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केरल : सांप्रदायिक चेहरे और कांग्रेस की मजबूरी

भारत में लोकतंत्र केवल जोड़-तोड़ के आधार पर बहुमत बनाकर जैसे-तैसे चलने वाली सरकार का नाम नहीं है। यह सोचने, आचरण, व्यवहार और जीवन बिताने का एक तरीका है। लोकतंत्र मर्यादाओं और परंपराओं के आधार पर चलता है। केरल में दशकों से चल रहा जोड़-तोड़ का खेल लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है

Written byअभय कुमारअभय कुमार
Mar 3, 2026, 10:12 pm IST
inविश्लेषण, केरल
आईयूएमएल के विवादित नेता पनक्कड़ सैयद सादिक अली शिहाब थंगल, एमके मुनीर और पीके अब्दु रब

आईयूएमएल के विवादित नेता पनक्कड़ सैयद सादिक अली शिहाब थंगल, एमके मुनीर और पीके अब्दु रब

केरल में लगातार दो बार विपक्ष में रही कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव में अब अपने गठबंधन ‘यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट’ (यूडीएफ) के बैनर तले चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में है। यहां कांग्रेस नीत यूडीएफ की दूसरी सबसे बड़ी घटक इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) है। 1979 से आईयूएमएल-कांग्रेस इस गठबंधन के सहयोगी हैं। इससे पूर्व भी दोनों दल राज्य में समय-समय पर एक-दूसरे का सहयोग करते रहे हैं। यह देश के सबसे पुराने राजनीतिक गठबंधनों में से एक है।

राजनीतिक निर्भरता

आईयूएमएल का इतिहास विवादों से जुड़ा रहा है। इसका मूल मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग से माना जाता है। आईयूएमएल की कार्यशैली को लेकर समय-समय पर विवाद उठते रहे हैं। इसके बावजूद ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ और पंथनिरपेक्ष मूल्यों की दुहाई देने वाली कांग्रेस इसके साथ गठबंधन बनाए हुए है।

2019 के बाद आईयूएमएल का महत्व न केवल कांग्रेस के लिए, बल्कि नेहरू-गांधी परिवार के लिए भी बढ़ गया है। लोकसभा चुनाव-2019 में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेठी के साथ-साथ केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ा। इस सीट का चयन आईयूएमएल के प्रभाव और वहां के सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर किया गया था। इस लोकसभा क्षेत्र में लगभग एक-तिहाई मुस्लिम मतदाता हैं, जिन पर आईयूएमएल का प्रभाव माना जाता है। 2024 में राहुल गांधी ने वायनाड और रायबरेली, दोनों सीटों से जीत दर्ज की। उनके वायनाड सीट छोड़ने के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा वहां से चुनाव लड़ना नेहरू-गांधी परिवार की आईयूएमएल पर बढ़ती राजनीतिक निर्भरता के रूप में देखा जा रहा है।

अनुमान है कि इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में यूडीएफ के भीतर आईयूएमएल अधिक सीटों की मांग कर सकती है। इसके दो कारण हैं। पहला, नेहरू-गांधी परिवार की आईयूएमएल पर राजनीतिक निर्भरता और दूसरा, केरल विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का लगातार गिरता प्रदर्शन। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की सीट संख्या लगातार घटी है। इसलिए आईयूएमएल सहित यूडीएफ के अन्य घटक दल कांग्रेस को कम सीट देने का दबाव बना रहे हैं।

विवादों से आईयूएमएल का नाता

26 अक्तूबर, 2023 को कोझिकोड में आईयूएमएल के प्रदेश अध्यक्ष पनक्कड़ सैयद सादिक अली शिहाब थंगल ने विवादित भाषण दिया था। थंगल ने भारत सरकार पर इस्राएल का समर्थन करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि जो भी इस्राएल के साथ खड़ा है, वह आतंकवाद का समर्थन कर रहा है। उसी रैली में लीग के वरिष्ठ नेता और विधायक एम.के. मुनीर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस और शहीद भगत सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की तुलना हमास के आतंकियों से करने के आरोप लगे थे। हालांकि, इन नेताओं के बयानों पर विवाद भी हुआ और आलोचना भी हुई। इसके बावजूद कांग्रेस ने आईयूएमएल के विरुद्ध कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी।

जुलाई 2023 में मुस्लिम लीग की युवा शाखा द्वारा कासरगोड में आयोजित एक रैली में भड़काऊ नारे लगाए जाने पर विवाद हुआ था। यूडीएफ सरकार के दौरान आईयूएमएल के शिक्षा मंत्री पी.के. अब्दु रब ने अपने आधिकारिक आवास का नाम ‘गंगा’ से बदलकर ‘ग्रेस’ कर दिया था। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सह-शिक्षा को लेकर भी बयान दिया था कि लड़के और लड़कियों को अलग-अलग बैठाया जाना चाहिए। 2015 में मुस्लिम लीग ने अपने मंत्रालय से जुड़े कुछ कार्यक्रमों में दीप प्रज्जवलन से परहेज किया था। उनका कहना था कि यह इस्लामिक मान्यताओं के अनुरूप नहीं है। फरवरी 2013 में पार्टी के एक नेता द्वारा केरल विश्वविद्यालय के सिंडिकेट में मुस्लिम सदस्यों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व की मांग किए जाने पर भी विवाद खड़ा हुआ था। आलोचकों ने इसे सांप्रदायिक आधार पर शिक्षा नीति को प्रभावित करने का प्रयास बताया।

मुस्लिम लीग का बढ़ता प्रभाव

इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि वर्तमान आईयूएमएल का संबंध पाकिस्तान निर्माण में भूमिका निभाने वाली जिन्ना की मुस्लिम लीग से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। ऐतिहासिक दृष्टि से सच तो यह है कि बीसवीं सदी की शुरुआत में जब जिन्ना ने मुस्लिम लीग को सशक्त बनाने का अभियान चलाया, तब दक्षिण भारत में भी उन्हें अच्छा समर्थन मिला था।

आजादी से पहले केरल मद्रास प्रेसीडेंसी का हिस्सा था। 1945-46 के संविधान सभा और प्रांतीय विधानसभा चुनावों में मद्रास प्रेसीडेंसी में मुसलमानों के लिए 28 सीटें आरक्षित थीं। इन सभी सीटों पर मुस्लिम लीग ने जीत दर्ज की थी। संविधान सभा के लिए भी मद्रास प्रेसीडेंसी से मुस्लिम लीग के तीनों उम्मीदवार विजयी हुए थे। यह चुनाव परिणाम दर्शाता है कि मुस्लिम लीग की जड़ें दक्षिण भारत, विशेषकर केरल में बहुत मजबूत थीं। संविधान सभा में मद्रास प्रेसीडेंसी से मुस्लिम लीग के जिन तीन सदस्यों का चुनाव हुआ, उनमें बी. पॉकर और एम. मोहम्मद इस्माइल प्रमुख थे। ये दोनों नेता इसी राज्य से थे। देश के विभाजन के बाद ये लोग पाकिस्तान नहीं गए, बल्कि भारत में रहकर राजनीति में सक्रिय रहे।

मुस्लिम लीग का पुनर्गठन क्यों

10 मार्च 1948 को चेन्नई के राजाजी हॉल में मुस्लिम लीग की बैठक हुई। इसमें भारत में रहने वाले मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इसी बैठक में आईयूएमएल के पुनर्गठन का निर्णय लिया गया। इसका पहला अध्यक्ष एम. मोहम्मद इस्माइल को बनाया गया। उन्हें ‘कायद-ए-मिल्लत’ की उपाधि दी गई। दक्षिण भारत से चुने गए अधिकांश मुस्लिम लीग विधायक भारत में ही रह गए। उल्लेखनीय है कि विभाजन से पूर्व ‘मोपलिस्तान’ की मांग का भी जिक्र मिलता है। इस संदर्भ में, 18 जून 1947 को मुस्लिम लीग के मुखपत्र ‘डॉन’ में एम. मोहम्मद इस्माइल ने अपने विचार व्यक्त किया था। उन्होंने मालाबार क्षेत्र की जनसंख्या संरचना का हवाला देते हुए तर्क प्रस्तुत किया था। हालांकि, यह मांग व्यावहारिक रूप नहीं ले सकी और स्वतंत्र भारत में इस दिशा में कोई राजनीतिक पहल नहीं हुई।

राजनैतिक समझौते की आड़

आईयूएमएल के गठन के बाद एम. मोहम्मद इस्माइल एक बार राज्यसभा सदस्य और तीन बार केरल के मंजेरी लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए। पी. बी. पॉकर भी मंजेरी और मलप्पुरम से लोकसभा पहुंचे। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने समय-समय पर कांग्रेस और वाम दलों के साथ राजनैतिक समझौते किए, लेकिन जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी से दूरी बनाए रखा।

1960 में केरल विधानसभा के अध्यक्ष पद पर के. एम. सेठी का चयन हुआ, जो मुस्लिम लीग से जुड़े थे। जवाहरलाल नेहरू के जीवनकाल में ही मुस्लिम लीग से जुड़े कई नेता स्वतंत्र भारत की राजनीति में सक्रिय और प्रभावशाली पदों पर आसीन हुए। इंदिरा गांधी के अध्यक्षीय कार्यकाल में 1979 में कांग्रेस के समर्थन से सी.एच. मोहम्मद कोया केरल के मुख्यमंत्री बने। मोहम्मद कोया का कार्यकाल अल्पकालिक रहा, लेकिन यह राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना थी। 30 नवंबर 1979 को ‘इंडिया टुडे’ को दिए साक्षात्कार में मोहम्मद कोया ने कहा था कि अल्पसंख्यकों के संगठन और बहुसंख्यकों के संगठन की प्रकृति अलग होती है। उनके अनुसार अल्पसंख्यक अपने अधिकारों और सुरक्षा के लिए संगठित होते हैं, जबकि बहुसंख्यक समुदाय को ऐसे संगठन की आवश्यकता नहीं होती।

इस प्रकार केरल की राजनीति में कांग्रेस और आईयूएमएल का संबंध केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक और वैचारिक आयाम भी है। एक ओर कांग्रेस स्वयं को पंथनिरपेक्ष राजनीति का प्रतिनिधि बताती है, दूसरी ओर आईयूएमएल के साथ उसका स्थायी गठबंधन राजनीतिक आवश्यकता के रूप में देखा जाता है। आगामी विधानसभा चुनाव के बाद यह स्पष्ट होगा कि यह गठबंधन भविष्य में किस दिशा में आगे बढ़ता है और केरल की राजनीति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?

Topics: राजनीतिक निर्भरतापंथनिरपेक्ष मूल्यसांप्रदायिक ध्रुवीकरणअल्पसंख्यक प्रतिनिधित्वभड़काऊ नारेपाञ्चजन्य विशेषगठबंधनजोड़-तोड़ की राजनीतिघटक दल
अभय कुमार
अभय कुमार
अभय कुमार, सीएसडीएस (CSDS ), इप्सोस (IPSOS) सहित कई रिसर्च और मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। भारतीय राजनीति सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय मामलो से जुड़े मुद्दों पर खास दिलचस्पी है और इसके लिए लिखते रहते हैं। [Read more]
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