आज मातृभाषा दिवस है और भाषाओं को लेकर देश ने समय-समय पर इतनी त्रासदियां झेली हैं जिसका खामियाजा आज भी देश भुगत रहा है। आजादी मिलने के बाद भारत में भाषाई आधार पर राज्य के गठन की मांग तेजी से उठने लगी। हालांकि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भाषाई आधार पर राज्य के गठन का विरोध किया। उसी दौरान सामाजिक कार्यकर्ता पोट्टी श्रीरामलू आंध्र प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर 58 दिनों तक आमरण अनशन किया। बाद में उनकी मौत हो गई। इस घटना के बाद भाषाई आधार पर राज्यों की गठन की मांग ने जोर पकड़ा।
1953 में न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ। इस आयोग में कुल 3 सदस्य थे जिसमें जस्टिस फजल अली, हृदयनाथ कुंजूरु, केएम पणिक्कर के नाम शामिल थे। 1956 में नए राज्यों का निर्माण हुआ उस दौरान देश में 14 राज्यों 6 केंद्र शासित प्रदेश थे। भाषाई आधार पर सबसे पहला राज्य आंध्रप्रदेश बना। 1960 में पुनर्गठन का दूसरा दौर चला सबसे पहले 1960 में मुंबई राज्य को तोड़कर अलग गुजरात राज्य बनाया गया। 1966 में भाषाई आधार पर पंजाबी भाषा वाले क्षेत्र को पंजाब और हिंदीभाषी क्षेत्र को हरियाणा और हिमाचल प्रदेश का गठन हुआ। बात पंजाब की करें तो भाषाई आधार पर हुए बंटवारे का नुकसान केवल इतना ही नहीं रहा कि महापंजाब तीन राज्यों में बंट गया, बल्कि इसके बाद टकराव बढ़ा और राज्य में आतंकवाद पनपने का कारण भी बना।
गुरूजी की सुन लेते तो अच्छा होता
पंजाब के बंटवारे के बाद पंजाब-हरियाणा में सतलुज-यमुना संपर्क नहर के रूप में जल विवाद और राजधानी चंडीगढ़ को लेकर टकराव शुरू हो गया। इन मुददें को लेकर अकाली दल ने आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित किया जिसने राज्य में अलगाववाद व आतंकवाद को खाद पानी देने का काम किया। अगर भाषा को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्रीगुरुजी की सुन ली जाती तो महापंजाब के विभाजन से बचा जा सकता था।
पंजाब में भाषा का मुद्दा साम्प्रदायिक रूप धारण कर गया था। जिसके चलते हिंदुओं ने हिंदी को अपनी मातृभाषा और सिखों ने पंजाबी को अपनी मातृभाषा बताना शुरू कर दिया और पंजाबी समाज का ये अभिन्न अंग आमने सामने आ गए। उस समय श्रीगुरुजी जालंधर आए और उन्होंने कहा कि ‘पंजाब में रहने वाले हर नागरिक की मातृ-भाषा पंजाबी है, चाहे वह हिन्दू हो या सिख।’ अगर गुरुजी की बात मान ली होती तो आज पंजाब का इतिहास कुछ और होता।
सभी भारतीय भाषाएँ श्रद्धा की पात्र
देश में भाषा की उलझनों पर विचार करते हुए श्री गुरूजी कहते हैं कि मेरे विचार में आज जो उलझन निर्माण की गई है, वह केवल देश की अन्यान्य सभी भाषाओं को समान रूप से राष्ट्रीय न मानने के कारण ही है। चाहे वह तमिल हो अथवा बंगला, मराठी हो या पंजाबी सभी हमारी समान श्रद्धा की पात्र हैं। मैं तो यही चाहूँगा कि हममें से प्रत्येक को अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त देश की अन्यान्य भाषाओं में से कम से कम एक और भाषा का अध्ययन अवश्यमेव करना चाहिए।
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आंतरिक एकजुटता
गुरूजी मानते थे कि हमारी सभी भाषाएँ आंतरिक रूप से एक हैं। इस बात को समझाते हुए वे कहते हैं कि यदि हमारे देश में कोई व्यक्ति अपने स्थान से पैदल यात्रा आरम्भ करे और एक प्रांत से दूसरे प्रांत के लिए चले तो भाषा में प्रत्येक दस-पद्रह मील पर क्रमिक परिवर्तन, एक भाषा से दूसरी भाषा में एक स्वाभाविक रूपांतर वह अनुभव करेगा तथा सीमा पर उन भाषाओं को एकीभूत होते देखेगा।
एक ही भाषा में स्थान-स्थान पर अन्य भाषाओं की निकटता के कारण शब्दों के प्रयोग एवं अभिव्यक्ति में असामान्य अंतर हो जाता है। इससे यही प्रकट होता है कि ये सभी भाषाएँ आंतरिक रूप से एक ही हैं। यह इंद्रधनुष में क्रमश: प्रकट होने वाले रंग के समान हैं। यद्यपि वह अति देदीप्यमान विविध रंगों में उदित होता है, किंतु वह होती तो सूर्य की किरण ही है, जो उन मोहक परिधानों को धारण करती है। हमारी भाषाओं की यही विशिष्ट महत्ता है।
देश की हर भाषा में मिलेंगी उदात्त भावनाएं
इसी क्रम में श्री गुरु जी कहते है कि देश की कोई भाषा लें, उसमें हमें वही उदात्त भावनाएँ मिलेंगी। समान प्रेरणादायी विचार एवं आदर्श हमारे सभी भाषाओं के वाड्मय (साहित्य) में प्रतिफलित होते हैं। श्री रामचंद्र का जो श्लाघ्य व्यक्तित्व हमें वाल्मीकि के द्वारा संस्कृत में मिलता है, वही हिंदी में तुलसी तथा तमिल में कंब के द्वारा प्राप्त होता है। यदि सबमे से एक ही प्रकाश निकलता है तो माध्यम के परिवर्तन से क्या होता है? यह तो ठीक इसी प्रकार है, जैसे कोई व्यक्ति भाँति-भाँति के सुंदर परिधान, जो उसके चरित्र एव संस्कृति के अनुकूल हों, धारण करें। उपर्युक्त कारण से मनुष्य नहीं बदलता।
सभी भारतीय भाषाएँ – राष्ट्रभाषा
श्री गुरूजी मानना था कि हमारी सभी भाषाएँ, चाहे वह तमिल हो या बँगला, मराठी हो या पंजाबी, हमारी राष्ट्रभाषाएँ हैं। वे सभी भाषाएँ और उपभाषाएँ खिले हुए पुष्पों के समान हैं, जिनसे हमारी राष्ट्रीय संस्कृति की वही सुरभि प्रसारित होती है। इन सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत भाषाओं की रानी देववाणी संस्कृत रही है। अपने वैभव एवं पावन साहचर्य के कारण केवल वही हमारे राष्ट्रीय पारस्परिक व्यवहार के लिए एक सर्वमान्य माध्यम के रूप में कार्य कर सकती है। संस्कृत का कामचलाऊ ज्ञान प्राप्त करना कुछ कठिन भी नहीं है। अभी भी संस्कृत हमारी राष्ट्रीय एकता के लिए एक महान संयोजक सूत्र है।
सन 1962 में तमिल संस्कृति के महान समर्थक तथा मदुरै से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार-पत्र के संपादक श्री कारिमुत्तु त्यागराज चेटियर ने श्री गुरुजी को चाय के लिए निमंत्रित किया था। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के प्रश्न को लेकर उन दिनों (सन् 1962) दक्षिण भारत में बडा विवाद उठ खडा हुआ था। उन्होंने बडे साहस के साथ श्री गुरुजी से पूछा- ‘हमारे देश के लिए हिंदी को ही राष्ट्रभाषा बनाने की क्या आवश्यकता है?’ प्रश्न कर उत्तर के लिए वे बडी उत्सुकतापूर्ण दृष्टि से श्री गुरूजी की ओर देखने लगे। श्री गुरुजी ने कहा ‘क्यों? मेरे विचार से देश की सभी भाषाएँ, जिन्होंने हमारी संस्कृति के महान विचारों को प्रस्तुत किया है, शत-प्रतिशत राष्ट्रीय हैं। हमारे देश की राष्ट्रभाषा केवल हिंदी ही नहीं है। अत: तमिल भी राष्ट्रभाषाओं में से एक है। लेकिन मुख्य बात यह है कि इतने बडे देश के लिए एक सामान्य व्यवहार की भाषा की आवश्यकता है, जो आजकल विदेशी भाषा (अंग्रेजी) का स्थान ले सके। क्या आप इस आवश्यकता का अनुभव नहीं करते?’ श्री गुरुजी के उत्तर से पूर्णतया समाधान पाकर श्री चेटियर ने साधुवाद द्वारा मुक्तकंठ से उसकी यथार्थता स्वीकार की।
डॉ. मोहन भागवत जी के भारतीय भाषाओं पर विचार
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी के अनुसार ‘सभी भारतीय भाषाएँ हमारी भाषाएँ हैं। क्षेत्रीय मुद्दों को राजनेता केवल अपना वोट-बैंक बढ़ाने के लिए भडक़ाते हैं।’ भारतीय भाषाओं के सन्दर्भ में उनका विचार है -भारत की सारी भाषाएँ मेरी भाषा है और जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ की भाषा बोलता हूँ। यह होना चाहिए। अपनी मातृभाषा पूरी आनी चाहिए। जहाँ मैं रहता हूँ, वहाँ की भाषा आत्मसात् करनी चाहिए और पूरे भारत की एक भाषा जो हम बनाएंगे। वह श्रेष्ठ है इसलिए नहीं, आज के समय में वह सर्वाधिक उपयुक्त है, इसलिए बनाएंगे। उसको भी सीखना चाहिए और फिर आपकी रुचि है और आवश्यकता है तो कोई भी विदेश की भाषा सीखिए। उसमें विदेशी लोगों से ज्यादा प्रवीण बनिए। उसमें भारत का गौरव है।
भाषा को लेकर आरएसएस की नीति
राष्ट्रीय भाषा-नीति (अ. भा. प्र. सभा, 1958) – यह अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है कि राजभाषा के विवाद में पड़े कुछ लोग हटवादिता से अपना संतुलन खो बैठे हैं और राष्ट्रजीवन में विषाक्त वातावरण उत्पन्न कर रहे हैं। आज की यह स्थिति सरकार द्वारा संविधान में निर्देशित तत्वों का पालन न किए जाने से ही उत्पन्न हुई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्पष्ट मत है कि किसी भी स्वतंत्र देश का कामकाज किसी भी विदेशी भाषा में नहीं चलाया जा सकता। जब तक भारत अपने सामान्य एवं राज्य व्यवहार के लिए अंग्रेजी का उपयोग करता रहेगा वह मानसिक दासता से मुक्त नहीं हो सकता। उसके कारण शासन और जनता के बीच खाई बनी रहेगी। राष्ट्रीय जीवन का विकास भी नहीं होगा और अपनी वैशिष्ट्यपूर्ण देन को भी वह संसार को देने में असमर्थ रहेगी। संघ सदैव से ही भारत की सभी भाषाओं को राष्ट्रीय मानता आया है और उसका विश्वास है कि भले ही ऊपर से कुछ भिन्नता दिखती है पर उनमें आत्म एक है और एक ही भारतीय संस्कृति के मूल्यों की प्रतिष्ठापना उनके साहित्य द्वारा हुई है।
शासन की भाषा-नीति (अ. भा. प्र. सभा, 1963) – एक राष्ट्रीय भाषा के माध्यम से प्रशासन राष्ट्र की स्वतंत्रता और सार्वभौमता का अभिन्न अंग है। इस तथ्य के उपरांत भी कि भारत में अत्यंत विकसित अनेक राष्ट्रीय भाषण हैं, यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारी स्वतंत्रता के 16 वर्ष पश्चात भी देश के प्रशासन में अंग्रेजी प्रभुत्व के स्थान पर बैठी हुई है। संविधान ने 1965 के बाद अंग्रेजी को तिलांजलि दे देने का प्रावधान किया था परंतु सरकार ने संविधान के इस निर्देश को लागू करने के लिए कोई पग नहीं उठाया है। अब उन्होंने अंग्रेजी को सह-राजभाषा घोषित करने के लिए विधेयक प्रस्तुत करने और इस प्रकार प्रशासन में इसका उपयोग सदैव जारी रखने के अपने निर्णय की घोषणा की है। यह निर्णय सिद्धांत और व्यवहार दोनों ही दृष्टियों से घोर असामयिक और अनुचित है। किसी विदेशी भाषा को सह-राजभाषा स्वीकार करना भी राष्ट्रीयता की भावना के सर्वथा विपरीत है। व्यवहार में इसका अर्थ होगा अंग्रेजी का पूर्ण प्रभुत्व और इस प्रकार भारत की विभिन्न राष्ट्रीय भाषाओं को उनके न्यायसम्मत स्थान से वंचित करना। एक ऐसे समय जबकि हम आक्रमण के शिकार हैं इस प्रकार की विभाजनकारी स्वरूप वाला विवाद खड़ा करना राजनेतृत्व संगत नहीं है।
भाषा-नीति (अ. भा. प्र. सभा, 1965) – स्वतंत्रता की यह मांग है कि देश का प्रशासन हमारी अपनी भाषा में चलाया जाए। विदेशी भाषा राष्ट्र की प्रतिभा को अभिव्यक्त नहीं कर सकती, न ही उसके विकास में सहायक हो सकती है। इसके निरंतर अक्षुण्ण प्रयोग से केवल विदेशी विचार का प्रभुत्व और विदेशी शासन में हुए राष्ट्र के क्षरण का अब भी न रुकना ही प्रकट होता है। यह खेद की बात है कि स्वतंत्रता के इतने लंबे समय बाद भी देश प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर अंग्रेजी से हमारी भारतीय भाषाओं में सहज परिवर्तन लाने के लिए तैयार नहीं है। इसके विपरीत अंग्रेजी का प्रयोग बढ़ रहा है। ऐसी स्थिति बनी नहीं रहने दी जानी चाहिए।
भारतीय भाषाओं का संरक्षण (अ. भा. प्र. सभा, 2015) – अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा देश-विदेश की विविध भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करने की पक्षधर है लेकिन उसका यह मानना है कि स्वाभाविक शिक्षण व सांस्कृतिक पोषण के लिए शिक्षा, विशेष रुप से प्राथमिक शिक्षा, मातृभाषा अथवा संविधान स्वीकृत प्रादेशिक भाषा के माध्यम से ही होनी चाहिए। भाषा केवल संवाद की ही नहीं अपितु संस्कृति एवं संस्कारों की भी संवाहिका है। भारत एक बहुभाषी देश है। सभी भारतीय भाषाएँ समान रूप से हमारी राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक अस्मिता की अभिव्यक्ति करती हैं। यद्यपि बहुभाषी होना एक गुण है किंतु मातृभाषा में शिक्षण वैज्ञानिक दृष्टि से व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है। मातृभाषा में शिक्षित विद्यार्थी दूसरी भाषाओं को भी सहज रूप से ग्रहण कर सकता है। प्रारंभिक शिक्षण किसी विदेशी भाषा में करने पर जहाँ व्यक्ति अपने परिवेश, परंपरा, संस्कृति व जीवन मूल्यों से कटता है वहीं पूर्वजों से प्राप्त होने वाले ज्ञान, शास्त्र, साहित्य आदि से अनभिज्ञ रहकर अपनी पहचान खो देता है।

















