आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र ममता बनर्जी का आत्मविश्वास काफी कमजोर होता जा रहा है। ममता बनर्जी ने एक रैली को सम्बोधित करते हुए कहा था कि आगामी विधानसभा चुनाव में वो अपनी सीट एक वोट से जीतेंगी। यह कथन ममता बनर्जी के कमजोर होती उम्मीद और आत्मविश्वास को परिलक्षित करता है। तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का जोश ममता बनर्जी के इस बयान के बाद ठंडा हो गया है। विदित हो कि ममता बनर्जी 2021 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम विधानसभा सीट से अपनी खुद का चुनाव भाजपा के सुवेंदु अधिकारी से हार गई थीं।
इसके बावजूद मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी अपने पुराने विधानसभा की सीट भबानीपुर से उपचुनाव लड़ा और 58835 से अधिक मतो से चुनाव जीतकर विधानसभा की सदयस्ता प्राप्त की। मगर 2021 के बाद पश्चिम बंगाल के राजनीतिक स्थिति में काफी परिवर्तन आया है और ममता बनर्जी की पार्टी अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) की जमीन पर काफी कमजोर हुई है। ममता बनर्जी की विधानसभा की सीट भबानीपुर में लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस भाजपा के महज 8297 वोटो से आगे रही थी। यह तब हुआ, जबकि माकपा को 14006 मत इस सीट पर प्राप्त हुआ था। भबानीपुर सीट का 2024 का चुनाव परिणाम यह इंगित करता है कि इस सीट पर ममता विरोधी मत अब ममता बनर्जी से अधिक है। प्रतिशत के हिसाब से भबानीपुर विधानसभा सीट पर तृणमूल कांग्रेस पार्टी का मत 2021 के उपचुनाव के अपेक्षा आधे से भी कम हो गया है। यह तृणमूल कांग्रेस पार्टी के लिए खतरे की घंटी है।
SIR पर अपनी लोकप्रियता में कमी का दोष मढ़ रहीं ममता
ममता बनर्जी एसआईआर को अपनी लोकप्रियता घटने का कारण बता रही हैं, मगर एसआईआर प्रक्रिया से पूर्व ही हुए लोकसभा चुनाव में भबानीपुर सीट पर इस तरह का परिणाम न सिर्फ तृणमूल कांग्रेस बल्कि ममता बनर्जी के लिए भी खतरे की घंटी थी। पाञ्चजन्य ने ममता बनर्जी के इस घटते राजनीतिक वजूद के मद्देनज़र 3 फरवरी को यह प्रकशित किया था कि इस बार ममता बनर्जी एक नहीं बल्कि दो विधानसभा की सीटों से चुनाव लड़ेंगी। कोई भी मुख्यमंत्री अगर दो सीटों से विधानसभा का चुनाव लड़ता है तो उस पार्टी और मुख्यमंत्री के चुनाव हारने की ज्यादा संभावना बनती है। 2024 में ओडिशा में पांच बार के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक दो सीटों से चुनाव लड़े और एक सीट से चुनाव हारने के साथ ही उनकी पार्टी भी सत्ता से बेदखल हो गई थी। 2005 में हरियाणा में तत्कालीन ओमप्रकाश चौटाला दो सीटों रोरी और नरवाना से चुनाव लड़े और नरवाना विधानसभा सीट से रणदीप सुरजेवाला से चुनाव हार गए थे। ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल भी चुनाव हार गई।
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इसी तरह तेलंगाना में 2023 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव गजवेल और कामारेड्डी दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ा और कामारेड्डी से खुद का चुनाव हार गए और उनकी पार्टी भारत राष्ट्र समिति भी बुरी तरह चुनाव हार गई थी। 2022 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी दो सीटों चमकौर साहिब और भदौर से चुनाव लड़ा और दोनों सीटों से चुनाव हारने के साथ ही उनकी पार्टी कांग्रेस भी बुरी तरह विधानसभा चुनाव में पराजित हुई। उत्तराखंड में 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों सीटों से चुनाव हार गए। इतना ही नहीं बल्कि रावत की पार्टी कांग्रेस पार्टी भी 2017 में चुनाव हार गई थी।
बंगाल में भाजपा ने अपनी जमीन की मजबूत
वहीं भाजपा ने पश्चिम बंगाल के अपनी जमीन को काफी मजबूत कर लिया है। भाजपा के कार्यकर्ता और समर्थक ममता बनर्जी का 2021 में नंदीग्राम में सुवेंदु अधिकारी द्वारा चुनाव में हराना एक बड़ी आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक मुद्दा होगा। इतना ही नहीं बल्कि 2021 में चुनावी हारना और भबानीपुर विधानसभा सीट पर लोकसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन का असर ममता बनर्जी के चुनावी दौरे पर भी पड़ेगा और ममता बनर्जी ज्यादा समय अपने सीट पर ही प्रचार करेंगी। इससे भी तृणमूल कांग्रेस पार्टी के चुनावी प्रदर्शन पर असर पड़ेगा।

















