुलन और पारिवारिक मूल्यों पर विशेष ध्यान दिया था। उनकी शिक्षाएँ आज भी पारिवारिक सौहार्द और संतुलन की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। ऋग्वेद की प्रसिद्ध ऋषिका ‘अपाला’ ने सौंदर्य, स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उत्थान पर कई मंत्रों की रचना की थी। वह तपस्विनी थीं और इंद्रदेव से संवाद करने की क्षमता रखती थीं। उनके द्वारा रचित मंत्रों में आध्यात्मिक चेतना और स्त्री शक्ति का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

ऋषिका ‘विश्ववारा’ भी ऋग्वेद की प्रमुख मंत्रद्रष्टा थीं। उन्होंने ब्रह्मांड की रचनात्मकता और शक्ति को लेकर कई महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। उनकी रचनाएँ समाज में स्त्री की भूमिका और उसके महत्व को स्पष्ट करती हैं। ऋग्वेद में अनेक ऋषिकाओं की उपस्थिति यह दर्शाती है कि वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा, आध्यात्मिकता और समाज में नेतृत्व करने का पूरा अवसर दिया जाता था। उनके विचार केवल धार्मिक और आध्यात्मिक नहीं थे, बल्कि उन्होंने सामाजिक संरचना, न्याय, नीति और नैतिकता पर भी गहरा प्रभाव डाला था। भारतीय बोध की यह ऋषिकाएं यह प्रमाणित करती हैं कि नारी शक्ति केवल एक आधुनिक अवधारणा नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय संस्कृति की जड़ में समाहित है।

मां शक्ति का अवतार है नारी-स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानन्द कहते हैं,  ‘’भारत की नारीशक्ति और कुछ नहीं बल्कि माँ शक्ति का अवतार है। हम उस परंपरा का हिस्सा हैं, जहां पुरुषों की पहचान नारियों से होती थी। यदि हम पर उसकी कृपादृष्टि हो जाए तो हमारी शक्तियों में अनेक गुणा बढ़ोतरी हो जाएगी।‘’ स्वामी जी का यह कथन भारत की मातृशक्ति की गौरव गरिमा को स्थापित करता है। इसी तरह विश्वकवि रबीन्द्र नाथ टैगोर भी राष्ट्र की मातृशक्ति का महिमा मंडन करते हुए लिखा है, ‘’नारी केवल गृहस्थी के यज्ञ की अग्नि की देवी नहीं अपितु हमारी आत्मा की लौ है।”

सुसंस्कारों के बीजारोपण से ही रुकेंगे यौन अपराध

एक ओर जहां आज हमारे देश की स्त्री सशक्तिकरण की विभिन्न योजनाओं के बलबूते महिलाएं जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कंधे से कंधा मिलकर विकास की नयी नयी इबारत लिख रही हैं; मगर इस सुखद तस्वीर का दूसरा स्याह पहलू यह है कि अपराधी व कुंठित मानसिकता लोग आज भी नारी को भोग की वस्तु समझते हैं क्यूंकि इंटरनेट पर दिखायी जाने बहुसंख्य वेबसीरीज में अश्लीलता व नग्नता खुलेआम परोसी जा रही है। शायद ही कोई दिन जाता हो, जब महिलाओं के साथ होने वाले यौन अपराध समाचार की सुर्खियों न बनते हों। फैशन, पैसा और शोहरत के नाम देह प्रदर्शन से लेकर फूहड़ वेश विन्यास से लेकर स्वकेंद्रित युवाओं में लिव-इन (सहजीवन) की आत्मघाती अंधी सुरंग के प्रति गहराता आकर्षण परिवारों में संस्कारों के अभाव का ही कुफल है।

ऐसे अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए स्त्री की गरिमा को कलंकित करने वाले विज्ञापनों, टीवी सीरियलों व फिल्मों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने के साथ भावी पीढ़ी में बालपन से ही सुसंस्कारों का बीजारोपण बेहद जरूरी है। साथ ही यह भी समझना होगा कि दहेज व तलाक जैसी परम्पराएं नारी सम्मान पर बदनुमा कलंक हैं। भारत को आज सर्वाधिक आवश्कता इसी सांस्कृतिक क्रांति की है। आज समय की मांग है कि भारत की मातृशक्ति अपनी गौरव गरिमा को गहराई से समझे और भारतीय इतिहास के महान नारी पात्रों के चरित्र व आचरण से प्रेरणा लेकर समाज में मृतप्राय हो चुके सुसंस्कारों को पुनर्जीवित करने का संकल्प ले।

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