अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम मा. सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करता है जिसने दिग्बल टंडी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य मामले में गत 16 फरवरी 2026 को दिए निर्णय में, छत्तीसगढ़ के जनजाति गांवों में ईसाई मिशनरियों के प्रवेश पर प्रतिबंध के बोर्ड लगाने के खिलाफ याचिका को खारिज किया।
हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने रखा बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें कहा गया था कि लालच या धोखाधड़ी के जरिए कन्वर्जन पर लगाम लगाने के लिए होर्डिंग लगाने के कदम को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा था कि ईसाई पादरी प्रलोभन और हेरफेर के माध्यम से जनजाति आबादी का कन्वर्जन करते हैं। 16 फरवरी 2026 को दिए गए इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ‘पेसा’ कानून के तहत ग्राम सभाओं को अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा का पूर्ण अधिकार है।
ग्रामसभाओं को स्वशासन की इकाई के रूप में मान्यता
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पहले ही ग्रामसभाओं के इस निर्णय को वैध मानते हुए यह भी रेखांकित किया कि ग्रामसभाएं केवल औपचारिक संस्था नहीं, बल्कि वास्तविक स्वशासन की इकाई हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार की प्रतिबद्धता
छत्तीसगढ़ राज्य के उपमुख्यमंत्री एवं पंचायत राज मंत्री विजय शर्मा जी ने स्पष्ट किया कि, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय संविधान की भावना और जनजाति संस्कृति के संरक्षण की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा, छत्तीसगढ़ सरकार ग्राम सभाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। हम पेसा नियमों को और अधिक प्रभावी बनाने पर काम कर रहे हैं ताकि जनजाति समाज अपनी संस्कृति और परंपराओं को अक्षुण्ण रख सके।
अनुसूचित क्षेत्रों के राज्यों से आवाहन
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्येद्र सिंह ने छत्तीसगढ़ शासन का भी अपनी इस भूमिका पर अडिग रहने का स्वागत-अभिनंदन किया।
इसी तरह हम अनुसूचित क्षेत्र के सभी 10 राज्यों को आवाहन करते हैं कि PESA विधान की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए वे अपने-अपने राज्यों के पेसा नियमों में भी इसी प्रकार के सख्त नियम बनाए और मा. सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश को सम्मिलित करते हुए गाइडलाइन्स जारी करे जिससे जनजाति समाज अपनी परंपरागत संस्कृति-पूजा पद्धति को अक्षुण्ण रख सके।










